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دَعـاه
فـالهوى
العذري
دعاهُ
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وأرقــه
الجــوى
لا
تعــذلاه
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ومِيلا
بــالملام
علــى
حـبيب
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عســاهُ
يـرقّ
للمضـنَى
عسـاه
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بنفسـي
أفتـدي
رشـأَ
غريـراً
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سـبت
قلـب
المعنـى
مقلتـاهُ
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وظـبي
مـن
بنـي
الأتراك
لمَّا
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رعـى
حـبَّ
الفـؤاد
وما
رعاه
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يصـول
على
الورى
بظُبا
حدادٍ
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فيأســرهم
وعينــاه
ظبــاه
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بعيـر
الظـبي
من
لفتاتِ
جيد
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ويكسـو
البدر
حسناً
من
سَناهُ
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فأضـحى
الظـبي
وهو
له
شبيه
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وبـدر
التِّـم
قـد
أمسى
أخاهُ
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لقـد
جـارت
بـه
الأيـام
حتى
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تلاقـــت
ســاعديّ
وســاعداه
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وظــلّ
مُعَـانِقي
جيـداً
بجيـد
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علــى
شـفِتي
تقلَّـبُ
وجنتـاه
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يميـل
إذا
عصـرتُ
لـه
قَواماً
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ويبســم
كُلّمــا
قبلـتُ
فـاهُ
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ويُــدني
لـي
مُحيَّـاه
ومهمـا
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أردتُ
اللثـم
مـن
خـدٍّ
ثنـاهُ
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وقـال
لـي
أجتـنِ
ورداً
جنيّاً
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لقلـب
الصّب
ما
أحلى
اجتناهُ
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وبـات
بغفلـة
الواشي
ضجيعي
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وبـتُّ
أطيـل
رشـفي
مـن
لَماهُ
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أُطيـل
ليشـتفي
منـه
فـؤادي
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برشـف
مـن
شـِفاه
فمـا
شفاهُ
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لقـد
كـانت
لنا
الأيام
بِيضاً
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بلقيـــاه
فســوّرها
نــواهُ
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هـواه
لم
يزل
في
القلب
حتى
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بعبـد
القـادر
اعتُقلت
عُراهُ
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فـتى
الجُلاّء
لـو
جلَّـت
وعمـت
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وقطـب
الخطـب
إن
دارت
رحاه
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وغيـث
لـو
ألـمَّ
بـأرض
جـدب
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وغــوث
إن
دعــا
داع
دعـاهُ
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وبـــدرُ
عُلاً
ومطلعــه
نــدي
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وبحــر
ذكـا
ومـورده
نـداهُ
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أخـو
هَـم
ومـذ
نـاغته
طفلاً
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أبــى
إلا
الســموَّ
إلـى
علاهُ
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أبـى
إلاَّ
الإبـا
للنفـس
خُلقاً
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وأن
لا
يَرتجــى
حــتى
أبـاهُ
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وسنَّ
لدى
الورى
طرق
المعالي
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وإن
لـم
يبلغـوا
فيها
مداهُ
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حـوى
مـا
كان
في
أبناء
حَوّا
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مـن
الحُسـنى
وأحسـنَه
حـواهُ
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حـوى
جُـلّ
السجايا
والمزايا
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ومــا
مــن
مفخـر
إلا
أتـاهُ
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فمِـن
بـاعٍ
أنـاط
به
الثريا
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ومِـن
قـدم
على
الجوزا
رماهُ
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ومـن
فضـل
أشـاد
الركن
منه
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ومـن
شـرف
علـى
شـرف
بنـاهُ
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وأوغـل
في
العلا
والمجد
حتى
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تضـــمن
كــلَّ
مــأثرة
رِدَاهُ
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فكـم
ذي
عسـرة
قـد
لاذ
فيـه
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فأغنــاهُ
وكــم
عـارٍ
كسـَاهُ
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وكـم
مـن
خـائِف
قـد
ردَّ
عنه
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يـد
البلـوى
ومـذعور
حمـاهُ
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يريــك
بنشـر
طلعتـه
محيَّـا
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يـرى
نيـل
الأمـاني
من
يراهُ
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حكـاه
البـدر
فـي
حُسْنٍ
وبِشرِ
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وفـي
نشـر
المـآثر
ما
حكاهُ
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يُلاقـي
بالتواضـع
مـن
يلاقـي
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وتخضـع
عنـد
رؤيتـه
الجباهُ
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يُــواري
عُـرْفَ
راحتـه
حيـاءً
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وتبـدي
الناسُ
ما
وارى
حَياهُ
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ويطـوي
فـي
لواء
الفضل
منه
|
فتنشـره
الـورى
مهمـا
طواهُ
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ولا
ينسـى
إذا
تـوليه
شـكراً
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وإن
أولاك
إحســـاناً
نســاه
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بفيـض
يـديه
أهْونْ
بالعطايا
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وتحتَقـر
السـحائب
والميـاه
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فمــن
أدنـى
مـواهبه
لهـاءٌ
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ومــن
أجـدى
منـاقبه
بهَـاه
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ولـو
وهَـب
النجـومَ
لوافديه
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لظــنَّ
بأنهــا
أدنـى
عطـاه
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فـتىً
قـد
خاب
من
يرجو
سواه
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وليـس
بخـائب
مـن
قـد
رجاه
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قـد
اعتادت
على
الإِمساك
أيد
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ومـا
اعتـادت
سوى
بسط
يداه
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أمـاني
النـاس
في
يسرٍ
وذخر
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وحسن
الذكر
في
الدنيا
مناه
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وتسـمع
فـي
الورى
رجلاً
سرياً
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وتبصـر
لا
تَـرى
أحـداً
سـواه
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لِتَهْنَـأ
مسـقط
بـاليمن
منـه
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فقــد
فـازت
بوطـأته
حصـَاه
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خلا
وعَــرِي
عمـانٌ
مـن
كريـم
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يخـال
الخيـر
فيـه
مـا
خلاه
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واقفـر
ربعـه
عـن
كـل
نـدب
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يعـد
لـدى
النوائب
ما
عداه
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ليهلـكْ
مـن
تـرى
لا
خير
فيه
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ويمكـثْ
مـن
يكـن
نفعاً
بقاه
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إذا
غضـبت
وأهلوها
الليالي
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فلا
نعبــأ
إذا
حِزنـا
رضـاه
|
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تعلمنــي
محبتُــه
القـوافي
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وينشــئ
لـي
مـدائحه
هـواه
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ولـجَّ
بـي
الهـوى
أثني
عليه
|
ولا
واللــه
لا
أحصــي
ثنـاه
|
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وأنَّـى
لـي
بـأن
أحصـي
ثناء
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علـى
مـن
كـان
حيـدرة
أباه
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إذا
انتمـتِ
الورى
لأصيل
أصل
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فللأصــلِ
المطهّــر
منتمــاه
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إلى
أهل
الكِسا
والبيت
يُنْمَى
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ومـن
ذاك
الكسـا
معنى
كساه
|
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فلا
زال
الزمــان
بـه
مُهَنَّـا
|
ولا
زالـــت
بغَمّــاءٍ
عِــداه
|
|
ودام
لكــل
محتــاج
رجــاءً
|
وللعـــافين
لا
برحــت
ذُراه
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