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بـات
لهـا
ذكـر
العُذَيْب
شائقا
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فلـم
تُـرِدْ
مـع
الحنيـن
سائقا
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تـذكرت
نجـداً
مـن
الغـور
فهل
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شـامت
بأعلى
الشام
منه
بارقا
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ففتحـــت
أحـــداقها
كأنمــا
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قــد
شــارفت
بجــوه
حـدائقا
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وأيــن
مـن
نيسـان
أو
نـابلس
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نجـداً
ألا
بعـداً
لهـا
أيانقـا
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ومــا
الـذي
يشـاق
مـن
محلـة
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خرسـاء
لا
ترحـم
دمعـاً
ناطقـا
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فـدع
هواهـا
جانباً
واسلك
بها
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هــواك
إن
كنـت
محبّـاً
وامقـا
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وخـذ
بهـا
فـي
حيـث
لا
أجارعاً
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تطـوى
مـن
الرمـل
ولا
أَبَارِقـا
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وانـض
السـرى
حيـث
تـرى
بجلّق
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تلـك
القصور
البيض
والجواشقا
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فالشــرفين
فالمصــلى
فــذرى
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فالوتهـا
لا
المنحنـى
وبارقـا
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فــي
حيــث
لا
تبصـر
إلا
روضـة
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مســكية
النشـر
ومـاء
دافقـا
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وجــــدولاً
متصــــلاً
بجـــدول
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وغُصــــُناً
لغُصـــُنٍ
معانقـــا
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والـدجن
يمسـي
للريـاض
صابحاً
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ســلافة
العبـق
ويمسـي
غابقـا
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والنرجــس
الغـضّ
يغـض
أعينـاً
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عــن
ثغــره
ولاثــم
شــقائقا
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وللريــاض
فـي
الغيـاض
عبقـة
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لا
يعبـق
المسـك
الـذكيّ
ناشقا
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والوُرْق
في
المورق
من
أفنانها
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تَجنــي
غرامـاً
وتَهيـج
عاشـقا
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كـأن
فـي
تلـك
الغصـون
معبداً
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يرجــع
الألحــان
أو
مُخارقــا
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كأنهــا
لــبرء
موسـى
أصـبحت
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تســمعنا
مـن
شـدوها
طرائقـا
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أو
ترجمـت
بالسـجع
عـن
قدومه
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فســكَّنت
للـدهر
قلبـاً
خافقـا
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نعمــاء
أحيـت
بحيـا
رحمتهـا
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مغـــارب
البلاد
والمشـــارقا
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سـعت
بنـا
في
منهج
النجح
فكم
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قـد
وسـعت
مـن
المنـى
مضائقا
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فالدين
بالنصر
المبين
بات
من
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شـاهر
من
السلطان
موسى
واثقا
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ملـك
إذا
كبـا
المبـاري
سعيه
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فـي
حلبـة
جَلَّـى
وجـاء
سـابقا
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تســـكرني
أوصـــافه
كــأنني
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عـوطيت
منهـن
السـلاف
الرائقا
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أيّ
قـــدوم
ثبتــت
أقــدامها
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بــه
وبـرء
قـد
بـرى
منافقـا
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طــاب
نِجــاراً
وســما
أرومـة
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وعــزَّ
جــاراً
وزكــا
خلائقــا
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يـا
متعـب
الأملاك
بالسـعي
وقد
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سـار
إلى
العلياء
سيراً
رافقا
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كـم
بلـدة
حمـى
سـطاك
سـربها
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فكــانت
الأســوار
والخنادقـا
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لك
الجياد
الجرد
كم
طارت
إلى
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مـدى
وباراهـا
القضـاء
لاحقـا
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إذا
الحصــون
شــمخت
آنافُهـا
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وغرهــا
كـون
الـذرا
سـوامقا
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دارت
علـــى
أعناقهـــا
قلائد
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وأُلْبِســـَت
خصــورها
مناطقــا
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والقُضـْب
بالبيض
التي
كم
مأزق
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كـم
أججـت
وكـم
أبـادت
مارقا
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كــم
هجــرت
أجفانهـا
ووصـلت
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مــن
اغتــدى
لروحـه
مفارقـا
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مفاتـح
الـدنيا
فمـذ
ملكتهـا
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بـاتت
علـى
أبوابهـا
مغالقـا
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فالمـدعي
مثلـك
في
الخلق
كمن
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يـدعو
مـع
اللـه
إلهـاً
خالقا
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وأنـت
مـن
قـوم
إذا
ما
شهروا
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بيـض
سـيوف
وامتطـوا
سـوابقا
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عجبـت
منـه
أُسـْد
علـى
أجـادل
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حاملــة
فــي
ســحب
بوارقــا
|
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تلـك
بـروق
لـم
تـزل
خطفتهـا
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مرســلة
إلـى
العـدا
صـواعقا
|
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يـا
كافـل
الناصـر
داود
سـطا
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يــوم
يُشـيب
هـوله
المفارقـا
|
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دعــا
فمـا
عرجـت
عـن
نصـرته
|
إلا
وقــد
فرجـت
خطبـاً
طارقـا
|
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لـم
يكـن
الملـك
الذي
غادرته
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لشــوكة
الأعـداء
عنـه
عائقـا
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فالــدهر
لا
يَحْـرِمُ
مـن
رَزَقْتَـه
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ولا
يُــرى
لمــن
حَرَمـت
رازقـا
|
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شــددت
أزر
ملكــه
فلـم
تـدع
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لغيــره
ملــك
أبيــه
لائقــا
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نصــيحة
أخلصـتها
جهـدي
ومـا
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قمـت
بهـا
يومـاً
لغيري
حاذقا
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فاعطف
على
البيت
الذي
كل
غذا
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لـه
بسـهم
الكيـد
منـه
راشقا
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لا
تعــس
الـدهر
بكـم
ولا
غـدا
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آنـسُ
هـذا
الملـك
عنكـم
آبقا
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يـا
منقـذي
مـن
جور
دهر
غاشم
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كـان
لعظمـي
بـالخطوب
عارقـا
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مـا
أحسـن
الـدنيا
بنور
طلعة
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عنهـا
الحجـاب
رفـع
السرادقا
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ملأتهــا
عزمــاً
وحزمـاً
ونـدىً
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ورأفــة
منــك
وسـعداً
خارقـا
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فوالــذي
أعطــاك
غايـات
علا
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أعجـز
عـن
إدراكهـا
الخلائقـا
|
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لـو
لـم
أفـز
منـك
بما
أملته
|
كفـى
بمـدحي
لـك
كـوني
صادقا
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