|
لعلــوى
ربــوع
فـي
اللـوى
وخـدور
|
تبــدت
فســل
مــا
للظعــون
تسـير
|
|
ألسـنا
لـدى
الـوادي
المقـدس
تربه
|
فهـل
لـك
يـا
حـادي
الظعـون
نـزور
|
|
نجـدد
عهـدا
بـاللهوى
جـاده
الحيا
|
وان
أخلقتــــــه
شــــــمأل
ودور
|
|
وتجــري
عيونــا
مـن
عيـون
قريحـة
|
فلــي
فــي
ربــاه
روضــة
وغــدير
|
|
وتنـــدب
أيامـــا
تقضــت
بســفحه
|
وطيـــب
ليــالي
مــا
لهــن
نظــر
|
|
ونبكــي
صــباحا
مــر
فيــه
مهنئا
|
وعصــرا
بــه
غصــن
الشـباب
نصـير
|
|
سـقى
اللـه
عهـد
العامريـة
باللوى
|
دمـــوعي
إذ
مــع
الغمــام
نــزور
|
|
لقـد
زغـت
إذ
دمعـي
دم
بـل
بكى
به
|
حيـــاء
تعـــم
الأرض
منــه
بحــور
|
|
فلـم
أنـس
سـرا
قـد
أذاعتـه
عندما
|
ســترت
بكفــي
الــدمع
وهـو
يفـور
|
|
لـدى
ان
تنـاءى
جيـش
صـبري
حيث
قد
|
تـــدانى
فـــراق
بيننــا
ومســير
|
|
عشــية
قـالت
بـالحمى
سـوف
نلتقـي
|
ويبـــدو
لصــبح
الاجتمــاع
ســفور
|
|
وقلــت
أبـوك
الـبر
لـي
هـو
راحـم
|
وقــال
لهــا
الواشـي
أبـوك
غيـور
|
|
فـدتها
الغـواني
كيـف
أفشت
حديثها
|
وكــانت
قــديما
باللحــاظ
تشــير
|
|
أمــــا
حققـــت
ان
الاوداء
غيـــب
|
أمـــا
علمــت
أن
الوشــاة
حضــور
|
|
أطعــت
الهـوى
فـي
حبهـا
مـع
أنـه
|
بـه
قـد
عصـاني
الصـبر
فهـو
يجـور
|
|
وفيــه
أطــاع
الصــب
مـاء
مـدامع
|
يؤجــج
نــارا
فــي
الحشـا
ويـثير
|
|
طرقـت
حماهـا
حيـن
طـال
بـي
النوى
|
وقضـــي
عمـــر
للوصـــال
قصـــير
|
|
وهيــج
شـجوي
بـارق
منـه
لـي
بـدا
|
ففــي
كبــدي
منــه
لظــى
وســعير
|
|
وقلـت
محـب
قـد
أتـى
يطلـب
الثـوا
|
لــديك
دوامــا
مــا
أقــام
ثـبير
|
|
وهــذا
يســير
ليــس
فيــه
مشــقة
|
فقــالت
يقيــم
اليــوم
ثـم
يسـير
|
|
فقلـت
لهـا
يـا
علـو
في
غير
أرضكم
|
أرضـــي
فــؤادي
بــالنوى
فيطيــر
|
|
يطيـر
ارتياحـا
ان
أقـل
اننـي
غدا
|
أســـير
ومـــا
عنـــدكم
فأســـير
|
|
أهــاجرتي
لا
فــرق
اللــه
بيننــا
|
فمــا
بيننــا
يومــا
علــي
يسـير
|
|
ومـذ
صـح
عنـدي
انـك
الظبي
لم
أقل
|
إلـى
كـم
صـدود
فـي
الهـوى
ونفـور
|
|
أفــي
كــل
يـوم
لـي
إليـك
وسـيلة
|
وفــي
كــل
ليــل
لـي
إليـك
سـفير
|
|
أؤخــر
رجلا
عنــك
قـد
كنـت
دائمـا
|
أقــــدمها
انــــي
إذا
لصــــبور
|
|
علـى
اننـي
لـم
أفـش
سـرا
ولم
أخن
|
حبيبـــا
ألا
إن
الخـــؤون
كفـــور
|
|
ومـا
أنـا
كالزبـاء
بالغـدر
نـاقض
|
عهــودا
ولــم
تســند
إلــي
أمـور
|
|
فقـالت
حمـاك
اللـه
مـن
كـل
شـيمة
|
حمـــاك
بهـــا
مســـتوحش
وحقيــر
|
|
وأنـت
تزيـن
الـدهر
فضـلا
ولـم
تكن
|
تشـــين
ولكـــن
الوشـــاة
كــثير
|
|
إذا
ظفــروا
يومــا
بحـر
تبـادروا
|
لتعـــبيره
بالـــذم
وهــو
وقــور
|
|
لســانهم
بالمــدح
يعـثر
ان
جـروا
|
إلـــى
ذمـــه
ان
اللســان
عثــور
|
|
يظنــون
أن
المجــد
يقنـص
بـاللهى
|
ألا
إنـــه
عـــن
فخهـــم
لتفـــور
|
|
يرومــون
ان
يرقـوا
رواسـي
للعلـى
|
وذلـــك
مرقـــى
لا
يـــرام
عســير
|
|
فقلـــت
دعيهـــم
لا
أبــا
لأبيهــم
|
ولا
أم
منهـــم
بالســـؤال
خـــبير
|
|
فــإنهم
عنــدي
عبيــد
وإن
ســموا
|
لأنــي
مليــك
فــي
الهــوى
وأميـر
|
|
فقــالت
نعــم
قــد
أيـدتك
شـواهد
|
إلــى
صـدقها
قاضـي
الكمـال
يشـير
|
|
وانـك
قـد
قيـدت
بـالجود
مـن
ثـوي
|
لـــدينا
وأجنـــاد
بــذاك
تســير
|
|
ولكــن
إذا
فــاض
الحــديث
بمحفـل
|
وخـــاض
بــه
قــوم
هنــاك
حضــور
|
|
وألقـت
إلينـا
أبحـر
البحـث
عنبراً
|
وأرجنـــا
منـــه
شـــذى
وعـــبير
|
|
رأيتـــك
للآداب
تصـــغي
وللعلـــى
|
وفيــك
عــن
القـول
القبيـح
نفـور
|
|
وان
هــب
مـن
ريـح
المدايـح
نفحـة
|
تميــــل
وذا
ود
لــــديك
تميـــر
|
|
وتنظيــم
مــن
حــر
الكلام
فلا
يـدا
|
وعــى
درهــا
مــن
أصــغريك
بحـور
|
|
بحــور
عــذاب
ليــس
يصــفر
درهـا
|
يحلـــى
بـــه
للغانيـــات
نحــور
|
|
ألسـت
الـذي
تطـوي
القفـار
لماجـد
|
لحـــاتم
طــي
عــن
نــداه
قصــور
|
|
همـام
مـن
الغـر
الصـدود
أخـو
تقى
|
لــه
بيــن
أربــاب
الكمـال
ظهـور
|
|
فقلـــت
بلـــى
للـــه
درك
هـــذه
|
أمــــاني
لا
در
جلتــــه
ثغــــور
|
|
وذا
مقصــدي
لا
لفتــة
مــن
طلا
وذي
|
مطامــــح
مثلــــي
لا
طلا
ونحـــور
|
|
فقالت
إذا
فاقصد
أخا
المجد
والعلى
|
ومـــن
جـــده
للمـــؤمنين
بشــير
|
|
ومــن
هـو
عـن
فعـل
الفسـوق
مـبرء
|
ومــن
بالخصــال
الصــالحات
شـهير
|
|
فقلـت
رضـي
الـدين
تعنيـن
مـن
لـه
|
إلــى
المرتضــى
قـرب
سـناه
منيـر
|
|
هلال
سـما
العليـاء
مـن
نحـوه
غـدت
|
نعـــات
المعــالي
بــالأكف
تشــير
|
|
فقـالت
هـو
الشـهم
الـذي
قـط
ماله
|
علـــى
مــاله
إلا
الســماحة
ســور
|
|
فــتى
سـاكن
ان
هـزت
السـمر
مـاله
|
كمــا
صــح
بيــن
الخـافقين
نظيـر
|
|
إمـــام
همـــام
ماجـــد
متواضــع
|
علـــى
أنـــه
للفرقـــدين
ســمير
|
|
غنــي
مــتى
تســأله
عـن
سـر
خلـة
|
عليـــم
بأعقـــاب
الأمــور
خــبير
|
|
أديـــب
أريـــب
مصــقع
ذو
بلاغــة
|
بــديع
معانيهــا
الحســان
بنيــر
|
|
فـتى
طـال
مـن
قـال
القريـض
برقـة
|
يقصـــر
عنهـــا
دعبـــل
وجريـــر
|
|
حســـيب
نســـيب
فـــاطمي
مهـــذب
|
إلـى
المصـطفى
لزاكـي
نمتـه
بـدور
|
|
علـي
بمـا
قـد
نـال
منـه
من
البها
|
غلا
أورثـــــاه
شــــبر
وشــــبير
|
|
فيــا
ســيدا
يـروي
أحـاديث
فخـره
|
لســان
العــوالي
إذ
تشــك
صــدور
|
|
نعـــم
ورؤس
مـــن
ذوابــة
هاشــم
|
تقــات
عــدول
فــي
الـورى
وصـدور
|
|
عـن
السـبط
عـن
مولى
الأنام
بأسرهم
|
فكـــل
لـــديه
بـــالنوال
أســير
|
|
عـن
الطهـر
مـن
أخفـى
ذكـاء
بنوره
|
علــي
كمــا
قــد
أوضــحته
ســطور
|
|
ويــا
ماجـدا
حـاز
القلـوب
بلفظـه
|
وفـــرّق
جـــدواه
فليـــس
فقيـــر
|
|
ونــال
مـن
الأسـرار
مـا
عـن
حصـره
|
وكـــل
وداد
قـــد
حـــواه
ضــمير
|
|
ألـم
تـدر
انـي
لـم
أزل
منذ
أشرقت
|
بــدورك
فــي
الآفــاق
وهــي
نـدور
|
|
لمحــت
ســناها
قاصـيا
ثـم
أسـفرت
|
علـــي
شـــموس
مـــن
علاك
تنيـــر
|
|
وأصــفيتني
محــض
الــوداد
تفضـلا
|
لأنــــك
صــــاف
للـــولي
نميـــر
|
|
وداد
بـــه
أعميــت
ضــدي
تعطفــا
|
وظنـــا
بـــأني
عـــارف
وبصـــير
|
|
رجــوت
بــاني
أرتقــي
كــل
رتبـة
|
واهبــط
مغنــى
لــي
لــديه
سـرور
|
|
وأســمو
إلــى
أطــواد
عـز
شـوامخ
|
ذراهــا
يــرد
الطــرف
وهـو
حسـير
|
|
فكــان
رجـائي
ضـد
مـا
قـد
رأيتـه
|
مـن
الـدهر
إذ
مـا
لـي
عليـه
نصير
|
|
وســـربلني
نقصــا
ببعــدي
عنكــم
|
علــى
أننــي
بالفضــل
منـه
جـدير
|
|
وهــاك
لئال
فــي
ســموط
نظمتهــا
|
لجيــدك
يــا
مــن
للبحــار
يغيـر
|
|
ولا
فضــل
لـي
إذ
قبـل
ذاك
منحتنـي
|
عقـــودا
وفـــي
أثنــائهن
شــذور
|
|
هديــة
رق
مخلــص
قــد
هفــا
بــه
|
حـــوادث
دهـــر
شـــوبهن
كـــثير
|
|
شـــكور
لإحســـان
الصــديق
أضــره
|
زمـــان
لأربـــاب
الكمــال
كفــور
|
|
فــإن
قبلــت
تلـك
الهديـة
أثبتـت
|
فــؤادا
حــذار
الــرد
كـاد
يطيـر
|
|
وقـدري
فـوق
النجـم
أعلـت
وأعلمـت
|
بــأن
مقــامي
فــي
الأنــام
خطيـر
|
|
فجـــد
بقبـــول
لا
برحــت
معظمــا
|
لـــديك
كــبير
الكاشــحين
صــغير
|
|
ولا
زلــت
مــا
ذلــت
ظبـاء
لضـيغم
|
عزيـــزا
مهابــا
والعــدو
حقيــر
|
|
ودم
مالكــا
للمجــد
ثــم
متممــا
|
فقــد
نــاله
نقــص
وليــس
مجيــر
|
|
وهــدت
أعــاليه
فلا
زلــت
بانيــا
|
لـــه
بفخــار
لــم
يصــبه
دثــور
|