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تكلـم
أيهـا
البطـل
السـعيدُ
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وفصــِّل
مـا
أردت
ومـا
تريـدُ
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وصـف
مـا
أنـت
بالغه
المرجَّى
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وصـف
مـا
أنـت
صانعه
المجيد
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ومـا
أفضـت
بـه
الأفواج
تترى
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إليــك
ومـا
تمنتـه
الوفـود
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فتحـت
الخـط
يخـترق
الفيافي
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فيعمرهــا
ويقــترب
البعيـد
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وسـار
الخيـر
خلفـك
في
طريق
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تسـير
النـار
فيـه
والحديـد
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وقـد
وقـف
العبـاد
بجـانبيه
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كمـا
احتشدت
لقائدها
الجنود
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وقمـت
لهـم
خطيبـاً
فـي
منوف
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فمـاج
الريـف
واهـتز
الصعيد
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وضــج
الجــوُّ
بالأنبـاء
شـتى
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فـأين
الـبرق
منـه
والبريـد
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وأسـمعت
الأقاصـي
مـا
أراهـم
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كـــأنهمُ
حضــورك
والشــهود
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ملأت
الأرض
عمرانـــاً
وخصــباً
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وسـيرك
فـي
السماء
غداً
مديد
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تطيـر
بسـلمك
المـأمول
فيها
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قشــاعمك
الأمينــة
والأســود
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ومصـر
هـي
المجـاز
لكـل
ماض
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تـراه
وملتقـى
الأمـم
العتيد
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فمـاذا
فـات
ذاك
الضيف
منها
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وقــد
حيَّــى
سـواحلها
يـرود
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رددت
ســـلامه
بـــأبر
منــه
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وسـوغ
صـنعك
الـرأي
السـديد
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وحــل
مكــانه
مـن
كـل
نفـس
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وإن
أقصـاه
ذو
الحذر
الحسود
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ومـا
تغني
حدود
الملك
إن
لم
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تكـن
مـن
هيبة
الملك
الحدود
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وزيـر
الشـعب
والتاج
المفدى
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لقــاؤك
موســم
ورضـاك
عيـد
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تنــاولت
الســرائر
صـافيات
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وأيـد
حكمـك
العـدل
الوجـود
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أيخـرج
مـن
حمـاك
عليـك
رهط
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وقـد
وثقـت
بـدولتك
الهنـود
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أعيبــك
أن
تقــوم
مهيمنـات
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علـى
النيل
القناطر
والسدود
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فلا
يطغـى
علـى
المعمـور
فيض
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ولا
تشـكو
الغليـل
إليـك
بيد
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وأن
يتجنــب
الفوضــى
نظـام
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وأن
يتــألف
الشـمل
البديـد
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وأن
يسـعى
لـك
الجبـار
طوعاً
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وكــم
لاقيـت
منـه
مـا
يـؤود
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وأن
يجــدوا
تجنِّيــه
عليهـم
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إبــاءً
وهـو
صـاحبك
الـودود
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ومـا
دفعـوا
قـواه
وهم
قيام
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ولا
ملكـوا
هـواه
وهـم
قعـود
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حملـت
خطـوبهم
في
الأرض
عنهم
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وقـد
كـادت
بمـا
حملـت
تميد
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وأظلـم
مـن
جفـاك
ومـن
تعدّى
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علـى
واديـه
هـادم
مـا
تشيد
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ومــا
آذى
كرامتــك
افـتراءٌ
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وإن
آذى
مروءتـــك
الجحــود
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أللحريـــة
العليــا
دعــاة
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هــمُ
وهــمُ
لــدنياهم
عبيـد
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ولو
عقلوا
استراحوا
من
عناء
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بســـلطان
إليهــم
لا
يعــود
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تجـاوزهم
خطابـك
فاسـتهانوا
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فحـق
عليهـم
اللـوم
الشـديد
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ومـن
يشـفع
أمامـك
فـي
مريب
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فليــس
بشــافع
فيمـن
يكيـد
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لئن
غضـبوا
عليـك
فـأنت
راض
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بصـــنعك
تســتتم
وتســتزيد
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ولســت
بمنــزل
بهـمُ
هوانـاً
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وإن
ثقلــت
شـروطك
والقيـود
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ولــم
تـترك
رعـايتهم
ولكـن
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أصــر
علـى
عـداوته
العنيـد
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ولــم
تجهــل
لبغيهـمُ
علاجـاً
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ولكــن
ربمــا
نفـع
الوعيـد
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هـمُ
طلبـوا
مكـان
العيب
مني
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فأعيــاهم
فقــالوا
مسـتفيد
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وأي
معاهــد
لــك
لـم
تفـده
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غنـى
الدهرِ
المواثق
والعهود
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أمحظــور
علــى
مـن
تصـطفيه
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لهـذي
الأمـة
العيـش
الرغيـد
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وهـل
فـي
عهـدك
الذهبي
يشقى
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كمـا
ودّوا
لـيَ
الحـرُّ
الرشيد
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أبـوا
لقـبي
القديم
وأنكروه
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إلـى
أن
جـاءهم
لقبي
الجديد
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قصـائد
إن
تشـأ
فهـي
الأغاني
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تسـر
وإن
تشـأ
فهـي
الرعـود
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وإن
أصــبحت
عنــدهم
ذميمـاً
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فــإني
عنـدك
الـبر
الحميـد
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ومــا
كلفتنـي
حربـاً
عليهـم
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فحســبهمُ
جفــائي
والصــدود
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وإنــي
عونــك
الأوفـى
قميـن
|
لـك
النجـوى
وللشـعر
الخلود
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