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علـى
القلب
حق
الهوى
قد
وَجَبْ
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فغيــر
ملــوم
إذا
مـا
وَجَـبْ
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فَـرَاخ
لـه
مـن
عنـان
الغرام
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فليــس
لـه
فـي
التسـلّي
أرب
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إذا
أنــا
بصــرته
بالنجـاة
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تجنـــب
إلا
ركـــوب
العطــب
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يخيــل
لــي
إذ
يُغيــر
الـغ
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رام
أن
تصـــبّره
مــا
هــرب
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وتمــرق
منـه
سـهام
الجفـون
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فتــوهمني
أنّــه
لــم
يُصــَب
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ومـا
ذاك
إلا
ذهـول
يظـن
جـه
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ول
بــه
أنــه
مــا
اضــطرب
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أصــاح
أشـمت
بـأعلى
الشـآم
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تلألأَ
بـــرق
بـــدا
واحتجــب
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فيـا
عـذب
اللـه
طرفـاً
جنـى
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فكــان
لتعــذيب
قلـبي
سـبب
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وواهـاً
لـه
لـو
غـدا
ناقعـاً
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لحــر
الغليـل
بـبرد
الشـنب
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تبســـم
فــي
عــابسٍ
دَجْنُــهُ
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إذا
قَهْقَـهَ
الرعـد
فيه
انتحب
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بـدا
خافقـاً
مثل
خفق
اللواء
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ومــرَّ
ببطيـاس
مرخـى
العـذب
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ولاح
علـــى
جَوْشـــنٍ
ســافراً
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فمـذ
شـق
ذيـل
الغمام
انتقب
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توقـد
كالنـار
لمـا
اسـتطار
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ومـازج
مـاء
الحيـا
فـالتهب
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لـي
اللـه
مـن
مسـرفي
المَلاَل
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أود
مـع
الهجـر
أن
لـو
عتـب
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يــتيه
بقــد
يُغيـرُ
الغصـونَ
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وخـد
بغيـر
دمـي
مـا
اختضـب
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وأعيــن
عيــن
إذا
مـا
صـبا
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إليهــن
قلــب
تشـكى
الوصـب
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قتلـــت
بهــن
وواهــاً
لــه
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دم
ســفكه
شــر
مــا
يكتسـب
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أصــاح
نشــدتك
فــي
وقفــة
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تعيــن
وإن
كلفتــك
النصــب
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إذا
جئت
أهلــي
بالجــامعين
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ولاحــت
لعينيـك
تلـك
القبـب
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فقـف
بيـن
أطناب
تلك
البيوت
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فثــم
قبــائل
قــومي
عصــب
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ونـاد
إذا
مـا
استطاروا
إلي
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ك
سـراعاً
ببيض
الظبى
والْيَلَب
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بنــي
أســد
كيــف
أســلمتم
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فتـاكم
وأنتـم
صـميم
العـرب
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وقـل
حيـن
تبصـر
جرد
الجياد
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وقــد
ألجموهـا
لنصـري
سـُرب
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علـى
رسـلكم
فهـو
حَيُّ
اليقين
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يــذبكم
عنــه
مَيْــتُ
الرِّيَـب
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فلـو
رام
غيـر
الهـوى
ضـيمه
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لنكبــه
عنــه
فــرط
الرهـب
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ولـو
حـارب
الـدهر
يوماً
لفلّ
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بغـازي
بـن
يوسـف
ناب
النوب
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بأبلـج
تلقـاه
طلـق
الجـبين
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إذا
فــاض
فـي
كـرم
أو
وهـب
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فمـا
أظلـم
الـدهر
إلا
أضـاء
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ولا
جمــد
الغيــث
إلا
انسـكب
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تشـام
بـروق
النـدى
والـردى
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لـديه
غـداة
الرضـى
والغضـب
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هـو
الغيـث
والليث
إما
سألت
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أثــاب
وإن
عــم
خطــب
وثـب
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إذا
فـاض
فـي
كـرم
فالبحـار
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فــي
جنـب
جـدوى
يـديه
تغـب
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ويرتــاح
فـي
بـابه
الآملـون
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لـــذل
الثــواء
وعــز
الأدب
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جزيـل
العطيـة
طلـق
اليـدين
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جميـل
الطويـة
زاكـي
الحسـب
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تــتيه
العــوالي
إذا
هزهـا
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وتسمو
المعالي
إذا
ما
انتسب
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إذا
أحـرز
الحمـد
بالمكرمات
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فــأهون
شــيء
ذهـاب
الـذهب
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ويرســـلهن
غـــداة
الهـــي
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اج
كالسـيل
فـي
صـَعَد
أو
صَبَب
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فناهيــك
مــن
بــاذل
مـانع
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حمــى
عِرْضــِه
عَــرَضٌ
ينتهــب
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أقــول
لــذي
دَعَـة
لـم
تشـد
|
لــه
فــوق
ظهـر
قَلُـوص
قتـب
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إلام
مقامــك
تحــت
الخمــول
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علــى
ظمــأ
وتمــادي
ســغب
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فمـا
أبعـد
الضـيم
مـن
حازم
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رأى
الـذل
فـي
بلـدة
فاغترب
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يفـوت
المـوادعَ
نيـلُ
المنـى
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ويــدركه
مُجْمِــلٌ
فـي
الطلـب
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ومـا
راحـة
المـرء
فـي
دهره
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إذا
أهمــل
الســعي
إلا
تعـب
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فلا
تهمـل
العيـس
والصـافنات
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فرزقــك
فــي
عَنَــقٍ
أَوْ
خَبَـب
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وكــن
مســتظلاً
بظـل
الغيـاث
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لتحلــب
دَرَّ
الغنـى
فـي
حلـب
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تجــد
ملكـاً
يوسـفي
النّجـار
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منيـع
الـذِّمار
رفيـع
الرتـب
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إذا
أم
مغنـــاه
ذو
فاقـــة
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فقـد
نشـبت
كفـه
فـي
النشـب
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يفـك
العنـاة
ويـردي
العتاة
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ويجـدي
العفـاة
ويجلو
الكرب
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ويَصـْبِيه
أجـرد
صـَامِي
التَّليل
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وأبيـض
ماضـي
الشـَّبا
ذو
شطب
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ومحكمـة
النسـج
مثـل
الغدير
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كــأن
القــتير
عليهـا
حَبَـب
|
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فيـا
مـن
إذا
أمـه
المستميح
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تنـاول
أقصـى
المنـى
من
كثب
|
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لــديك
ثمـار
المنـى
تجتنـى
|
ولكنهـــا
عنـــده
تجتنـــب
|
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تلـق
المـدائح
زهـر
الوجـوه
|
لهــا
مــن
ولائك
أولـى
سـبب
|
|
فلا
بـرح
الشـعر
يهـدي
إليـك
|
قلائد
مــــن
دره
المنتخـــب
|
|
ولا
زال
ملكـك
تسـمو
الشـهور
|
بطلعتـــه
وتـــزان
الحقــب
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