|
وطنـي
أنـت
الحـبيب
الـدائمُ
|
لـك
فـي
قلـبي
المقام
الأشرفُ
|
|
وغرامـــي
بـــك
طبـــع
لازمُ
|
ســـرني
أنـــي
بــه
متَّصــفُ
|
|
لــك
أســعى
دائبـاً
مجتهـدا
|
برجــــاء
ثـــابت
مقتـــدرِ
|
|
لا
أبــالي
فـي
طريقـي
أبـدا
|
طـال
ليلـى
أو
تمـادى
سـهري
|
|
وإذا
قـدر
لـي
عنـك
ارتحـالْ
|
كنــت
مجبـوراً
عليـه
مكرهـا
|
|
وإن
امتـد
بـي
البعـد
وطـالْ
|
لــم
يزدنــي
بــك
إلا
ولهـا
|
|
فيــك
مــا
أنشـده
مـن
غـزلِ
|
ظنــه
الســامع
فـي
ذات
دلالْ
|
|
مفصــحاً
عــن
حبـك
المشـتعلِ
|
فـي
فـؤادٍ
ليَ
لا
يشكو
اشتعالْ
|
|
وعلــى
حسـنك
أبـدى
الحـذرا
|
مـن
عـدو
طامـح
العيـن
عنيدْ
|
|
يبتغــي
الشـر
ليقضـي
وطـرا
|
دونـه
جيشك
ذو
البأس
الشديدْ
|
|
وطنــي
أفــديك
بـالروح
إذا
|
مســَّك
الـدهر
بسـوء
لا
يطـاقْ
|
|
وأرى
اللــذة
فـي
دفـع
الأذى
|
عنك
بالنيران
والبيض
الرقاقْ
|
|
فيــك
أديــت
حقوقـاً
للهـوى
|
طـوع
ما
يقضي
به
سكر
الشبابْ
|
|
مطلـق
الرغبـة
مشـتد
القـوى
|
آخـذاً
مـن
كـل
مـا
لـذ
وطابْ
|
|
فــي
رفـاق
كمصـابيح
الـدجى
|
أو
لآلـي
التاج
أو
زهر
الربى
|
|
فتيــة
أهــل
ســماح
يرتجـى
|
ودُّهــم
لا
يعرفــون
الغضــبا
|
|
كــم
تثنينــا
بأغصـان
شـدا
|
فوقهــا
الطيـر
بلحـن
مطـربِ
|
|
وتلاعبنـــا
بـــرملات
بـــدا
|
نورهــا
يبهــر
مثـل
الـذهبِ
|
|
وترامينــا
بزهــر
كـم
شـفى
|
بشـــذاه
قلــبَ
صــبٍّ
عاشــقِ
|
|
وأدرنــا
بيننـا
كأسـاً
صـفا
|
لونهـا
مثـل
الزمـان
السابقِ
|
|
أي
خيراتـــك
عنــدي
أذكــرُ
|
إنهــا
أكـبر
مـن
أن
تحسـبا
|
|
هــل
إذا
قضـَّيتُ
عمـري
أشـكرُ
|
فضـلها
أقضـي
لهـا
مـا
وجبا
|
|
دمــت
يـا
نيـل
أبـر
الأنهـرِ
|
بنفــوس
كـم
رأت
منـك
وفـاءْ
|
|
دمـت
تجـري
يـا
شبيه
الكوثرِ
|
مهـدي
الـوادي
هنـاء
ورخـاءْ
|
|
دمـتِ
يا
صحراءُ
ميدانَ
الجنودْ
|
بيـن
قطريـكِ
اللـذينِ
اتحـدا
|
|
مظهـراً
للبـأس
مـن
بيض
وسودْ
|
يضـمن
النصـر
لنـا
والسؤددا
|
|
يـا
لـواء
العـز
إنـي
أعشـقُ
|
نـورك
السـاطع
يا
شكل
الهلالْ
|
|
مهجــتي
مثلــك
بـاتت
تخفـقُ
|
كلمــا
هبـت
جنـوب
أو
شـمالْ
|
|
مصـر
يـا
مسـقط
رأسي
دمت
في
|
حـوزة
العبـاس
حاميك
السعيدْ
|
|
الأميــر
العــادل
المؤتلــفِ
|
بالإمـام
المرتضى
عبد
الحميدْ
|
|
جـادت
السـحب
ثـراك
الطيبـا
|
وسـقت
واديَـكِ
الخصـب
الوسيمْ
|
|
وســرت
فيـك
تراويـح
الصـبا
|
ونمـت
فيـك
أسـاليب
النعيـمْ
|