|
فاتحـة
الحمـد
أيـادي
مـن
عفـى
|
والحلــم
أصـل
للمقامـات
العلا
|
|
يزدهـــر
المجــد
بزهراويهمــا
|
مثـل
انجلاء
الشمس
في
راد
الضحى
|
|
مـا
نتجـت
من
يعرف
المجد
النسا
|
لـو
كـان
خلـواً
منهمـا
عمن
عصى
|
|
مــائدة
الاحســان
مــن
باسـطها
|
فضل
وأزكى
الفضل
ما
يولى
الرضا
|
|
قـد
ضـل
كالانعـام
مـن
لا
يهتـدي
|
إن
حلــوم
ابـن
ثـويني
كالهـدى
|
|
حمــد
الســلطان
مــن
أعرافــه
|
والفيـض
مـن
عرفـانه
غيث
الورى
|
|
انفــاله
الممالـك
العصـم
ومـا
|
أنفـــاله
إلا
ملثـــات
الحيــا
|
|
ويقبــل
التوبــة
مــن
مخلصـها
|
ولـو
يكـون
الـذنب
اعداد
الحصا
|
|
كـم
مـن
غريـق
مشـبه
يـونس
فـي
|
ظلمـــة
غمـــه
دعـــاه
فنجــا
|
|
ملـك
أبـو
الملـوك
مـن
أجـداده
|
هـود
ونعـم
المنتمـي
والمنتمـى
|
|
مـن
خـاتم
التعبيـد
للـدنيا
له
|
إن
كـان
بالاقبـاط
يوسـف
اكتفـى
|
|
مــن
كفـه
الفيـاض
سـحب
رعـدها
|
زمـازم
الصمصـام
فـي
هام
العدا
|
|
مــن
فضــله
فـي
فضـل
كـل
أمـة
|
كمثــل
ابراهيـم
فيمـن
قـد
خلا
|
|
مــن
غــادرت
هيبتــه
أعــداءه
|
مثـل
صحاب
الحجر
صرعى
في
الفلا
|
|
مســوم
الجـرد
العـوادي
عنـدها
|
مثـل
لعـاب
النحـل
مسفوح
الطلا
|
|
اســراؤها
للشــرف
الأقصــى
بـه
|
تتبــع
آثــار
بــراق
المصـطفى
|
|
فنــاؤه
كهــف
الطريــد
وكــذا
|
كــل
حمـي
الأنـف
مقصـود
الحمـى
|
|
لــو
هـز
بـالنجم
تسـاقطت
كيـو
|
م
أســقط
الجـذع
لمريـم
الجنـى
|
|
كـــان
طـــه
أنزلـــت
واصــفة
|
يمينـه
لمـا
علـى
الملـك
استوى
|
|
اســتغفر
اللّــه
تكــاد
نفســه
|
بســمت
هــدي
الأنبيــاء
تجتلـى
|
|
رحــــابه
مشــــاعر
قدســــية
|
مــن
فـرض
الحـج
اليهـن
اهتـدى
|
|
قـد
أفلـح
الـدهر
بـه
والمؤمنو
|
ن
وفلاحـا
لكـون
فـي
يمـن
الهدى
|
|
تشعشــع
النــور
بــوجهه
فمــا
|
بالشـمس
مـن
نور
فمن
ذاك
السنا
|
|
هــداه
فرقــان
وحــد
سـيفه
ال
|
فـاروق
فـي
محـص
الضـلال
والعمى
|
|
صــفاته
يعجــز
عنهـا
الشـعراء
|
مثـل
عجـز
النمـل
عن
قضى
الحصا
|
|
وكــم
لــه
مــن
مجــده
وفضـله
|
مــن
قصــص
لا
ينتهـي
إلـى
مـدى
|
|
لــو
جـذب
الـدهر
بـأدنى
عزمـة
|
دك
كـــبيت
العنكبـــوت
ووهــى
|
|
إذا
تجلـــى
فارســـاً
تحشــرجت
|
ممالــك
الــروم
بغصــة
الـردى
|
|
حكمـــة
لقمــان
فريــد
نطفــه
|
تحيـا
بهـا
جـرز
القلوب
كالحيا
|
|
أحزابــه
النصــر
فــإن
تحزبـت
|
أعــداؤه
تفرقــت
أيــدي
ســبا
|
|
ومــن
يكــن
فــاطر
كــل
فطـرة
|
نصــيره
أعجــز
أصــناف
القـوى
|
|
يســتقبل
العــافي
مــن
رحمتـه
|
بقلــــب
يــــس
ولا
يعـــرف
لا
|
|
لــو
الــدراري
نزلـت
صـفت
لـه
|
فصــفا
فأغزاهـا
مراكـز
الكـرى
|
|
ومــن
يــك
الصـاد
مصـيد
عزمـه
|
فليـس
بـدعاً
أن
يصـيد
مـا
عـدا
|
|
لــو
عارضـته
زمـر
الخطـوب
مـا
|
كـانت
سـوى
أكلـة
مـا
ضغ
الشبا
|
|
أيـــامه
أعيـــاد
كــل
مــؤمن
|
يغتبــط
الــدين
بهــن
والتقـى
|
|
جـــواهر
قـــد
نظمــت
وفصــلت
|
بالعـدل
والاحسـان
في
سلك
الهدى
|
|
لعقلـــــه
وهمــــه
وعزمــــه
|
شـورى
فعيـن
الرشـد
مـا
به
قضى
|
|
لا
يزدهيــه
زخـرف
الـدنيا
ومـن
|
يبـذلها
لـم
يثنـه
منهـا
الزها
|
|
كــم
مــن
دخــان
فتنـة
جاثيـة
|
جـــثي
الاحقـــاف
جلاه
فــانجلى
|
|
قــام
بمــا
جــاء
بــه
محمــد
|
للّــه
واســتن
بــه
فيمـن
رعـى
|
|
نــاداه
عـون
اللّـه
وهـو
أهلـه
|
إنـا
فتحنـا
لـك
فتحاً
في
العلا
|
|
ولــم
يــزل
فــي
حجـرات
مجـده
|
أحــوط
مــن
قـد
نـداه
والسـخا
|
|
والــذاريات
الحــاملات
وقرمــا
|
يرومـــه
عــزائم
شــم
الــذرى
|
|
ينــدك
دك
الطــور
مــا
تصـدمه
|
ولـو
ترقـت
فلـك
النجـم
انـزوى
|
|
ولــو
تعـاطى
القمـر
اهتمامهـا
|
لا
نشـق
أو
بهـرام
أهـوى
أو
كبا
|
|
حـتى
دنـى
الرحمـن
مـن
حيث
دنى
|
فوضــع
التــاج
عليــه
واجتـبى
|
|
واقعــــة
خافضــــة
رافعــــة
|
تنكـس
الشـرك
بهـا
علـى
الشـوى
|
|
صـبت
علـى
الكفـر
سـيولاً
من
حدي
|
د
الهنـد
حـتى
بلغ
السيل
الزبى
|
|
تجــادل
الأزمــان
فــي
ظهورهـا
|
ومــا
درت
أن
الرصــيد
بالشـرى
|
|
ومـــا
درى
الكفـــر
أن
أول
ال
|
حشــر
دهـاه
والعظيـم
مـا
دهـى
|
|
ممتحـــن
الأمـــر
لــه
دوابــر
|
كمــــاله
قوابــــل
لا
تتقـــى
|
|
وصـــف
أمــر
اللّــه
لا
تنقضــه
|
جمعــة
شــرك
ونفــاق
مـن
عتـا
|
|
تغــابن
العصـور
فـي
دولـة
قـو
|
م
طلقـوا
الـدنيا
وحرموا
الرخا
|
|
قــد
وقـع
الملـك
علـى
منشـوره
|
مـن
الشـؤون
إذ
تغـادروا
للعلا
|
|
اثــال
نـون
مـا
اقتنـوا
وقلـم
|
إن
أثــالاً
منهمــا
كنـز
الوحـا
|
|
حقـــت
لهـــم
جلالـــة
وصــولة
|
تنــاولت
بحولهــا
رأس
الســهى
|
|
يـــا
ملكـــاً
لعـــزه
معــارج
|
تجــاوز
النجـم
فـأين
المنتهـى
|
|
لا
عاصــم
اليــوم
لمــن
تطـرده
|
كخطــب
نــوح
وابنـه
لمـا
غـوى
|
|
مــن
ضــحت
الجــن
لهـول
بأسـه
|
فالبشــر
الضـعيف
أدنـى
للـردى
|
|
يـــا
ملكـــاً
مـــزملاً
مــدثراً
|
بـالحلم
أنت
اليوم
أحفى
من
عفى
|
|
قـد
قـامت
اليـوم
قيامـة
امـرء
|
لـولا
التأسـي
بالرجـا
منـك
قضى
|
|
لا
يســلم
الانســان
مــن
شـائبة
|
لينظــر
العاقـل
ضـمن
هـل
أتـى
|
|
كــم
زلــة
أعفيتهـا
بالمرسـلا
|
ت
مـن
ريـاح
العفـو
عن
عبد
جنى
|
|
والنبــأ
العظيــم
مــا
عـودته
|
مـن
حلمـك
الشـامل
أي
مـن
عصـى
|
|
والنازعـــات
للنفـــوس
غضـــب
|
منـــك
واعــراض
وطــرد
وقلــى
|
|
عبـــس
دهـــري
وتــولى
جنفــاً
|
فلتحمنــي
منــه
وحســبي
وكفـى
|
|
مـا
كـورت
شـمس
يقينـي
فيـك
مذ
|
أمســكت
منــك
بوثيقـات
العـرى
|
|
دام
انفطـــار
كبـــدي
لنكبــة
|
لــو
صــادفت
قلال
رضــوى
لهـوى
|
|
وصــادف
القضــاء
تطفيــف
زمـا
|
ن
كيلــه
بخــس
وإن
يكتـل
طغـى
|
|
لــولا
وثــوقي
بــك
فـي
صـروفه
|
لانشــق
ذرع
العــزم
منـى
وصـما
|
|
بـــروج
عزمــي
أبــداً
مشــيدة
|
إلا
علـــى
مقتــك
فــالعزم
كلا
|
|
وكيــف
أخشـى
طارقـاً
مـن
زمنـي
|
ووجهــك
الأعلـى
معـاذي
والحمـى
|
|
ومــا
دجــت
غاشــية
مـن
خطبـه
|
إلا
جلا
فجـــر
أياديــك
الــدجى
|
|
لــولا
عســى
عشــت
بــأي
بلــد
|
كــأنني
فيـه
علـى
جمـر
الغضـى
|
|
يـا
ملـك
العـالم
يا
شمس
الهدى
|
يـا
حجـة
اللّـه
علـى
أهل
الدنا
|
|
أدعــوك
والزلـة
ليـل
قـد
سـجى
|
مســتمطراً
منــك
بـوارق
الرضـا
|
|
أطلــب
منــك
فطـرة
فـي
شـقوتي
|
ونظــرة
تلمــح
فيهــا
والضـحى
|
|
وفــي
ألــم
نشــرح
وقصـدي
ووض
|
عنـا
عنـك
وزرك
العظيـم
لا
سـوى
|
|
عفـوك
فـرق
الـذنب
والذي
افترى
|
فـي
آخـر
الـتين
يلقى
ما
افترى
|
|
مـــا
ولغـــت
ناصــية
كاذبــة
|
فـي
علـق
فلـم
يفاجئهـا
الـردى
|
|
وقـــدرك
الأعلــى
أجــل
رتبــه
|
مــن
أن
تـرد
تـوب
عبـد
ارعـوى
|
|
يـا
مـن
لـه
فـي
المكرمـات
آية
|
بينــة
يشــهدها
أولــو
النهـى
|
|
ومــن
إذا
اســتلأم
فــي
لهـامه
|
زلزلـــت
الأرض
وغصــت
بالشــجا
|
|
ومـن
يـثير
العاديـات
في
الوغى
|
كقطــع
الليـل
إذا
الليـل
عسـا
|
|
ومــن
إذا
الخطــب
شـجا
القمـه
|
قارعـــة
تبثـــه
بــس
الســفا
|
|
ومــن
لــه
شــكيمة
مـن
الهـدى
|
تلهيــه
عـن
تكـاثر
فيمـن
لهـا
|
|
ومــن
يزيـد
العصـر
عـن
صـروفه
|
كـــأنه
لأمـــره
عبــد
العصــا
|
|
ومـن
يصـك
خطـوات
الهمـز
واللم
|
ز
بويــل
فــي
قــذال
مـن
خطـا
|
|
ومـــن
ســـيرمي
ربــه
بحــوله
|
أعــداءه
بمـا
بـه
الفيـل
رمـى
|
|
ومـــن
كـــايلاف
قريــش
رحلــة
|
قــد
ألـف
الـبر
وأعطـى
واتقـى
|
|
ومـن
تـولى
اللّـه
واسـتغرق
فـي
|
ايالـة
الـدين
الحيـاة
والقـوى
|
|
ومــن
حبـا
الأكـوان
مـن
عطـائه
|
بكــوثر
ضــاق
بــه
رحـب
الملا
|
|
ومـــن
ردى
الكفـــر
بربانيــة
|
فســقط
الكفــر
بهــا
ولا
لعــا
|
|
ومــن
يــد
اللّــه
امـام
عزمـه
|
بالنصـر
والفتـح
لـه
لمـا
نـوى
|
|
ومــن
إذا
البغــي
شــبا
آونـة
|
تبـت
يـد
البغـي
صـماه
بالشـبا
|
|
ومــن
علــى
الاخلاص
فــي
طـاعته
|
يضـاعف
الحسـنى
ويستقضـي
الغنى
|
|
ومــن
إذا
شــاهدته
فــي
دسـته
|
أيقنـت
أن
الفلـق
الثـاني
بـدا
|
|
ومــن
هــو
النـاس
فمـن
نظيـره
|
منهــم
ومـن
يبلغـه
فـي
مهتـدى
|
|
أقــل
عثــاري
والقـران
شـافعي
|
إليـك
أن
عـز
الشـفيع
المرتضـى
|
|
فليــس
بعــد
كلمـات
اللّـه
مـن
|
وســـيلة
يقبلهــا
ذوو
الحجــا
|
|
وإن
تكــن
مــن
بعــدها
ذريعـة
|
فعصــمة
العفـو
رجـاء
مـن
هفـا
|
|
تجــاوز
القلــوب
عــن
مقــترف
|
وصــفحه
لمجــده
قطــب
الرحــى
|
|
نقيبــة
العفــو
كمــال
جــامع
|
للمجــد
والمجـد
لوجهـك
انتهـى
|
|
ولــم
تفــت
مجــدك
مــن
مزيـة
|
كالفلــك
المحيــط
حـاو
للكـرى
|
|
وثقــت
منــك
بــالتي
عهــدتها
|
مــن
رحمـة
لمـن
أطـاع
أو
عصـى
|
|
ذرة
عفــو
منــك
تمحــو
زلــتي
|
عنـدي
هـي
الـدنيا
وغاية
المنى
|
|
أوردت
هيـــم
أملـــي
صـــادية
|
بحــر
يــديك
وهـو
أروى
للصـدى
|
|
إن
تســقها
العفـو
فـأنت
أهلـه
|
وإن
تـذدها
فعلـى
الحـظ
العفـا
|
|
يــا
مــن
تســترت
بــذيل
عـزه
|
مـن
غيلـة
الـدهر
واشراك
السفا
|
|
وبعـــت
فيـــه
بشــراك
نعلــه
|
دهـري
والـدنيا
ومـن
فوق
الثرى
|
|
ومـــن
رميـــت
غرضــي
بســهمه
|
فصــوب
الســهم
وفـاز
مـن
رمـى
|
|
ومــن
أغظــت
الــدهر
فـي
ولائه
|
غيظـاً
سـقاه
السم
في
كأس
الردى
|
|
أن
يغـــظ
الـــدهر
ولائي
لكــم
|
فلا
شــفى
مــن
غيظـة
ولا
اشـتفى
|
|
قـد
خفـر
الـدهر
الذمام
فانتصر
|
يـا
حـامي
الجـار
غضـنفر
الشرى
|
|
لا
تــذر
الأيــام
تطــوي
طيهــا
|
تختبـط
الكلا
وتعثـو
فـي
الحمـى
|
|
فهـــي
لمـــا
تنفــذه
رهــائن
|
وهــي
ســبايك
بــأطراف
القنـا
|
|
لا
بــرح
الــدهر
علــى
جبهتــه
|
لعــزك
الأعلــى
يقبــل
الــثرى
|