|
سـل
عـن
الأبـرق
برقـاً
أومضـا
|
أبــه
الحــيُّ
مقيــمٌ
أو
مضـى
|
|
وتعـــرض
للصـــَّبا
منتشـــقاً
|
عَـرف
مـا
أدتـه
عن
بان
الغضا
|
|
فعســـى
صـــحة
مــا
تســنده
|
مـن
فـروع
البـان
تَشْفِي
مُمْرَضا
|
|
آه
مــن
بـرق
بأكنـاف
الحمـى
|
هــب
علــويَّ
الســَّنا
معترضـا
|
|
بـــت
مرتاعــاً
لــه
أرقبــه
|
سـاهر
الجفـن
إلـى
أن
أغمضـا
|
|
حبــذا
رام
بــه
لــم
يعتمـد
|
ســهمه
غيــر
فــؤادي
غرضــا
|
|
قلــت
إذ
أثبتــه
فـي
مقتلـي
|
ثَــنِّ
لا
شـُلَّتْ
يـدا
مـن
أنبضـا
|
|
بـأبي
الجـاني
الـذي
ما
زرته
|
مقبلاً
بــــالودِّ
إلا
أعرضــــا
|
|
حرضــت
مقلتــه
الســَّقم
علـى
|
نضــو
أشــواق
ثنتــه
حرضــا
|
|
خــصَّ
مــا
كابــدته
فـي
حبـه
|
كمـــد
جَـــلَّ
وصـــبر
قوضــا
|
|
وغريــم
مــن
غرامــي
كلمــا
|
مطلـت
بالـدمع
أجفـاني
اقتضى
|
|
كلَّمــا
ناشــدته
الوصـل
أبـى
|
أن
يــروض
العَتْـب
منـه
رَيِّضـا
|
|
فبمــاذا
ليـت
شـعري
إن
سـطا
|
بِمُحِبِّيـــه
يجــاري
المبغضــا
|
|
ليتــــه
رقَّ
لقلـــب
هـــائم
|
ولـــدمع
ســاجم
مــا
غيَّضــا
|
|
أو
شــفى
داء
تباريـج
الهـوى
|
فلقـد
يشـفي
الجـوى
من
أمرضا
|
|
أيهـا
السـالب
عن
عيني
الكرى
|
لـم
يجـد
مـذ
بـان
عنـه
عوضا
|
|
حـاش
للعهـد
الـذي
مـا
خلتـه
|
تنقضـــي
أيــامه
أن
ينقضــا
|
|
صــاح
عللنــي
بأيـام
الحمـى
|
أتخطـــاه
الحيــا
أم
رَوَّضــا
|
|
أيـن
أيـام
الغضـا
لـو
أنهـا
|
عــائدات
أيــن
أيـام
الغضـا
|
|
وزمــان
بــاللوى
لـم
تنقـرض
|
فــرص
اللــذات
حـتى
انقرضـا
|
|
وظبــــاء
ســـُنَّح
لا
ترتضـــي
|
عِينُهــا
غيــر
فـؤادي
مَرْبِضـا
|
|
كــلّ
مــن
ينظــر
عـن
فـاترة
|
دونهـا
فتـك
الحسـام
المنتضى
|
|
كســيوف
الملــك
الظـاهر
مـا
|
برحــت
تشــرك
محتـوم
القضـا
|
|
ملــك
يجــدي
ويــردي
محسـناً
|
بيـن
مـرِّ
السخط
أو
حلو
الرضا
|
|
تقـدم
الأملاك
فـي
يـوم
الـوغى
|
خيلــه
نحــو
الأعــادي
ركضـا
|
|
ملـــك
مـــا
حملـــت
همتــه
|
مــا
يــؤود
الطـود
إلا
نهضـا
|
|
ملـك
مـا
افـترع
الملـك
إلـى
|
أن
رآه
اللَّــه
كفــؤاً
مُرْتَضـَى
|
|
صــَيِّبٌ
إن
أمســك
الغيـثُ
هَمَـى
|
قمــر
إن
أظلــم
الـدهر
أضـا
|
|
ثــابت
الحـزم
إذا
قـال
وفـى
|
ثــاقب
العــزم
إذا
هـمَّ
مضـى
|
|
ولــه
الـبيض
اللـواتي
أمنـت
|
فـي
الـوغى
حجتُهـا
أن
تُدحضـا
|
|
نحـن
والأعـداء
فيهـا
لـم
نزل
|
شـــركاء
ســـَنَّها
أو
فرضـــا
|
|
فلنـا
مـا
صـان
منهـا
وانتضى
|
ولهـم
مـا
شـام
منهـا
وانتضى
|
|
كــل
عضــب
إن
هـوى
فـي
دارع
|
شـمت
مـن
فوق
الغدير
العرمضا
|
|
محرمـات
فـي
العـدا
مـا
كبرت
|
فــي
وغــىً
إلا
وصــلَّت
حيضــا
|
|
ومـتى
مـا
فـاض
في
عرض
الفلا
|
جيشــه
ضـاق
بـه
صـدر
الفضـا
|
|
فـإذا
مـا
اسـتلأموا
مـاذِيَّ
ما
|
ســـنَّه
داود
قِـــدّماً
وقضـــى
|
|
لــم
يشــم
إلا
بروقـاً
أشـرقت
|
فـي
بـروق
أو
بحـور
فـي
أضـا
|
|
كــل
ليـث
لهـذم
الرمـح
فـإن
|
هَـــزَّهُ
عــاينت
صــلاًّ
قُنْبُضــَا
|
|
يا
غياث
الدين
عزماً
ما
انبرى
|
فــي
طلاب
المجــد
إلا
أعرضــا
|
|
كـم
إلى
كم
تمطل
البيض
الظبا
|
والقنـا
السـمر
ديونـاً
تقتضى
|
|
فـــاملأ
الأرض
بهــا
مبثوثــة
|
عاســـلات
كســـراحين
الغضــا
|
|
فســـتَثْني
كــل
طِــرْف
ظــامئ
|
وهـو
فـي
مـاء
الطُّلى
قد
خوضا
|
|
ففـــداء
لــك
قــوم
ملكهــم
|
أوشـــكت
بســطته
أن
تنقضــا
|
|
فــاقبض
الملـك
الـذي
وَرَثْتَـه
|
فـــأراه
عنـــدهم
مستقرضــا
|
|
وتــدارك
جــوهراً
منــه
مـتى
|
مــا
ونـى
سـعيك
أضـحى
عرضـا
|
|
يـا
مجيـري
مـن
زمـان
لم
يزل
|
جــوده
يمنــح
قلــبي
مضضــا
|
|
رفعتنــي
منــك
نعمـى
بعـدها
|
ما
استطاع
الدهر
لي
أن
يخفضا
|