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جـدَّد
روحُ
الغـرب
عهـدَ
الكئيبْ
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فَــرَاقَ
حـتى
رقَّ
منـه
الحـبيبْ
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بشــر
بالإســعاف
أهـل
الهـوى
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فــأنحلوه
كــلَّ
قلــب
كئيــبْ
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أُحبابَنـا
قـد
طـال
عمر
المنى
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فهـل
لعمـر
الوصـل
منكم
نصيبْ
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قـد
اجتهـدنا
أن
ننـال
المنى
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منكــم
فكــم
مجتهـد
لا
يصـيبْ
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لمـــا
تنــاءيتم
بــأنواركم
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عنــا
فقـدنا
كُـلَّ
حلـو
وطيـبْ
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لا
تسـألوا
عـن
حـالتي
بعـدكم
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يـا
رحمـةَ
اللـه
لحال
الغريبْ
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أيـــن
ليـــاليكم
وأيــامكم
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نَضــَارة
الـدهر
وعيـش
الأريـبْ
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وايــن
ذاك
العهـد
بـالمنحنى
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والسـعد
قـد
نـوم
عين
الرقيبْ
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فــي
ذمــة
اللـه
بـدور
سـرت
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ومــا
لهـا
إلا
حشـايَ
المغيـبْ
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مـن
لـي
بداء
الوجد
في
مهجتي
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اتّســع
القــرح
وعـز
الطـبيبْ
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وهــل
نســيم
مـن
شـذا
روضـة
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تطفـئ
مـن
أحشـايَ
حـرّ
اللهيبْ
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تخلصـــت
لمــا
ســرت
نســمة
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منهــم
فهـزت
كـل
قلـب
سـليبْ
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كأنهــا
ذكــرى
فــتى
يوســفٍ
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محمــدٍ
يـا
طيـب
ذكـرى
حـبيبْ
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علاّمــة
العصــر
وغـوث
الـورى
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كعبـة
أهـل
الفضـل
حـج
الأديبْ
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أشـــرقت
الــدنيا
بــأنواره
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كالشـمس
لكـن
نـور
ذا
لا
يغيبْ
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بحـر
النـدى
والعلـم
ينهلُّ
في
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الآفــاق
والأوراق
منــه
صـبيبْ
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مــا
حــلَّ
فــي
أرض
بأقـدامه
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إِلا
ويخضــرّ
المكــان
الجـديبْ
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لقــد
نشــا
مثلاً
وفضــلاً
دنـا
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فهـو
ولا
شـك
البعيـد
القريـبْ
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رام
أولــو
العلــم
مجـاراته
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فاستبقوا
فانقلبوا
في
القليبْ
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مــا
غــاص
فـي
لجّـة
تـدقيقه
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إلا
وأبــدى
كــل
شــيء
عجيـب
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يَراعُـــه
فـــي
روض
أطراســه
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إذا
شــدا
أطــربَ
كالعنـدليبْ
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مــا
قـام
فـي
منـبر
أوراقـه
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إِلاَّ
بتحقيـــق
وأضــحى
خطيــبْ
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مـا
بـان
ليـل
النفس
من
فَرْقه
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إلا
وصـبح
الحـق
يَهـدِيِ
المرِيبْ
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للــه
ذاك
الشــيخ
فـي
فضـله
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وعلمــه
ليــس
لـه
مـن
ضـريبْ
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درة
تــاج
العصـر
نجـم
العلا
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زهـرة
روض
المِصـر
كـفّ
الخصيبْ
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دونـك
يـا
خـاتَم
أهـل
النهـى
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ابنــةَ
فكــرٍ
ذاتَ
قــدٍّ
رطيـبْ
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نـدعوك
جهـراً
بالصـَّفا
والوفا
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وأنــت
للــداعي
وفــي
مجيـبْ
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