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قــدمت
بالاقبـال
والعـز
معـا
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فكنــت
خيـر
ذاهـب
قـد
رجعـا
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فــالف
اهلا
بــك
مــن
مزدلـف
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يَرمـي
الجمـار
فـي
منى
تطوعا
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وَيالَــك
البشـرى
بمـا
خـولته
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مسـتلما
ذاك
الصـفيح
الارفعـا
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ملبيـــا
لِلَّــه
حــول
بيتــه
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يـا
خيـر
مـن
طـاف
ولبى
وسعى
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يممتــه
نافلــة
فكنــت
مــن
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ذى
الفرض
ذاك
المتواني
اسرعا
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فَلَـم
تَـزَل
تطـوي
الفلاة
والها
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وفــي
ذميــل
اليعملات
مولعـا
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حــتىّ
اصــبت
مـن
شـعاب
مكـه
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مـا
شـعب
الفـواد
حتىّ
انصدعا
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وجـداً
لهاتيـك
الـديار
انهـا
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كـانَت
لاقمـار
السـماء
مطلعـا
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ديــار
اهليــك
الالـى
بسـرهم
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قـد
امسك
اللَه
السما
ان
تقعا
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طــوبى
لــذياك
الصـعيد
انـه
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بالمســك
مــن
وطـأته
تضـوعا
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وَنــالَت
البشــرى
بطـاح
مكَّـة
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هَــذا
محمــد
اليهــا
رجعــا
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شـد
لـذي
الجحفـة
فضـل
ميـزر
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فحــل
اوزار
العبــاد
اجمعـا
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وان
قومـــا
فيهـــم
محمـــد
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لـو
نـزل
العذاب
عنها
ارتفعا
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يـا
ايُّهـا
السـالك
في
منهاجه
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ينشـر
نهجـا
للنـدى
مـا
شرعا
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جــاء
مـن
الجـود
بكـل
بدعـة
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مـا
ضـل
مـن
يستن
تلك
البدعا
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ينحــر
للضــيفان
كــل
ليلـة
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مثنــى
ويـزداد
عطـاء
اربعـا
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لـو
ادعـى
المجـد
سـواه
مـدع
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رد
لسـان
المجـد
ذاك
المـدعى
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فسـل
بـه
البيـداء
اذ
ينبتها
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نــداه
بالـدهن
صـحافا
شـرعا
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لكنــه
مــتى
اِســتقل
ذاهبـا
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لا
ينبـت
الرَبيـع
منهـا
مربعا
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فَيــا
لطيـف
الطبـع
لا
احسـبه
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الا
علــى
خلـق
النسـيم
طبعـا
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ان
الحمــى
بعـدك
ضـاق
رحبـه
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ذرعـا
واذ
نزلـت
فيـه
اتسـعا
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والحلـة
الفيحـاء
لو
قد
علمت
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ســارَت
باهليهـا
اليـك
خضـعا
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هبـوا
اهيـل
الـود
مـن
فياحة
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مــا
ضـمنت
الا
بليغـا
مصـقعا
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حــتىّ
كــان
حيــدرا
اعارهـا
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لسـانه
ذاك
البـديع
المبـدعا
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يـا
من
نهني
الدين
بابن
كهفه
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وكهفــه
كــان
الاعـز
الامنعـا
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مسـتودع
السـر
الَّـذي
في
روعه
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كـانَ
ضـَمير
الغيـب
سرا
مودعا
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ومظهـر
النـور
الَّـذي
اوهمتـه
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مـن
جـانب
الطـور
لموسى
لمعا
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المســتطيل
شــرفا
مـن
دونـه
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لـو
حلـق
النسـر
كبـا
فلا
لعا
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الراشـد
المهـدي
والقطب
الَّذي
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قـام
باعبـاء
الهـدى
مضـطلعا
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فاصـدع
ولـي
الامـر
بالامر
فمن
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احـق
منـك
بالهـدى
ان
يصـدعا
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وليتلاف
المجــد
منــك
جعفــر
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ولا
اقــول
البحـر
سـاء
جرعـا
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فـالبحر
لـو
سـاورت
منه
غرفة
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تــذهب
بالامعــاء
او
تقطعــا
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وَذاكَ
عـــذب
ســـائغ
شــرابه
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اوحــى
لكــل
غلـة
ان
تنجعـا
|
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فَلَــم
يكـن
الا
امامـا
صـادقا
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يــأوي
اليـه
كـل
مـت
تشـيعا
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ولَــم
يكـن
للـدين
الا
صـالحا
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يملأ
آفــــاق
البلاد
ورعــــا
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ذاك
ابـو
الهادي
ومن
عن
مثله
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قـد
عقمـت
ام
العلـى
ان
تضعا
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فمـا
اِستشـف
منـه
وجـه
ابلـج
|
الا
وقيــل
بــدر
ثــم
طلعــا
|
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ولـو
اعـار
البـدر
مـن
جبينه
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مـا
خسـف
البـدر
فعـاد
اسفعا
|
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وَبالحســين
مــن
شـعاع
نـوره
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لَـو
قابل
الشمس
ابت
ان
تطلعا
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ذاكَ
الَّــذي
اذ
ولــدته
امــه
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عـدت
ابـاة
الضيم
منها
اربعا
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الواصـلين
المجـد
بالمجد
ولو
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نيــط
بغيــر
هاشــم
لانقطعـا
|
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فَلَـم
تقـم
انـثى
عـن
ابن
حرة
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كمثلهــم
مــتى
اسـتهل
برعـا
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ولَــم
تلــد
مرضــعة
كمثلهـم
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مــن
طيــبين
مولـدا
ومرضـعا
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يـا
عصـمة
اللاجين
من
اخوالهم
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وعـدة
الداعي
اذا
الداعي
دعا
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وَالقـائمين
الليـل
امـا
سجدا
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لِلَّــه
تعظيمــا
وامــا
ركعـا
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مـن
انجـم
مـا
شـع
منها
كوكب
|
الا
وفــرق
الافـق
منهـا
نصـعا
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ولا
اِسـتهل
الـودق
من
ايمانهم
|
الا
الحيـا
منـه
حيـاء
اقلعـا
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قــرت
بـه
اعينكـم
مـن
قـادم
|
مـن
بعـده
طـرف
الهدى
ماهجعا
|
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فَمـــا
برحــت
شــغفا
اضــمه
|
ضــم
الكمـي
سـيفه
ان
يقطعـا
|
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وَكَـم
اذلـت
فرحـا
مـن
ادمعـي
|
يــا
رب
فرحـة
اذالـت
ادمعـا
|
|
فَيـا
رَعـاك
اللضـه
مـن
مغترب
|
آب
الـى
الأهليـن
شـوقا
مسرعا
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