|
هـي
الهيجـاء
كم
طحنت
قرونا
|
وكـم
سـحنت
حوادثهـا
قرونـا
|
|
سـلونا
عـن
مشـاهدها
سـلونا
|
إذا
كنتــم
بهـا
لا
تعلمونـا
|
|
فنحـن
لهـا
إذا
لقحـت
فحـول
|
وإن
نتجـت
فنحـن
لهـا
بنونا
|
|
وإن
شــئنا
لففناهـا
شـمالا
|
وإن
شــئنا
رددناهـا
يمينـا
|
|
بكـل
فـتىً
إذا
ذكـر
المنايا
|
يحــن
إلـى
مواردهـا
حنينـا
|
|
تعلــم
حفــظ
بيضـته
وليـداً
|
وأشــرب
حــب
ملتــه
جنينـا
|
|
يـرى
أن
لا
حيـاة
إذا
أهينـت
|
فيـا
أبى
أن
يهان
بأن
تهونا
|
|
فمنــا
كــل
أبيــض
رفعتــه
|
إلـى
مضـر
عـروق
المنجبينـا
|
|
ومنـــا
كـــل
أروع
يعربــيٍّ
|
تســامى
نجـره
ي
اليعربينـا
|
|
ومنـا
سـاكن
الجغبـوب
نلـوى
|
بـه
زنـد
الخطـوب
إذا
بلينا
|
|
سنوســـيٌّ
إذا
حـــدثت
عنــه
|
علمـت
البأس
والدين
المتينا
|
|
تصـوب
فـي
بني
الحسن
المثني
|
وأصـعد
بعـده
فـي
الأكرمينـا
|
|
ومنـــا
كـــل
تركــي
أبــيٍّ
|
تأثــل
مجــده
فـي
الأولينـا
|
|
تعرفـت
الحـوادث
منـه
قلبـاً
|
علـى
الأزمـات
يأبى
أن
يلينا
|
|
ليـوثٌ
مـن
بنـي
الإسـلام
شـوس
|
بهـم
نسـطو
ونمنـع
ما
ولينا
|
|
إذا
غضـبوا
تفزعـت
الليـالي
|
وولـى
النجـم
يرجـف
مستكينا
|
|
فلا
نـــرى
لجبـــار
حقوقــا
|
ولا
نقضــي
لـذي
وتـرٍ
ديونـا
|
|
وخيــلٌ
كلمــا
جـالت
أمـالت
|
بجنـد
البغـي
معقله
الحصينا
|
|
يخلـن
دبيـب
أنفسـنا
مغيـرا
|
فيكســرن
الشـكيم
وينبرينـا
|
|
صـبرناها
علـى
الغارات
حيناً
|
ورضـناها
علـى
النجـدت
حينا
|
|
وســمرٌ
كلمــا
خطـرت
أطـارت
|
مخافتهــا
قلـوب
الـدراعينا
|
|
نواهـل
كلمـا
اشـتجرت
علينا
|
وقمنــا
تحتهــا
مسـتلئمينا
|
|
رأيـت
الغيـل
مشتبك
النواحي
|
علــى
الآسـاد
تسـكنه
عرينـا
|
|
وبيــض
علــى
خلقـن
مـذربات
|
لوامـع
مـا
شـحذن
ولا
جلينـا
|
|
بواتـــك
مــا
نصــوبهن
إلا
|
تقـط
الهام
أو
تفري
الوتينا
|
|
إذا
نحـن
انتضـيناها
أضـاءت
|
مـن
النقع
الحنادس
والدجونا
|
|
يشــطن
إذا
غمــدناهن
غيظـاً
|
فيـأكلن
الحمـائل
والجفونـا
|
|
وزرقٌ
موزريـــــات
كــــرامٌ
|
صــوائب
لا
يشــطن
ولا
ينينـا
|
|
طــويلات
المتـون
بلا
اعوجـاج
|
عـن
العـوج
القسي
بها
غنينا
|
|
إذا
انبعث
الزناد
بها
أصابت
|
ولـم
تسـمع
لمرماهـا
رنينـا
|
|
كـأن
رصاصـها
حـدق
المنايـا
|
نصـيب
بـه
ضـمائر
مـن
لقينا
|
|
علــى
أفواههــا
زرقٌ
حــدادٌ
|
بهـا
نفري
الخواصر
والمتونا
|
|
فتلــك
ووإن
نشــأ
فمـدمرات
|
نـدك
بهـا
الصياصي
والحصونا
|
|
أجادتهــا
يـداً
مكسـيم
صـفا
|
وأبــدعا
مضــاربها
فنونــا
|
|
تراهـا
في
المعاقل
والروابي
|
جـواثم
للـرداى
سـفعاً
وجونا
|
|
فهـل
مـن
مبلـغ
فكتـور
هنـا
|
مآلـك
يسـتبين
بهـا
اليقينا
|
|
أتجعـــل
كــل
صــافية
زلالا
|
وتحســب
كــل
غاديـة
هتونـا
|
|
جريـت
مـع
المطـامع
لا
تبالي
|
ظلمـت
الحـق
أو
خنـت
الأمينا
|
|
وأرســلت
الجنــود
مكتبــات
|
بجــرون
البـوارج
والسـفينا
|
|
إذا
أمنـوا
اللقاء
فهم
جنود
|
يغصــون
الأباطــح
والحزونـا
|
|
وهــم
إن
جـد
هازلهـا
نعـام
|
يطيـر
الـذعر
أنفسـها
جنونا
|
|
بلـى
إن
المطـامع
لـو
دريتم
|
قصــاراها
بـوار
الطامعينـا
|
|
ومـا
نحـن
الـذين
ظننتمـوهم
|
شــراباً
ســائغاً
للظامئينـا
|
|
ولكنــا
الــذين
وجــدتموهم
|
إذا
غضـبوا
سـمام
المعتدينا
|
|
ومـا
نحـن
الـذين
كـم
زعمتم
|
ســفاهاً
بينهــم
تتنزهونــا
|
|
مكــانكم
قــرب
نســيم
قـومٍ
|
يهيــج
بغيرهــم
داءً
دفينـا
|
|
لقــد
كـذبتكم
الـرواد
عنـا
|
وكــان
الحــزم
ألا
يهلونــا
|
|
وكـم
مـن
نـاظر
كـذبته
عيـن
|
فخــال
الآل
سلســالاً
معينــا
|
|
ومنتجـــع
لأســـرته
ربيعــاً
|
بمأســدةٍ
فأوردهـا
المنونـا
|
|
ســفاهٌ
يـا
ثعالـة
أن
تظنـي
|
بليـث
الغاب
إن
صمت
الظنونا
|
|
فـإن
أنكرتـم
طعـم
المنايـا
|
وعفتــم
موقـف
المستبسـلينا
|
|
فخيـر
الخيبـتين
لكـم
صـغار
|
بـه
تنجـو
نفـوس
الهاربينـا
|
|
وإلا
فــالبوار
بــواء
قــوم
|
علـى
هـول
الـوغى
لا
يصبرونا
|
|
فخـبر
يـا
كتيعـاً
أهـل
روما
|
بمــا
لاقيــت
إذ
فاجأتمونـا
|
|
ألــم
بنـا
وراء
بنـي
أبيـه
|
يــدبر
غــارة
المتلصصــينا
|
|
فلمـا
جـد
جـد
السـيف
فيهـم
|
وجــدناه
إمــام
المـدبرينا
|
|
بنــي
رومـا
ألمـا
تعرفونـا
|
فمــا
لكـم
لنـا
لا
تثبتونـا
|
|
خرجتــم
مـن
منـازلكم
بغـاةً
|
علــى
أوطاننــا
تتغلبونــا
|
|
غـداة
ملأتـم
الـدنيا
صـياحاً
|
بــه
بيــن
الأزقـة
تهتفونـا
|
|
وأقلقتــم
ملــوك
الأرض
لمـا
|
برزتــم
تــبرقون
وترعـدونا
|
|
إذا
برقــت
ملابســكم
عليكـم
|
زهـا
كـم
حسـن
منظرها
فتونا
|
|
كمـا
زهيـت
بزينتها
العذارى
|
وقـد
شـغلت
عيـون
الناظرينا
|
|
وإن
عزفــت
مزامركـم
درجتـم
|
علــى
نغماتهــا
تتبخترونـا
|
|
كمـا
هشـت
إلـى
المرعى
سوام
|
تحـد
لهـا
نصـال
الـذابحينا
|
|
وقـد
علم
الأنام
إذا
التقينا
|
وجـد
البـأس
من
عاف
المنونا
|
|
ومـن
هو
بالقنا
والسيف
أحرى
|
مـن
الجيشـين
أو
أدرى
فنونا
|
|
علنــا
أن
نجلــل
كــل
عضـب
|
نجيعــاً
مـن
دمـائكم
ثخينـا
|
|
وإمـــا
يزهينكـــم
عديـــد
|
غـداة
السلم
يعيي
الحاسبينا
|
|
فكــم
مـن
معشـر
قلـو
ولكـن
|
بصـدق
البأس
كانوا
الكثرينا
|
|
علينـا
أن
نـدير
بكـم
رحاها
|
ضروسـاً
فـي
كتـائبكم
طحونـا
|
|
وأن
يلقــى
أسـاراكم
لـدينا
|
مكــارم
بثهـا
الإسـلام
فينـا
|
|
مكــارم
يعلــم
الثقلان
أنـا
|
ورثناهــا
عـن
الآبـاء
دينـا
|
|
فـإن
يـك
فـي
ملوك
الأرض
عدل
|
وفـي
أهـل
السياسـة
منصفونا
|
|
نـرد
إلـى
أكنتهـا
المواضـي
|
ونرعـى
فيكـم
الحـق
المصونا
|
|
وإلا
فالســـلام
علـــى
ســلام
|
تنــادوا
باســمه
يترنمونـا
|
|
وإن
تعجــب
فمـن
عجـب
جنـود
|
تلــذ
الفتـك
بالمستضـعفينا
|
|
وإن
شـاموا
بريق
البيض
خروا
|
لهـا
قبـل
اللقـاء
مصـرعينا
|
|
وأعجــب
مـن
حـديثهم
لعمـري
|
منـىً
لأبـي
عمـا
نوئيـل
فينا
|
|
تـبيت
جنـوده
فـي
الدو
صرعى
|
ويصـبح
فـي
الممالـك
يدعينا
|
|
لعــل
كـرى
أراه
خيـال
فتـح
|
فأصــبح
عنـده
فتحـاً
مبينـا
|
|
كمـا
يهـذي
المبرسم
في
منام
|
ومـا
تغنى
الرؤى
بالحالمينا
|
|
وأهـل
الغـرب
فـي
لعـب
ولهو
|
علـى
مـا
بينهـم
يتغامزونـا
|
|
دعونـا
المقسـطين
فما
وجدنا
|
وأشـهدنا
الملـوك
فانكرونـا
|
|
وهمنـا
حيـن
خلنـاهم
عـدولاً
|
بمـا
شـاء
الهـوى
لا
يحكمونا
|
|
بغـت
رومـا
فلـم
نسمع
نكيراً
|
ولـو
شـاؤا
سمعنا
المنكرينا
|
|
وإن
نغضـب
ذيـاداً
عـن
حيـاض
|
لنـا
هـدمت
إذا
هـم
يسخطونا
|
|
ملـوك
الغرب
ما
هذا
التعامي
|
ومــا
للحــق
بينكـم
مهينـا
|
|
يسـاق
ضـعافنا
للمـوت
بغيـا
|
وأنتــم
تســمعون
وتبصـرونا
|
|
فأطفــال
تناوشـها
العـوالي
|
كـارت
بيـن
أيـدي
اللاعبينـا
|
|
وأشـياخ
تـولى
الـدهر
عنهـا
|
فكـانت
فـي
عـداد
الهالكينا
|
|
يعـز
علـى
الحميـة
أن
تراهم
|
سـطوراً
فـي
الحديـد
مصفدينا
|
|
يعــز
علــى
حميننــا
صـغار
|
يســامون
الـردى
لا
يرحمونـا
|
|
يعـز
علـى
الحميـة
أهل
نعمى
|
يســاقون
العشــية
يقتلونـا
|
|
يعــز
لــى
الحميـة
صـوت
أم
|
تصـــيح
لصــبية
يتمزقونــا
|
|
ألا
صــلى
الإلــه
علـى
نفـوس
|
أجـابت
ربهـا
فـي
الذاهبينا
|
|
حــرام
أن
نفيــء
إلـى
سـلام
|
بعيــش
أو
نقــر
بـه
عيونـا
|
|
حــرام
أن
تطيـب
لنـا
نفـوس
|
ولـم
نورد
بني
روما
المنونا
|
|
ولـم
نـر
منهـم
فـي
كـل
واد
|
أماثـل
فـي
الـتراب
معفرينا
|
|
تظــل
الطيـر
عاكفـةً
عليهـم
|
فتنتهـس
الحـواجب
والعيونـا
|
|
ولـم
نـترك
بطون
القاع
مثوىً
|
لهـم
ولـبئس
مثوى
الظالمينا
|
|
حلمنــا
حلـم
مقتـدرٍ
عليهـم
|
فكــان
جزاؤنـا
أن
يحقرونـا
|
|
ولمـا
لـم
يـروا
للنصر
باباً
|
ولا
للفتــح
نهجــاً
مسـتبينا
|
|
وحـاروا
حيـرة
الأوغـال
باتت
|
تطــاردهم
عيـون
القانصـينا
|
|
ترامـوا
كـالفراش
علـى
ثغور
|
لنـا
وهـي
الردى
لو
يعقلونا
|
|
ومـا
طـن
الـذباب
فراع
ليثاً
|
وهـل
تتخـوف
الأسـد
الطنينـا
|
|
فطـوراً
فـي
سـعيد
بهـم
دوار
|
وآخــر
بالشــآم
معربــدينا
|
|
وطـوراً
يرجفـون
على
البرايا
|
بضــرب
الدرنـدنيل
مهـددينا
|
|
كفـى
بالـدردنيل
بـوار
قـوم
|
علــى
دار
الخلافـة
يعتـدونا
|
|
فكـم
شـمخت
إليـه
أنـوف
قومٍ
|
وعــادوا
بالصـغار
مجـدعينا
|
|
وكـم
طمحـت
لـه
أطمـاع
ملـك
|
وطــاحت
فـي
ثنايهـا
عضـينا
|
|
سـلوا
جن
البدي
لو
استطاعوا
|
دنــوّاً
منـه
فـي
المسـمعينا
|
|
ولــو
أن
الكــواكب
أحفظتـه
|
لطـاح
الـدب
فـي
المتطوحينا
|
|
تخطتـــه
أمــاني
العــوادي
|
فلـم
يخطـر
بـوهم
الواهمينا
|
|
فإيــاكم
وفاســقة
الأمــاني
|
فقـد
كـانت
نكـال
الفاسقينا
|
|
فإنــا
قــد
جعلنــا
ضـفتيه
|
ســبيل
الحيـن
للمسـتهدفينا
|
|
إذا
خفــق
الهلال
علــى
ذراه
|
وقــام
علـى
مـدافعه
بنونـا
|
|
وثـارت
فـي
مجائمهـا
غضـاباً
|
تقـذفت
بالصـواعق
والكرينـا
|
|
تركنــا
البحـر
لجتـه
شـواظ
|
وطبقنــا
الســماء
مقـذفينا
|
|
إذا
تبعـوا
غـوايتهم
وجاءوا
|
بنـا
يـوم
الـوغى
يتحرشـونا
|
|
فنحـن
المؤمنـون
وكـان
حقّـاً
|
علـى
الرحمـن
نصر
المؤمنينا
|