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أمــن
تــذكار
سـكانٍ
برامـه
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غـدا
ذا
الصـب
مرتهناً
غرامه
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ونـار
الـبين
تستعر
التهاباً
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وفـرط
الحـب
قـد
أوهى
عظامه
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أمـن
تغريـد
ورق
الحـي
ليلاً
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بترديـد
اللحون
على
البشامه
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أم
الريـح
النسيم
يمر
بليلي
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فيهــدي
مـن
نوافحهـا
علامـه
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علـى
مـاذا
المهيـم
في
زفيرٍ
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وبلبـــالٍ
وتشـــتيتٍ
علامــه
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مبــت
للكــرى
وحليــف
وجـدٍ
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سـهير
الطـرف
ما
يهنا
منامه
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نعـم
يـا
صـاح
أضـناه
حـبيبٌ
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نـأى
عنـه
ولـم
يـرع
ذمـامه
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فصــــيره
نحيلاً
ذا
هيــــامٍ
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فمـا
يـدري
بخلفـه
من
أمامه
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ومــا
يعلـم
بغـورٍ
أو
بنجـدٍ
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أهـو
بالشـام
أو
بأرض
تهامه
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وقـد
كـان
بـدا
فـي
خير
عيشٍ
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أنيـس
البـال
سـكرى
المدامه
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فأضــحى
اليـوم
لا
خـل
جليـسٌ
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ينــاجيه
سـوى
أهـل
الملامـه
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فهـل
يعـذل
رهيـن
الحزن
هذا
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حليـف
التـوق
محتنكـاً
زمامه
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ومـا
التعريـض
يا
خلي
بليلي
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وزينـب
والربـاب
مـع
أمـامه
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وأعنــى
الغانيـات
بـه
فكلا
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بل
الملحوظ
ما
قصدي
انكتامه
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نعـم
فـي
هـذه
أعنـي
حبيبـاً
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زكـي
النفـس
مرعـي
الزعـامه
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عفيـف
الـدين
عبـدالله
حقـاً
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جليــل
النعـت
حقـي
الإمـامه
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فقيـه
العصـر
سيف
الحق
اضحت
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ظبـاء
الحـي
بمظهـره
أسـامه
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فعطفـاً
يـا
شريف
البعد
منكم
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ومـا
يبصـره
من
أهل
الغشامه
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ذوي
العـدوان
أهل
الفسق
طراً
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وأهـل
البغـي
أربـاب
الظلامه
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أبــاد
اللـه
منهـم
كـل
حـي
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وأجلـى
عن
صفا
الوادي
قتامه
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لقــد
خربـت
بصـولتهم
تريـم
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وسـلطانُ
الهـوى
طنـبٌ
خيـامه
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وفـات
العـدل
والعلماء
قلوا
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وفـي
الأنذال
والسفل
ازدحامه
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فصــار
العلـم
مجهـولاً
خفيـاً
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وعـاد
الجهـل
متسـقاً
نظـامه
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وسـاد
النـاس
غيـر
الأهل
هذا
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وأمثــاله
أمـارات
القيـامه
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فـأدع
اللـه
واسـأله
دوامـاً
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يزيـح
الجـور
عنـا
واهتمامه
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ويصــلحنا
ويمنحنــا
نعيمـاً
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لدى
الدنيا
وفي
دار
الكرامه
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وصــلي
ربنــا
فـي
كـل
حيـنٍ
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مـع
التسـليم
ما
ناحت
حمامه
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علــى
المختـار
هادينـا
وآلٍ
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مـع
الأصـحاب
أهـل
الاسـتقامه
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