|
أيــا
رب
بالمختــار
صـفوتك
الـذي
|
بـه
فرقـة
الإسـلام
فـي
الحشر
ناجيه
|
|
وبالمرتضـى
السـامي
الـذي
من
كلامه
|
جميـع
الـورى
زهـر
المعـارف
جانبه
|
|
وبالبضـعة
الزهـرا
التي
أمة
الهدى
|
شــفاعتها
يــوم
القيامــة
راجيـه
|
|
وبالحسـن
الطهـر
الزكـي
الـذي
غدت
|
مــودته
فــي
أبحـر
الخطـب
جـاريه
|
|
وبالطـاهر
الزاكي
الحسين
الذي
غدى
|
عليــــه
كلاب
للغوابـــة
عـــاويه
|
|
وبالعابـد
السـجاد
ذي
الثفنـات
من
|
لـــه
أذن
نقــر
الملايــك
واعيــه
|
|
وبالبــاقر
العلــم
الـذي
كلمـاته
|
لألبــاب
أربــاب
الجهالــة
شـافيه
|
|
وبالصادق
القول
الجزيل
الندى
الذي
|
فضـــايله
بيــن
البريــة
فاشــيه
|
|
وبالكـاظم
الغيـظ
العليم
الذي
عدا
|
عليـه
الغـوي
الكلـب
فليـدع
ناديه
|
|
وبالماجـد
المـولى
علي
الرضى
الذي
|
قطـــوف
نـــداه
للمؤمــل
دانيــه
|
|
وبالناسـك
الـبر
الجـواد
الذي
غدا
|
بطيــب
شــذاه
مرخصــا
كـل
غـاليه
|
|
وبالزاهـد
الهـادي
إلى
الرشد
الذي
|
بمجلســه
لــم
تســمع
الأذن
لاغيــه
|
|
وبالعسـكري
المجتـبي
الحسـن
الـذي
|
منــاقبه
بــالأنجم
الزهــر
هـازيه
|
|
وبالقـائم
المهـدي
رب
البهـا
الذي
|
بــه
روضــة
الإيمـان
تصـبح
زاهيـه
|
|
أجرنـا
مـن
النيـران
يـوم
معادنـا
|
فمــا
أم
مـن
يهـوى
الأئمـة
هـاويه
|
|
نعـم
ما
نخاف
النار
من
بعد
ما
غدت
|
حبــال
رجانــا
فيهـم
غيـر
واهيـه
|
|
نجــوم
ســماء
كلمــا
انقـض
كـوكب
|
بــدا
كــوكب
أنـوره
الغـي
جـاليه
|
|
هـم
القـوم
مـا
ضل
الذي
بهم
اقتدى
|
إلــى
ظلهــم
كــل
الخلايــق
لاجيـه
|
|
قلــــوبهم
للمــــؤمنين
رقيقـــة
|
ولكـن
علـى
الكفـار
كالصـخر
قاسيه
|
|
إذا
قيـس
علـم
النـاس
يوما
بعلمهم
|
فبينهمــا
مــا
بيـن
بحـر
وسـاقيه
|
|
ذوو
كلــم
هــام
الأنــام
بحســنها
|
ألــو
همــم
هـام
الكـواكب
راقيـه
|
|
جفــانهم
فـي
المحـل
تفعـم
للقـرى
|
وأسـيافهم
للسـيد
فـي
البيد
قاريه
|
|
وأخبــارهم
عيــن
الحيـاة
بعينهـا
|
وهيهـات
مـا
أدراك
يـا
صـاح
ماهيه
|
|
تبـل
الصـدى
تجلو
الصدا
كيف
لا
وقد
|
غـدت
وهـي
مـن
سـحب
الرسالة
هاميه
|
|
أيــا
ســادتي
إنــي
بكــم
متمسـك
|
ومتخــذ
مــدحيكم
الــدهر
دابيــه
|
|
ومــاذا
يقــول
المــادحون
وهــذه
|
مـدايحكم
فـي
محكـم
الـذكر
بـاديه
|
|
فلــولاكم
لـم
تخلـق
الكعبـة
الـتي
|
بأنوارهــا
ليــل
المــآثم
مـاحيه
|
|
ولا
جنــــة
للمتقيــــن
نعيمهـــا
|
يــدوم
ولا
نــار
لمــن
زاغ
حـاميه
|
|
ولــولاكم
مــا
وحــد
اللــه
مشـرك
|
ولا
أصـبحت
أطـواد
ذا
الـدين
راسيه
|
|
عليكـم
سـلام
اللـه
مـا
هبـت
الصبا
|
ومـا
افتر
ثغر
الزهر
في
دمع
ساريه
|