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بشــراي
هـذي
نسـمات
المعهـدِ
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هبــت
علينـا
بتمـام
الموعِـدِ
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وهـــذه
دلائل
الخيـــر
علــى
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وجـه
المنـى
لاحت
بنجْح
المقصِدِ
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وكيــف
لا
يهــتز
قلـبي
فرحـاً
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ووصـلهم
كالمـاء
للقلب
الصدي
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أحبابنـا
ركـابهم
قـد
أقبلـت
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موقــورة
مـن
السـرور
الأجـودِ
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طـال
الجفـا
فـانتبهت
أحلامُهم
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أن
يسـلكوا
قصد
الوفا
للمكَمد
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ظلـوا
ولمـا
آنسـوا
من
مهجتي
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نـاراً
أتـوا
كـلٌّ
إليها
يهتدي
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خـافوا
عليهـا
أن
تـذوب
كَمداً
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فاسـتدركوها
باللقـاء
المُبْرِد
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زادوا
فـأيُّ
كـائن
لـم
ينتشـر
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مِســكاً
وأي
مشــرق
لـم
يسـجدِ
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فكــل
أوقـاتي
بهـم
فـي
فـرح
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وكــل
حســَّادي
بهـم
فـي
كمَـدِ
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كأنهــا
أيــام
عــرس
ضــمخت
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مــن
الهنـا
محمـدَ
بـن
أحمـدِ
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أميــر
فضــل
رويــت
أخلاقــه
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مـن
سلسـبيل
العرف
أهنى
موردِ
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ذو
مهــل
عـن
الـردى
مسـتعجل
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علـى
النـدى
لم
ينتظر
إلى
غدِ
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بحــرٌ
ولكـن
قـد
طفـا
جـوهره
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عـذب
ولكـن
بَـرْدُه
يشفي
الصدى
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بـدرٌ
ولكـن
نـوره
لـم
ينتقـص
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دهــر
ولكـن
وقتـه
فـي
أسـعدِ
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ليــث
ولكــن
كلـه
عقـل
يُـرى
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والعقــلُ
ليـس
مـن
خِلال
الأسـَدِ
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سـُحْب
ولكـن
وَبْلُـه
لـم
ينقطـع
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عضــب
ولكـن
نصـله
لـم
يُغمَـدِ
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قـد
عـرف
النـاس
وقـام
فيهـم
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تمييــزه
مــن
مصــلح
ومفسـدِ
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مـا
الناسُ
إلا
كالحديد
والنهى
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تشـهد
والـدهر
لهـم
كـالمِبْردِ
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هــذا
وكـم
مـن
عـادة
جميلـة
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فيهــم
لـه
مـن
أقـرب
وأبعـدِ
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مـن
صـار
بدراً
قَرن
المولى
به
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شمس
الضُحَا
واجتمعا
في
السؤددِ
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جــوهرة
أخرجهــا
ربُّ
الــورى
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إليــه
مــن
لجـةِ
بحـر
مُزْبِـدِ
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والشمس
والبدر
إذا
ما
اجتمعا
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فهـل
يكـون
النسل
غير
الفرقدِ
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بــورك
فيهمَــا
وفـي
نسـلهما
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واللــه
خيــرُ
حــافظ
مُســدِّدِ
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لـك
الهنـاء
والثنـاء
بالرِّفا
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ءِ
والبنيــن
وبلــوغ
المقصـدِ
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فـاربَع
بطـول
فسـحة
فـي
عمـر
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وارتـع
بصـَافي
طِيـب
عيشٍ
أرغدِ
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أتـــمَّ
مــولاك
عليــك
أُنســهُ
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والشــكر
للمـولى
علـى
محمـدِ
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