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يـا
عيـن
هـذا
المرتضـى
حيدر
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هــذا
البطيـن
الأنـزع
الأطهـر
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هــذا
الـذي
أنـواره
فـي
غـد
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تخمـد
منهـا
النـار
إذ
تسـعر
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هــذا
الــذي
ســابل
إحسـانه
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عــن
نهـره
السلسـال
لا
ينهـر
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هـذا
الـذي
للنـاس
فـي
سـيفه
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وســـيبه
النيــران
والأبحــر
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هــذا
الــذي
رايـات
أوصـافه
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فــي
راحـة
الـذك
غـدت
تنشـر
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واليــوم
أكملـت
لكـم
دينكـم
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عـن
سـر
مـا
قـد
قلتـه
تخـبر
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ذا
العلـم
الفـرد
بـل
العالم
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المفـرد
بـل
ذا
العالم
الأكبر
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ذا
حجــة
اللــه
وهـذا
الـذي
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زان
لــه
المنظــر
والمخــبر
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هــذا
الـذي
أرغـم
فـي
سـيفه
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أنـف
قريـش
بعـدما
اسـتكبروا
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حـــتى
لقــد
شــاب
لحملاتــه
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وليــدهم
إذ
شــام
مـا
يبهـر
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وجــدل
الأبطــال
فــي
بـدرهم
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ووجهـــه
كالشــمس
إذ
تســفر
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وآبــت
الأحــزاب
للخــوف
فـي
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خفـــي
حنيــن
وهــم
الأكــثر
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هذا
الذي
لو
كانت
الجن
والأنس
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وأملاك
الســــــما
تســـــطر
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وكـــانت
الشـــجار
أقلامهــم
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وحــبرهم
مــا
حــوت
الأبحــر
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لـم
يحـرزوا
ممشـار
عشر
الذي
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لـه
مـن
الفضـل
ولـم
يحصـروا
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فمـا
لغيـث
الـدمع
يهمـي
وقد
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شــاهدت
يـا
عينـي
مـا
يخـبر
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نعـم
همـي
مـذ
شام
برق
الهدى
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فـي
روضـة
طـول
المـدى
تزهـر
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أحســن
بهــا
مـن
روضـة
غضـة
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أريجهــا
كالمســك
بـل
أعطـر
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فنورهـــا
النــور
وأكمــامه
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أبصــارنا
والــورق
المفخــر
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مـا
جادهـا
الوسـمي
بل
جادها
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مــن
رحمـة
اللـه
حيـا
يهمـر
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ودت
دراري
الشــهب
لـو
أنهـا
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علــى
ثراهــا
كالحصـا
تنـثر
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وكيــف
لا
وهــي
جنــاب
لمــن
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دان
لـــه
لأســـود
والأحمـــر
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مـــن
شـــرف
الــبيت
بميلاده
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وحـــدره
والحجـــر
الأنـــور
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وزمــزم
قــد
زمزمـت
والمقـا
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م
اهــتز
للأفــراح
والمنــبر
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وقـد
صـفا
عيش
الصفا
فيه
وال
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مـروة
أضـحت
فـي
الهنـا
تخطر
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وكـم
بـه
نـالت
منـى
مـن
منى
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قبـــل
بهــا
بشــرت
الأعصــر
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وزال
خــوف
الخيـف
فيـه
وقـد
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تنعـــم
التنعيــم
والمشــعر
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فاسـمع
أميـر
النحل
نظما
غدا
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كالشـهد
ألبـاب
الـورى
يسـحر
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وكـــــن
كفيلا
بخلاص
امــــرئ
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مـا
زال
فـي
بحـر
الخطا
يغمر
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صـلى
عليـك
اللـه
مـا
أنشـدت
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يـا
عيـن
هـذا
المرتضـى
حيدر
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