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خِلـتُ
نفسـي
يومـاً
إلهـا
عظيمـا
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قــاهر
الحــول
نافــذ
الأحكـام
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واسـتوينا
أنـا
ومجدي
على
الخل
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قِ
نثسـوّى
مـا
بينهـم
مـن
خصـام
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ورأينــا
الشــرور
أم
البلايــا
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ومعيــــــن
الأحقـــــاد
والآلام
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فاتفقنـا
أنـا
ونفسي
على
الخير
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ومحــــو
الشــــرور
والآثـــام
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فـانبرى
كل
ما
حوى
الكون
والده
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ر
يغنــي
لحــن
الرضـا
والسـلام
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وإذا
بـــي
أحــس
بعــد
عهــود
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أن
ذاتـــي
موصـــولة
بالأنــام
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أنـا
خيـر
محـضٌ
ومـن
هـم
عبيدي
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ليــس
الشــر
بينهـم
مـن
مقـام
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لـم
تعـد
بيننـا
فروق
سوى
القد
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رة
ســـرّ
الإيجـــاد
والإعـــدام
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فتســاءلت
كيــف
أنمــاز
منهـم
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ورائي
خيـــــارهم
وأمـــــامي
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وكـأن
الشـرور
ضـاق
بهـا
الصـم
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ت
فهبّـــت
مــن
ســالف
الأيــام
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ثـم
قـالت
يا
رب
لا
خير
في
الخي
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ر
إذا
لــم
تحطـم
قـواه
سـهامي
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وامــتزاجي
بــه
وكــونيَ
فيــه
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ولــك
العلــم
أصــل
كـل
نظـام
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وكـأني
سـمعت
فـي
صـوتها
المـخ
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نــوق
أصــداء
حكمــتي
وكلامــي
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قلـتُ
فلتَهبِـط
الشـرور
إلـى
الأر
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ض
ألا
وليحــي
السـنا
فـي
الظلام
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وليــدم
ذلـك
الصـراع
علـى
الأر
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ض
إلــى
أن
يحيـن
بـدء
الختـام
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وبهــذا
يخلــو
لخيــريَ
وجهــي
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وعلـــى
الأرض
لعنـــتي
وســلامي
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كـان
حلمـا
أفقـتُ
منـه
علـى
صو
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تٍ
قـديم
الصـدى
بعيـد
المرامـى
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لـم
يكـن
فـي
الإمكـان
أبدع
مما
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كــان
فاخضــع
لحكمـتي
ونظـامي
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ذاك
كـوني
فاسـتفت
ذاتـك
من
أن
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ت
تجـــدها
مشـــلولة
الإلهــام
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وإذا
مـــا
أبيـــت
إلا
جموحــا
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فامتشـق
مـن
حجـاك
أمضـى
حسـام
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واضرب
الليل
والنهار
بحديّه
ومز
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ق
بـــــه
خــــدور
الغمــــام
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فـإذا
مـا
شـارفت
أفقـي
فحوقِـل
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واســـتعذ
مـــن
ضـــلالة
الأحلام
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وبحسـبي
أن
أنسـخ
النـور
في
عي
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نيــك
حــتى
يصــير
محـضَ
قتـام
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وإذا
أنــت
حيــث
كنــت
غريــقٌ
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فــي
بحــار
الشــكوك
والأوهـام
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قلـت
يـا
ربّ
إن
لي
في
رضا
العا
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جـــز
ظلّاً
يطيــب
فيــه
مقــامي
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فـاغتفر
لـي
فقـد
تلاشـت
حماقـا
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تــي
وعفــواً
إذا
فقـدت
زمـامي
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واكفنــي
شــرّ
فكــرة
مثّلتنــي
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قــاهر
الحــول
نافــذَ
الأحكـام
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