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أطرقــي
أطرقـي
فقـد
ضـمك
الـل
|
ل
وألقــى
عليــك
ثــوب
ظلامــه
|
|
أطرقـي
فالحيـاة
فـي
قلبك
المظ
|
لـم
مـا
تـت
مـوءودةً
فـي
حطامه
|
|
يـا
بنـة
القفـر
مزّقتـك
سـوافي
|
ه
فلا
تـــذكري
أســـى
أيّـــامي
|
|
واقبعـي
فـي
غيـاهب
الليـل
حتى
|
يشــرق
الفجـر
مـن
وراء
غمـامه
|
|
اقبعـى
هـا
هنـا
ولا
تفغـري
فـا
|
ك
بقـــول
مســـتحدث
أو
معــاد
|
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ودع
الليــل
مثلمـا
جـاء
يمضـى
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والبســي
مـن
دجـاه
ثـوب
حـداد
|
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ودعينـي
أصـغي
إلـى
همسـه
الحا
|
ئر
بيـــــن
الآزال
والآبـــــاد
|
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لا
تضـــجّى
ولا
تضـــيقي
بصــمتي
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فهـــو
زادي
وعـــدّتي
وعتــادي
|
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دونـك
الكـأس
فاشـربيها
وذوقـي
|
لـذّة
المـوت
فـي
ثنايـا
الرحيق
|
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اشــربيها
فــأنت
قصــّةُ
دنيــا
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هـا
ونـامي
فـي
حضنها
واستفيقي
|
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واســأليها
فعنــدها
علـم
أيّـا
|
مـك
منـذ
التقيتمـا
فـي
الطريق
|
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اســـأليها
ولا
تكفّـــى
بكـــاء
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فـــوق
أطلال
فجـــرك
المشــنوق
|
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قصــّة
الكـاس
أنـت
مثّلتهـا
يـو
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مــاً
فقـد
كنـت
مثلهـا
للجميـع
|
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يـوم
كـان
الزمـان
فيـك
ربيعـا
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عبقريّـــاً
وكنــت
روح
الربيــع
|
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دفنــت
عطـرك
الأعاصـير
يـا
بـل
|
هـاء
فـابكى
واسـتمتعي
بالدموع
|
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وإذا
شـئت
أن
تعيشـي
علـى
الوه
|
م
فغنّــى
قبـل
انطفـاء
الشـموع
|
|
لا
تثـوري
علـى
الحيـاة
فقـد
جفّ
|
ت
زهــور
الحيــاة
فـي
راحتيـك
|
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كنــت
والحسـن
والشـباب
فأصـبح
|
ت
ومــا
مــن
أولاء
شــيء
لـدَيك
|
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فاعذري
الناس
إن
مضوا
عنك
لا
يل
|
وون
فــالنور
مــات
فـي
عينيـك
|
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ودعـي
الـذكريات
تقتـات
مـا
أب
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قــت
أفــاعي
الظلام
فـي
شـفتيك
|
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لـم
يعـد
فيـك
مـا
يسّر
العيونا
|
فاعـذري
العابثـات
والعابثينـا
|
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نســلت
ريشــك
المنايـا
وأبقـت
|
جســدا
هالكــاً
وروحــاً
حزينـا
|
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وبقايـــا
قلــب
وأشــلاء
نفــس
|
وشــعاعا
تحــت
الرمـاد
سـجينا
|
|
وحطامــا
قـد
عَضعَضـَته
الرزايـا
|
يتنــــزّى
مـــدامعا
وأنينـــا
|
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فـإذا
مـا
أعيـاك
خبـث
الغواني
|
فــاغمري
كيــدهنّ
صـفحاً
ولينـا
|
|
وإذا
أيقظـــت
شـــجونك
حــورا
|
ء
وأغــرت
بقبحــك
الشــامتينا
|
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فاســخري
مــن
جمالهـا
وصـباها
|
واحقريهــا
بكــثرة
العاشـقينا
|
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أو
عظيهــا
فــربّ
شــيطانة
مـن
|
كُــنّ
قــالت
فـأبكت
الواعظينـا
|
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حــدّثيها
عــن
الهـوى
والرفـاق
|
والليــالي
والخمــر
والعشــّاق
|
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وجســـوم
أشــقيتها
بالتنــائي
|
وجســـوم
أســـعدتها
بــالتلاقي
|
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حـدثيها
عـن
كـل
شـيء
سـوى
الح
|
ب
فمــا
عنــدكن
غيــر
النفـاق
|
|
حـدثيها
عـن
الفتى
الناعم
المم
|
راح
نـــذل
العواطـــف
الأفّــاق
|
|
كيــف
أغــراك
ذات
ليــل
وولّـى
|
هاربــاً
مــن
عفافــك
المهـراق
|
|
تاركــاً
ثوبــك
الممــزّق
للنـا
|
ر
وعصـــف
الريـــاح
والأشــواق
|
|
حـدّثيها
مـا
دام
فـي
كوكب
العم
|
ر
شــــعاع
مهـــدّد
بالمحـــاق
|
|
ثـم
غيـبي
عـن
زحمة
الموكب
الأع
|
مــى
وعيشــي
للحــزن
والإطـراق
|
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أطرقــي
أطرقـي
فقـد
ضـمّك
الـل
|
ل
وألقــى
عليــك
ثــوب
ظلامــه
|
|
أطرقـي
فالحيـاة
فـي
قلبك
المظ
|
لـم
مـا
تـت
مـوءودةً
فـي
حطامه
|
|
يـا
ابنـة
القفـر
مزقتـك
سوافي
|
ه
فلا
تـــذكري
أســـى
أيّـــامي
|
|
واقبعـي
فـي
غيـاهب
الليـل
حتى
|
يُشــرِق
الفجـر
مـن
وراء
غمـامه
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