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فــؤادٌ
ذكــيٌّ
شــاعر
نــاثر
حــرُّ
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ولكنــه
بــالعلم
والفضــل
مغـترُّ
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يـتيه
علـى
الإخـوان
كبراً
ولم
يكن
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ليخفـض
مـن
مقـداره
التيه
والكبر
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فكــان
لـه
مـن
مجـده
خيـر
شـافع
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لــديهم
ومــن
آيــاته
لهـم
صـبر
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إذا
هجـــروه
ســاعة
زاد
ميلهــم
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إليـه
فعـادوا
بالمعاذير
واضطروا
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ولــو
تركـوه
واغتنـوا
عـن
وداده
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لكــان
لــه
عمــا
تعــوده
زجــر
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تمـادى
يـرى
أن
ليس
في
الأرض
مثله
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وأن
ليـس
إلا
ذكـره
فـي
الورى
ذكر
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فمــا
كــان
إلا
أن
تنــاول
عجبُـه
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أبــاه
فأمسـى
سـاخراً
منـه
يَـزْوَرُّ
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يعيــره
بالجهــل
حينــاً
ويعتـدي
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عليـه
بمـا
تـأبى
المـروءة
والبر
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تحكَّـــم
فيـــه
مســتبداً
برأيــه
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وصـار
لـه
فـي
بيتـه
النهي
والأمر
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ولــم
يقتنــع
حـتى
تطلـع
طامعـاً
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إلـى
سـَفَرٍ
يرقى
العلى
بعده
السُفْرُ
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فقــال
أبــي
جربـت
مصـر
وأهلهـا
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فلـم
ترضـني
مصـر
ومـا
وسـعت
مصر
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وعنــدي
إلـى
بـاريس
شـوقٌ
لعلنـي
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أرى
راحـة
فيهـا
بمـا
أبدع
العصر
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فقـال
أفـي
وسـعي
منالـك
بعـد
ما
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بـدا
لـك
من
ديني
فديني
هو
العذر
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فـإن
كنت
طمّاحاً
إلى
المجد
فارتزق
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يعنـك
علـى
آمالـك
المـال
والوفر
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فقـال
إذا
لـم
تعطني
المال
راضياً
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تفـرق
شـمل
الأهـل
واسـتحكم
الشـر
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فبـع
مـن
حُلِي
أختي
أو
ارهَنْ
فإنني
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مُصـرٌّ
علـى
عزمـي
وإن
ثقـل
الـوزر
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فبــاع
أبــوه
مكرهـاً
بعـض
ملكـه
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وفـي
صـدره
غيـظ
يضـيق
بـه
الصدر
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وقــال
بُنَـيَّ
ارحَـلْ
بسـخطي
مـزوداً
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فقـال
وداعـاً
أيهـا
الوالـد
الغر
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فنــادى
أبــوه
لا
ظفــرت
ببغيــة
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ونالــك
ممـا
غـرك
الهـون
والضـر
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فســار
الفــتى
ليلاً
وعـاج
بقريـة
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لـه
مبغـض
فيهـا
وقـد
طلـع
الفجر
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وكـانت
صـلاة
العيـد
فاضـطر
مسرعاً
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إلى
مسجد
فيه
الْتَقى
البدو
والحضر
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فلاقــى
خطيبـاً
بالخرافـات
واعظـاً
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فصـاح
بـه
اسـكت
إن
مـا
قلته
كفر
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وقـد
حسـبوه
حاكمـاً
فـاحْتَفَوا
بـه
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ومـا
راعـه
مـن
خصمه
النظر
الشزر
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وكــان
خطيــب
القــوم
عـمَّ
عـدوِّه
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فعــز
عليــه
أن
يضــيع
لـه
قـدر
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فنــاداهم
يــا
قـوم
هلا
امتحنتـم
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مكــذب
عمــي
فـانجلى
لكـم
السـر
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علـــيّ
إذا
طـــاوعتموني
جــداله
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ومـا
لـي
عليكـم
إن
ظفـرت
به
أجر
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فجـاء
مـن
الطيـن
الكريـه
بقطعـة
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وقـال
أجبنـي
إن
تشـأ
ولـك
الشكر
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تــرى
عرضــاً
أم
جــوهراً
فأجـابه
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أرى
جــوهراً
لا
شــك
فيـه
ولا
نكـر
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فقال
اعجبوا
يا
قوم
من
حكم
ضيفكم
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ففـي
مثـل
هذا
الحكم
يضطرب
الفكر
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فهــاجوا
عليـه
بالحصـا
يرجمـونه
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كمـا
هاج
في
ميدانه
الجحفل
المَجْر
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فلــم
ينصــرف
إلا
مهانــاً
محقـراً
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وفـي
وجهـه
جـرح
وفـي
رجلـه
كسـر
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وقـــد
ســـلبوه
مــاله
وثيــابه
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فعـاد
إلـى
أهليـه
يخجلـه
الفقـر
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وكــان
لـه
مـن
ذلـك
الخطـب
رادعٌ
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فعـاش
كمـا
يرجـو
وسـالمه
الـدهر
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