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يـا
بـرق
إن
جـزت
بالحي
التهامي
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فحيهــم
عـن
مشـوق
القلـب
عـذري
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واشـرح
لهم
ما
جرى
من
بعد
فرقهم
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مــن
طــرف
وجـد
ودمـع
أرجـواني
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وسـق
إليهـم
نيـاق
السـحب
مرضعة
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لطفــل
روضــهم
الغــض
العـبيري
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واقطـع
هنالـك
جيد
الجدب
إن
تره
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فقــد
لمعــت
كســيف
هنـد
وانـي
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ويـا
نسـيم
الصـبا
بلغهـم
خـبري
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مــتى
تعطــرت
مــن
روض
أقــاحي
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وان
تلطفــت
فـاحملني
فـأبي
قـد
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غـدوت
أحكيـك
مـن
سـقمي
الغرامي
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ولا
تمــر
علـى
الواشـي
فتفضـحنا
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فــإن
نشــرك
مســك
غيــر
مخفـي
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ويلاه
مـا
لـي
وما
للدهر
يبسم
لي
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تبســم
الليــث
إذ
يخلـو
بانسـي
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أما
رأى
غير
قلبي
في
الورى
غرضا
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يرمــي
بأســهم
غـدر
منـه
مخفـي
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فلـو
تقاسـي
الجبـال
أصـم
أسهمه
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لظــــن
حشـــر
لانســـى
وجنـــي
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إن
رق
يومــا
فلا
تغــررك
رقتــه
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أمـا
تـرى
المـوت
في
حد
اليماني
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فاسـأله
هـل
لـي
من
ذنب
أتيت
به
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سوى
انتسابي
إلى
الهادي
التهامي
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محمـد
خـاتم
الرسـل
الكـرام
ومن
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هــو
المقـدم
بـالمعنى
الحقيقـي
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من
كلمته
الوحوش
المعجم
إذ
رميت
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عـن
وصـفه
فصـحاء
العـرب
بـالحي
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وحــن
جــذع
إليــه
حيـن
فـارقه
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حنيــن
صــب
إلــى
حــب
وقــائي
|
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وغـاض
مـن
خجـل
بحـر
بسـاوة
وال
|
أيـوان
شـق
مـن
الرعـب
الحجـازي
|
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وان
تكـن
أطفئت
نـار
المجـوس
به
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فــإنه
بحــر
جــود
غيــر
محمـي
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غمامـة
اللطـف
قـد
كـانت
تظللـه
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خوفـا
علـى
الشـمس
من
كسف
لزومي
|
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لـه
أيـاد
إذا
مـا
فـاض
أصـغرها
|
لـم
ينـم
جـود
إلـى
كعـب
الأيادي
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وحيـن
مـا
صـال
فـي
بدر
وفي
أحد
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آبــت
بخفـي
حنيـن
كـف
ذي
الغـي
|
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قـد
جـر
نمـل
فرنـد
فـوق
صـفحته
|
حـب
القلـوب
مـن
الجيـش
الكفوري
|
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وذو
رمــاح
علـى
أغصـانها
سـجعت
|
حمـايم
السـعد
والنصـر
السـماوي
|
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يثمرن
من
رؤوس
القوم
الذين
بغوا
|
إذا
وردن
مــن
النهــر
النجيعـي
|
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أحسـن
بهـا
مـن
رمـاح
تقفت
فغدت
|
عمـاد
خيمـة
ديـن
الواحـد
الحـي
|
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ذو
عـترة
قـد
أناروا
أفق
عيشتنا
|
بكـــل
نجــم
مــن
الألطــاف
دريّ
|
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تنقلــت
فيهــم
شـمس
الخلافـة
إذ
|
كـانوا
بـروج
سما
الدين
الحنيفي
|
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وعـي
الأصـم
ثنـاهم
حيـث
قد
نطقت
|
بمــدحهم
السـن
الـوحي
الكتـابي
|
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والعمـى
قـد
أبصرت
أقمار
أوجههم
|
لأنهـــا
مظهــر
النــور
الإلهــي
|
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لاســيما
ضـوء
الكـرار
مـن
خضـعت
|
صــم
الجبــال
لبـأس
منـه
مخشـي
|
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أعنـى
بـه
بـاب
حصن
العلم
حيدرة
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وقـالع
البـاب
فـي
حـرب
اليهودي
|
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وقـالع
الصـخرة
الصـماء
إذ
عجزت
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عنـا
الألـوف
مـن
الجيـش
العراقي
|
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مـن
أصـبحت
شـمس
دين
الله
ساطعة
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فيـه
ببـدر
وفـي
اليـوم
الحنيني
|
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أصــحابه
كـالنجوم
الزهـر
أيهـم
|
به
اقتدينا
اهتدينا
في
دجى
الغي
|
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كـانوا
أشـدا
علـى
أعدائهم
رحما
|
ما
بينهم
ما
لهم
في
الناس
من
سي
|
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مـولاي
يـا
أحمـد
المختار
ان
لنا
|
إلــى
لقــائك
شـوقا
غيـر
محصـي
|
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فهـل
نـرى
روضـة
نور
العلوم
بها
|
يزهــو
لكــل
أخــي
علــم
وأمـي
|
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وهــل
تمكـن
مـن
تكحيـل
أعيننـا
|
بكحـل
ذاك
الثرى
الزاكي
الرسولي
|
|
صـلى
عليـك
إلـه
العـرش
ما
نطقت
|
ريــح
الصــبا
بثنـا
روض
خزامـي
|
|
وآلـك
الغـر
خيـر
الخلـق
قاطبـة
|
وصــحبك
السـحب
للـروض
السـماحي
|