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أيهــا
السـائرون
بالوفـد
ليلاً
|
خبرونــا
عـن
وفـدنا
أيـن
ولَّـى
|
|
مــا
قضــينا
للوفــد
حـق
وداع
|
يــوم
جـدت
بـه
النـوى
فاسـتقلَّ
|
|
لـو
وجـدنا
إلـى
الـوداع
سبيلاً
|
لمهــدنا
الخـدود
للركـب
سـبلا
|
|
أو
ملكنـا
يـوم
الـوداع
خيـاراً
|
مــا
نــأى
ظــاعن
ولا
شـد
رحلا
|
|
وحبكنــا
علــى
الكريهـة
سـوقاً
|
ترجــع
العــاتي
العزيــز
أذلا
|
|
مــر
عهـد
الهـوان
لا
عـاد
عهـد
|
كـــان
ويلاً
علـــى
البلاد
وخبلا
|
|
مـر
عهـد
الهـوان
كـم
جـر
فيـه
|
أهــل
مصــرٍ
الضـيم
قيـداً
وغلا
|
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أيهـا
السـائرون
بالوفـد
أسـرى
|
أرعيتـــم
لنـــا
ذمامــاً
وإلّا
|
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غــادى
الســحب
إن
مـررت
بـأرض
|
حلهــا
وفــدنا
فقــف
حيـث
حلا
|
|
واسـق
دار
الأثـار
من
أدمع
السي
|
ل
غــزاراً
إن
شــئت
أن
تسـتهلا
|
|
واقـرأ
القـوم
أننـا
قـد
كتبنا
|
عهــدهم
آيـةً
مـع
الـذكر
تتلـى
|
|
وأســلنا
لــه
النفــوس
مـداداً
|
فهـي
تجـري
دماً
إذا
الموت
أملى
|
|
يادمـاء
الشـباب
تجـري
على
الأر
|
ض
جســاداً
بـه
ثـرى
مصـر
يطلـى
|
|
مــا
لبـاريس
لا
تـرى
أهـل
مصـرٍ
|
بيــن
أهـل
السـلام
للعـدل
أهلا
|
|
كــل
شــعبٍ
لــه
مــؤتمر
الصـل
|
ح
نصــيرٌ
مــن
البعــوث
ومـولى
|
|
ليــت
شــعري
فهـل
أتـاه
كتـابٌ
|
أو
تلقـى
مـن
جـانب
النيل
رسلا
|
|
أودرى
أننـــا
نــراد
اختلاســاً
|
فـي
بيـاض
النهـار
والشمس
تجلى
|
|
ســـفراء
الملــوك
ضــجة
مصــر
|
حـولكم
مـن
زمـازم
الرعـد
أعلى
|
|
كــم
رفعنــا
إليكـم
فـي
شـكاةٍ
|
حجــة
كالصــباح
أو
هــي
أجلـى
|
|
وســـألناكم
البلاغ
فلـــم
نــس
|
مـع
جوابـاً
يـرد
في
الغمد
نصلا
|
|
إن
للنيــــل
ذمـــةً
وعهـــوداً
|
هــي
ديــنٌ
عليكـم
وليـس
يبلـى
|
|
لـو
حقنتـم
تلك
الدماء
اللواتي
|
أهرقتهــا
بنـادق
القـوم
سـبلا
|
|
كــان
ســهلاً
عليكـم
أن
تصـونوا
|
انفسـاً
وردهـا
الـردى
كان
سهلا
|
|
أيهــا
القــائد
المـدل
علينـا
|
قاتــل
اللَــه
مـن
علينـا
أدلا
|
|
صــلفٌ
بيــن
أهــل
مصــر
وعجـبٌ
|
كــان
هـذا
بـأرض
بلجيـك
أولـى
|
|
صــلف
جــد
فــي
مــواطن
هــزل
|
فــإذا
جــد
جــدها
عـاد
هـزلا
|
|
علـــم
النـــاس
أن
مصـــر
بلاد
|
لـم
تكـن
للحـروب
والسـيف
قبلا
|
|
منعتهــا
الأيـام
حمـل
المواضـي
|
وهــي
زيـن
السـيوف
هـزاً
وحملا
|
|
فلــم
الكبريــاء
بيــن
أنــاس
|
تركتهــم
حــوادث
الـدهر
عـزلا
|
|
أيهـا
القـائد
الـذي
حيـر
السي
|
ف
بــدار
الأمــان
شــيماً
وسـلا
|
|
علـم
الخيـل
كيـف
تختـال
في
غي
|
ر
بلاد
لــم
تجــر
للحــرب
خيلا
|
|
إنمــا
يحمــد
المخيلــة
يــومٌ
|
أشــرف
المــوت
فــوقه
أو
أطلا
|
|
مــا
لمصــر
تجـزى
جـزاءً
سـنما
|
ر
لـــديكم
وبالدنيـــة
تبلــى
|
|
وأراكــم
لــولا
بنوهــا
سـقيتم
|
مــن
حيــاض
المنــون
علا
ونهلا
|
|
سـائلوا
الشـام
هـل
بغير
بنينا
|
جبتـم
الـوعر
مـن
فلسـطين
سهلا
|
|
أو
مــددتم
بغيــر
أبنـاء
مصـر
|
فــي
بلاد
العــراق
للفـوز
حبلا
|
|
إبـل
مصـر
وأتنهـا
تعـرف
الفـض
|
ل
عليكـم
لا
تنكـر
العجـم
فضـلا
|
|
لـو
درى
النيـل
مـا
سيلقى
بنوه
|
حــــرم
الأرض
غيــــرةً
أن
تغلا
|
|
كـم
ظفرتـم
منـه
بمـا
عجب
التا
|
ميــز
عنـه
ونـاء
بـالعبء
حملا
|
|
كــل
عــامٍ
تجـبي
إليكـم
حبـوبٌ
|
تفضــح
الجاريــات
وزنـاً
وكيلا
|
|
وقنــاطير
مــن
نضــار
يــوافي
|
كـم
بهـا
القطـن
كـل
عـام
أهلا
|
|
نعـــمٌ
لــو
أردتمــوهن
شــكراً
|
مــا
وفيتـم
منهـا
القليـل
الأق
|
|
مـا
جهلتـم
لمصـر
فيهـا
صـنيعاً
|
إن
تقولـوا
قد
ينكر
الفضل
جهلا
|
|
أنيتـــم
لمصــر
مــا
منحتكــم
|
مـن
هبـات
مـا
جواوزت
بعد
حولا
|
|
أم
نسـيتم
أبناءهـا
يفتـك
المو
|
ت
بهـم
فـي
الـوغى
وبـاءً
وقتلا
|
|
واسـألوا
الترك
هل
سلكتم
سبيلا
|
أو
فتحتــم
بلا
بنــى
مصـر
قفلا
|
|
إن
تقولـوا
إنا
بني
الحرب
نصلي
|
مـن
أردنـا
بهـا
المنايا
فيصلى
|
|
فاسـألوا
الـدردنيل
كيـف
لقيتم
|
فيـه
يومـاً
أدهى
من
الحشر
هولا
|
|
ســائلوا
تلــك
المـواطن
عنكـم
|
فهـي
أوعـى
منكـم
وأفصـح
قـولا
|
|
يـوم
ترمـي
بكـم
إلى
الموت
آجا
|
لٌ
تســــــــاقونها
رعيلاً
وإجلا
|
|
ذاك
وادي
الجحيــم
سـميتموه
اس
|
مــاً
علـى
مـا
لقيتـم
فيـه
دلا
|
|
ونزلتــم
مـن
بعـده
وادي
المـو
|
ت
فكـانت
لكـم
بـه
النـار
نزلا
|
|
بيــن
جيــش
يميــع
تحـت
شـواظٍ
|
مثــل
مــا
تسـلأ
الـدان
فتسـلى
|
|
وأســـاطيل
كالجبـــال
قهـــذاً
|
طـــائح
بـــالردى
وذاك
تــولى
|
|
يحســد
الهالــك
الأسـير
ويـدعو
|
مــن
نجــا
صـبحه
ثبـوراً
وويلا
|
|
كـل
نفـسٍ
لهـا
مـن
الهـول
شـغل
|
وكفــى
بالحمــام
للنفـس
شـغلا
|
|
واسـألوا
إن
أردتـم
جيش
هند
نب
|
رج
عنكـم
يخـبركم
القـول
فصـلا
|
|
إذ
تلقــــونه
بغيـــر
قلـــوبٍ
|
ذهــب
الخــوف
بــالقلوب
ولــى
|
|
فـي
جمـوع
كالليـل
تزجـى
نعاجاً
|
ســبحت
فـي
مسـارح
المـوت
غفلا
|
|
رصـدتها
مـن
جـانب
المنـش
أسـد
|
خلقــت
للــوغى
فروعــاً
وأصـلا
|
|
دربـوا
كـالبزاة
فـي
قنـص
الطي
|
ر
وجــن
البــدى
فتكــاً
وغـولا
|
|
فــأداروا
بكــم
رحاهـا
طحونـاً
|
تأكــل
النــاس
بالقنابـل
أكلا
|
|
طـاحت
الـروسُ
فـي
شواظ
المرامي
|
واحتواهـا
البـوار
علـوا
وسفلا
|
|
وظننتــم
رومانيــا
مثـل
رومـا
|
فجعلتــم
لهـا
مـن
الحلـف
كفلا
|
|
ومـــددتم
لهـــا
أكــف
صــريخ
|
علهـــــا
تكشــــف
البلاء
لعلا
|
|
فاسـتطاروا
مـع
المنايا
وذاقوا
|
ثمـــرات
الغــرور
خســفاً
وذلا
|
|
وجـرى
قبلهـا
علـى
الضـرب
يـوم
|
فيه
زالوا
على
عالم
الملك
زولا
|
|
كــم
خــدعتم
أبنــاءهم
بثنـاء
|
يختـل
الغـر
فـي
الكريهـة
ختلا
|
|
إن
دعـــوتم
ذئاب
رومانيــا
أس
|
داً
علتــم
زعـانف
الصـرب
بسـلا
|
|
فســقاهم
مكنــزن
المـوت
وحيـاً
|
وطــواهم
كمــا
طــويت
السـجلا
|
|
مـا
انتفعتـم
بهـم
ولم
تنفعوهم
|
وتخلــى
عــن
حلفــه
مـن
تخلـى
|
|
هـل
أفـاءوا
عليكـم
مـا
أفـاءت
|
مصــر
مـن
فضـلها
سـخاءً
وبـذلا
|
|
ظنكـــم
أولياؤهــا
أهــل
بــر
|
فــي
وفـاء
العهـود
قـولاً
وفعلا
|
|
فســخوا
بـالنفيس
والنفـس
ظنـو
|
كــــم
لبـــذل
النفيـــس
أهلا
|
|
فــإذا
مصــر
عنـدكم
ويـح
مصـر
|
لا
تسـاوي
بالصـرب
وزنـاً
وعـدلا
|
|
معشــر
الإنجليــز
مصــر
لأهلــي
|
هــا
ومــن
ظـن
غيـر
ذلـك
ضـلا
|
|
معشــر
الإنجليــز
مصـر
اسـتقلت
|
وجـــديرٌ
بالنيــل
أن
يســتقلا
|