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لا
تخطتـــــك
دِيمـــــة
وطفـــــاء
|
واســـــتهلت
بجـــــوك
الأنــــواء
|
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وتمشــي
فيــك
النســيم
علـى
الـرو
|
ض
ســـقيماً
فـــي
ســـيره
إبطـــاء
|
|
يا
ديار
الأَحباب
حيث
الكثيب
الفرد
ب
|
اد
فالنصــــــــب
فالجرعـــــــاء
|
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أيـــن
تلــك
القبــاب
دون
دُماهــا
|
آســـلات
تســـيل
منهـــا
الـــدماء
|
|
والمغـــاني
مأنوســـة
بـــالغواني
|
أمنـــت
بالأســـود
فيهــا
الظبــاء
|
|
ووجـــوه
اللـــذات
تســـفر
بِشــْراً
|
وعلـــى
العيـــش
بهجـــة
وبهـــاء
|
|
بـــأبي
ظلــك
الظليــل
فكــم
غــن
|
ت
بـــــأوراق
دوحـــــه
ورقــــاء
|
|
حبــــذا
ذلـــك
الزمـــان
وللـــه
|
و
صـــــباح
مســـــاعد
ومســـــاء
|
|
حيــث
قلــبي
مغلغــل
فـي
يـد
الـش
|
وق
أســـــيرٌ
وأدمعــــي
طلقــــاء
|
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وغــزال
الصــريم
لـم
يَصـْرَم
العهـد
|
ولا
اعتـــــــلّ
وده
والوفـــــــاء
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كلمـــا
أمرضــت
فــؤادي
لــه
نجلاء
|
منــــــت
بــــــبرئه
لميــــــاء
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حيــث
تلـك
الألحـاظ
تفعـل
بالألبـاب
|
مــــا
ليــــس
تفعـــل
الصـــهباء
|
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خُلَـــسٌ
وَدَّعـــت
كمـــا
ودع
الغيــث
|
فهـــاجت
لهـــا
القلــوب
الظمــاء
|
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ســكرات
مــن
الصــبا
إن
تكـن
ولَّـتْ
|
فعنـــــدي
لـــــذكرهنّ
انتشــــاء
|
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وعفـــاة
توســـدوا
شـــعب
الْمِـــي
|
س
فبـــــاتوا
والْمطــــيّ
شــــَكاء
|
|
وصــلوا
الســير
بالسـُّرى
والمطايـا
|
مُثْقَلاتٌ
أو
ســـــــاقهن
رجـــــــاء
|
|
نـال
منهـا
الـوجى
وخـوض
دُجـا
اللي
|
ل
فكــــادت
تبيــــدها
البيـــداء
|
|
حســـَرَتْ
نَيَّهـــا
مداومـــة
الـــوخ
|
د
فلـــم
تَســـْتَقِلّ
لـــولا
الحُــداء
|
|
وانثنــى
ركبهــا
نشــاوى
مــن
الأَيْ
|
ن
وهـــم
مثـــل
عيســـهم
أنضـــاء
|
|
يرقبــون
الصــباح
والليـل
قـد
مـدّ
|
علــــى
الخــــافقين
منــــه
رداء
|
|
فاســتهلُّوا
لمــا
رأوا
وضــح
الصـب
|
ح
وللنجــــــــح
منهــــــــم
لألاء
|
|
فتـــــأملتهم
وقلــــت
لحــــاديه
|
م
وللفجـــــر
طلعـــــة
غـــــراء
|
|
أيـن
ترمـي
بـك
المنـى
والغنـى
نـح
|
وك
حيـــــث
الســــَّنّى
والســــَّنَاء
|
|
عُــجْ
فهــذا
غـازي
بـن
يوسـف
مـأوى
|
كــــل
عــــافٍ
وهـــذه
الشـــهباء
|
|
فهـو
ظـلّ
اللـه
الظليـل
علـى
الخـل
|
ق
كمـــا
شـــاء
ذو
الجلال
وشــاؤوا
|
|
مشـــرق
العـــدل
والأســـرة
لا
ظــل
|
م
لأيـــــــــامه
ولا
ظلمــــــــاء
|
|
ملـــك
تشـــمخ
المنــابر
إذ
تُعْــلِ
|
نُ
فيهـــــا
بــــذكره
الخطبــــاء
|
|
طالمـــا
حـــلّ
فكــره
عقــد
الــش
|
كّ
بـــرأيٍ
تعنـــو
لـــه
الأمـــراء
|
|
يقـظ
الحـزم
حيـن
يقضـي
بـأمر
الـلَّ
|
ه
لا
تســــــــتفزّهُ
الأهــــــــواء
|
|
ملـــك
جـــلّ
عـــن
شـــبيه
وكـــلّ
|
مـــن
ملــوك
الــورى
لــه
نظــراء
|
|
رُبَّ
ريحيـــــن
تجريـــــان
بضــــر
|
وبنفــــــع
فزَعـــــزَع
ورخـــــاء
|
|
طرفــه
إذ
يقــول
عنــدك
والقلـب
ل
|
ه
فــــي
انـــتزاع
ملـــك
مُضـــَاء
|
|
يَقَظـاتٌ
وهمـة
دونهـا
الـدنيا
وما
ف
|
وق
منتهاهــــــــا
انتهــــــــاء
|
|
حــل
فــي
بــاذخ
أشــمّ
مـن
العلـي
|
اء
مـــا
للملـــوك
فيــه
ارتقــاء
|
|
ملــك
دوخ
الجبــابرة
الصــيد
بــع
|
زّ
مــــــا
شــــــَانَه
كبريـــــاء
|
|
غيــره
تســتفزه
خُـدَع
الـدنيا
وتَـثْ
|
نِـــــــــي
أعطــــــــافه
الخيلاء
|
|
يـا
غيـاث
الـدين
الـذي
شـاد
بالهم
|
ة
أضــــعاف
مـــا
بنـــى
الآبـــاء
|
|
أَسَّســـُوا
المجــد
والســماحة
لكــن
|
بمســــاعيك
تــــمَّ
ذاك
البنــــاء
|
|
بـــأبي
أنـــت
وهــو
أيســر
فــاد
|
وبروحــــي
وقــــلّ
ذاك
الفــــداء
|
|
طــال
شـوق
الـدنيا
إلـى
نظـرة
مـن
|
ك
فحـــتى
مـــتى
يكـــون
اللقــاء
|
|
والأقـــاليم
مــن
ترقبهــا
الوصــل
|
مِــــراضٌ
وفـــي
يـــديك
الشـــفاء
|
|
لا
تـــدعها
تشـــكو
نــواك
وَعِــدْها
|
بـــالتلاقي
ففيـــم
هــذا
الشــقاء
|
|
أنـــت
مهـــديُّ
أمــة
عمهــا
الــجَ
|
وْر
فحتّـــــامَ
هـــــذه
الغَمّــــاء
|
|
لـــك
عنـــد
الإلـــه
وجــه
وجيــهٌ
|
مــــا
عــــدته
طلاقــــة
وحيـــاء
|
|
فيــه
فــي
الجــدود
يُسـْتَمْطَرُ
الغـي
|
ث
وفــــي
كـــل
دُجيـــة
يستضـــاء
|
|
تتجلّــــى
غــــر
المعـــالي
إذا
ع
|
دت
مســــاعيك
عنــــدها
والإبـــاء
|
|
وتــتيه
الملــوك
إن
قلــت
هـم
أرض
|
ويــــا
فخرهــــم
وأنـــت
ســـماء
|
|
قســـماً
بالمقلَّـــدات
إلـــى
جمــع
|
حُـــدى
الركـــب
فـــوقهن
الــدعاء
|
|
مــا
أُريحـت
حـتى
تجلـى
لهـا
الـبي
|
ت
منيـــــراً
ولاحــــت
البطحــــاء
|
|
فــارتمى
المحرمــون
يلتثمـون
الـت
|
رب
فـــرض
لـــه
اســـتحق
القضــاء
|
|
ثـم
طـافوا
بـالبيت
سـبعاً
وقـد
حـط
|
ت
مـــن
الـــوزر
عنهـــم
أعبـــاء
|
|
لتنـــالن
غايـــة
الأَمـــل
القـــص
|
وى
ولــي
بالــذي
اختصــرت
اكتفـاء
|
|
فافترعهــــا
أبــــا
المظفــــر
ع
|
ذراء
لهـــا
منـــك
عـــزة
قعســاء
|
|
وانتشــقها
كروضــة
الحَــزْن
أَهْــدَتْ
|
نفحـــات
جـــاءت
بهـــا
النَّكْبــاء
|
|
فهــي
كالمَنْـدَليِّ
نشـراً
وصـِرْف
الخـم
|
ر
ســــكراً
إذ
يُســـْتطاب
الغنـــاء
|
|
غيــر
أن
المديــح
يعجــز
عـن
وصـف
|
ك
فاصــــفح
إن
قصــــر
الشـــعراء
|
|
يــا
مجيـري
مـن
جـور
حادثـة
الـده
|
ر
وفـــي
حكمهـــا
علـــيّ
اعتــداء
|
|
أنــت
كــثرت
حاســديَّ
بعـد
مـا
كـن
|
ت
طريـــداً
تَرْثِـــي
لـــي
الأعــداء
|
|
حســـدوا
ثروتـــي
لـــديك
ومــا
ج
|
اؤوك
إلا
مثلــــي
وهــــم
فقـــراء
|
|
كــل
يــوم
لــي
مـن
مواهبـك
الغـر
|
غــــــدير
وروضــــــة
غنــــــاء
|
|
فتمتــــع
بعــــود
عيـــد
تجلـــت
|
عنــــه
بالســـعد
ليلـــة
غـــراء
|
|
كفــل
اللــه
رعــي
ملْكِــك
يــا
أك
|
رم
ملـــك
يُهـــدى
إِليــه
الهنــاء
|