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يـــــــا
نســــــيم
الأطلال
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إن
جـزت
باللَه
حي
ربة
الحال
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طـــــاب
منــــي
البــــال
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لمـا
تنشـق
روحـك
الـذي
مال
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منـــــه
غصـــــن
ميــــال
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فــي
وســط
قلـبي
لاذ
ولا
زال
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يـــا
نســـيم
قـــد
طـــال
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شـوقي
وحـالي
مـن
بعدها
حال
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بغيــــــــة
المـــــــتيم
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عقلـي
بهـا
طول
الزمان
مغرم
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حبهـــــــــا
تحكــــــــم
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ومـازج
اللحم
والعظام
والدم
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شــــــــأنها
معظــــــــم
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لو
شاهد
الكافر
جمالها
أسلم
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مـــــا
بهـــــا
تبــــدال
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هـي
مطلـبي
في
صدها
والإقبال
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كعبـــــــة
المحاســـــــن
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مـا
خلـت
قلبي
عن
هواك
ساكن
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ضـــــــاقت
المســـــــاكن
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عليــه
حـتى
مـل
مـن
يسـاكن
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يـــــا
عـــــذول
بــــائن
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فــإنني
للعــذل
غيـر
راكـن
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أنــــــت
والنــــــبي
زال
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فـي
عـذل
مثلي
عاجلتك
الآجال
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يـــــا
رفيـــــق
ســــاعد
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وسـر
بنـا
حـتى
عسـى
نشـاهد
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ونـــــــرى
المعاهـــــــد
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وننظـــر
الأعلام
والمشـــاهد
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منتهـــــــى
المقاصــــــد
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يـوم
انهاضـك
للربـوع
قاصـد
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ســـــر
وخلــــف
المــــال
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والأهـل
خلف
الظهر
لا
تكن
ذال
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مـــــن
هـــــوى
يخــــاطر
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بالكـل
فـي
المحبوب
لا
يحاذر
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فــــي
الهــــوى
معاشــــر
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لكنهـــا
أنــوار
للســرائر
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ليـــــس
ثـــــم
خاســـــر
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الكــل
رابــح
واصـل
وسـائر
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ذي
ســــــبيل
الأبــــــدال
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الأوليـا
أهـل
الصفا
والأحوال
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