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زُهِـيَ
الربيـع
بمـا
جلـت
أنـواؤه
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مــن
وشــي
روض
دبجتــه
ســماؤه
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واهـتز
عِطـف
الغصـن
حيـن
ترنَّمـت
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طربــاً
علــى
أوراقــه
ورقــاؤه
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ومشـى
علـى
الـروض
النسيم
فخلته
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ثملاً
تميـــــل
بعطفـــــه
خيلاؤه
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وإذا
الصـبا
عـثرت
بأذيال
الرُّبا
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نشـــوى
تضــوع
مســكه
وكَبَــاؤُه
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والسـحب
مـن
زَجَـل
الرعود
لحملها
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وضــع
تخـف
علـى
الـثرى
أعبـاؤه
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ســحت
بمـا
خلعتـه
مـن
أسـمالها
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وُشــِيَتْ
مــن
الـروض
الأريـض
ملاؤه
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وحســام
جــدوله
إذا
مــا
مســه
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صــــدأ
الظلال
فبالنســـيم
جلاؤه
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وَهَمـى
الحيـا
فـي
روضـة
غناؤهـا
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هتــف
الحمـام
بهـا
ولـذ
غنـاؤه
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فالــدوح
راقصــة
وكــف
سـحابها
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تسـقى
الـثرى
مـا
رَوَّقَـتْ
أنـواؤه
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فـانهض
نـديمُ
إلـى
النعيم
فإنَّما
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حــظ
الفــتى
مـن
عيشـه
نـدماؤه
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عالــج
همومـك
بالمـدام
وشـربها
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فالصــحو
داء
فــي
يــديك
دواؤه
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واقـرن
براحـك
روح
راحـك
واغتنم
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فــرص
اصـطباحك
بـالغبوق
فـداؤه
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واشـرب
علـى
تحـف
الربيـع
سـلافة
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لــم
تلتبــس
بصــفائها
أقـذاؤه
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يســعى
بهـا
نشـوان
يفعـل
طرفـه
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مــا
ليــس
تفعلـه
بنـا
صـهباؤه
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عطـف
القضـيب
على
الكثيب
فلا
تسل
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عمـــا
تضـــمن
بنــده
وقِبــاؤه
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أمبيــح
قتــل
العاشـقين
بفـاتر
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وســنان
يهــزأ
بـالقلوب
مضـاؤه
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عطفــاً
علــى
صــب
خفـرت
ذمـامه
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إن
شــئت
أن
تَبقَـى
عليـه
ذَمـاؤه
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مــا
أَحرقــت
نيــران
خـدك
ورده
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فعلام
خــالط
شــهد
ريقــك
مـاؤه
|
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حاشــاه
يــذوي
والعـذار
سـياجه
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أو
مـا
حيـاه
وقـد
سـقاه
حيـاؤه
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أنـديم
حـي
علـى
الصـَّبوح
فإنَّ
من
|
حــق
النــديم
بـأن
يـرد
نـداؤه
|
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ما
العذر
في
ترك
المدام
وقد
مضى
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شـــهر
الصـــيام
حميـــدة
لألاؤه
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والـدهر
فـي
حلب
كما
تهوى
المنى
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طلـــق
يروقــك
حســنه
وبهــاؤه
|
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والأرض
تَفْهَــق
بالميــاه
كأنهــا
|
أيــدي
وفــود
مليكهــا
وعطـاؤه
|
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يلقــاك
وجــه
ربيعهــا
وكأنمـا
|
خلعــت
علــى
صــفحاته
أضــواؤه
|
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وكأنمـا
الـروض
الوسـيم
إذا
سرى
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ريــاه
أثنــاء
النســيم
ثنـاؤه
|
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وكــأن
غصــن
البـان
حيـن
تهـزه
|
نفحــات
أنفــاس
الريـاح
لـواؤه
|
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فـالطير
تغـرب
فـي
اللحون
كأنّما
|
قـــامت
ترتــل
مــدحه
شــعراؤه
|
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والنَّــوْر
يشــرق
نُــوره
فكأنمـا
|
وَارَى
ســـناه
بــأن
تُــرى
آراؤه
|
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والجـــو
فِضــِّيُّ
الأديــم
كأنمــا
|
للأوليــــاء
ضـــميره
وصـــفاؤه
|
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وكأنّمــا
شــفق
الســماء
سـيوفه
|
خُضــبت
بمــا
سـفكت
بـه
هيجـاؤه
|
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وكـأن
نـور
ذُكـاء
إذ
يبـدو
وقـد
|
شــمل
البســيطة
علمــه
وذكـاؤه
|
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ملــك
عــن
الإســلام
حسـن
دفـاعه
|
ولنــــا
نـــداه
وللإلَـــه
ولاؤه
|
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طلـــق
الأســرة
للصــِّلات
صــباحه
|
صــافي
الســريرة
للصـَّلاة
مسـاؤه
|
|
معصــــومة
أهـــواؤه
مدعومـــة
|
عليــــاؤه
معدومـــة
نظـــراؤه
|
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وســـُمت
بحليــة
جِــدِّه
أجــداده
|
وَســـَمَت
بحســن
إبــائه
آبــاؤه
|
|
يـا
خـابط
البيـداء
أَكـدى
سـعيه
|
فيمــا
يحــاوله
وخــاب
رجــاؤه
|
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أنّــى
تنكــب
بـالمنى
عـن
موقـف
|
هـــذا
ســـناه
مبشــر
وســناؤه
|
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غـازي
بـن
يوسـف
إن
أردت
هدايـة
|
فالصــبح
متضــح
إليــه
فضــاؤه
|
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تــالله
لا
دَجَـت
الحـوادث
بعـدها
|
يومــاً
عليـك
وقـد
دَحَـت
شـهباؤه
|
|
قــف
حيـث
تنشـق
مـن
مقـر
جلالـه
|
أرجــاً
وتشــرق
بـالمنى
أرجـاؤه
|
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فــالروض
ممــدود
يشــوقك
خصـبه
|
والحــوض
مــورود
يَروُقــك
مـاؤه
|
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فاسـجد
إذا
رفـع
الحجـاب
وغض
من
|
عينيـــــك
لا
يعشـــــيهما
لألاؤه
|
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ولثَــمَّ
ســر
اللــه
حيـث
تَبَجَّسـَت
|
ســحب
النــدى
وتقدســت
أسـماؤه
|
|
حيــث
الــرواق
المشــْمَخِرُّ
يحفـه
|
شــرف
يؤســس
بــالنجوم
بنــاؤه
|
|
للــه
أبلــج
يوســفي
لــم
يـزل
|
يرجــى
ويخشــى
بأســه
وســخاؤه
|
|
حَنِــقٌ
علـى
بـذر
النضـار
كأنمـا
|
أمــواله
يــوم
النــدى
أعـداؤه
|
|
آأبــا
المظفـر
دم
لملـك
أعـوزت
|
لــولاك
مــن
كـل
الـورى
أكفـاؤه
|
|
لا
تلزمنـــي
وصــف
مجــدك
إنــه
|
يُعْيِـي
البليـغَ
ويُعْجِـزُ
استقصـاؤه
|
|
شـــكراً
لأيــام
لــديك
أقمننــي
|
فــي
ظــل
ملــك
ضـوعفت
نعمـاؤه
|
|
ظــل
لــو
أنَّ
الأفـق
تعقـل
شـهبه
|
لتشـــرفت
لمـــواقفي
جـــوزاؤه
|
|
فظلالـــهُ
أن
أســـتزيدك
نــائلاً
|
ونــداك
عنــدي
فيضــه
ونمــاؤه
|
|
فتهــنَّ
أعيــاد
الزمــان
فلا
خلا
|
مــن
دســت
ملكـك
سـعده
وبهـاؤه
|
|
وســلمت
للــدنيا
فأقصـى
سـؤلها
|
ملــك
بقــاء
المكرمــات
بقـاؤه
|