|
ما
انتظار
الدمع
أن
لا
يستهلا
|
أو
مــا
تنظــر
عاشـوراء
هلا
|
|
هــل
عاشــور
فقــم
جـدد
بـه
|
مـأتم
الحـزن
ودع
شرباً
وأكلا
|
|
كيـف
مـا
تلبـس
ثوب
الحزن
في
|
مــأتم
أحــزن
أملاكـاً
ورسـلا
|
|
كيـف
مـا
تحـزن
فـي
شـهر
بـه
|
أصـبحت
فاطمـة
الزهـراء
ثكلى
|
|
كيـف
مـا
تحـزن
فـي
شـهر
بـه
|
أصـبحت
آل
رسـول
اللَـه
قتلـى
|
|
كيـف
مـا
تحـزن
فـي
شـهر
بـه
|
ألبــس
الاسـلام
ذلا
ليـس
يبلـى
|
|
كيـف
مـا
تحـزن
فـي
شـهر
بـه
|
رأس
خيـر
الخلـق
في
رمح
معلى
|
|
يـــوم
لا
ســؤدد
إلا
وانقضــى
|
وحســــام
للعلــــى
إلا
وفلا
|
|
يـوم
نيـران
القـرى
قد
اطفئت
|
وركـاب
المجـد
قـد
أوثق
عقلا
|
|
يــوم
الشــمس
غــدت
مكسـوفة
|
فيــه
والبــدر
بـه
لا
يتجلـى
|
|
يــوم
الاشــراك
قــد
عـز
بـه
|
وبــه
الاســلام
والتوحيـد
ذلا
|
|
يـوم
خـر
ابـن
رسـول
اللَه
عن
|
ســرجه
لِلّــه
خطــب
مـا
أجلا
|
|
وهنـاك
اهـتز
عـرش
اللَه
والا
|
رض
فيــه
زلزلـت
والـدين
ثلا
|
|
يـا
قـتيلاً
أصـبحت
دار
العلـى
|
بعـده
قفـراً
وربع
الجود
محلا
|
|
مـا
حسـبنا
ان
نـرى
مـن
بعده
|
للتقــى
مغنــى
وللجـود
محلا
|
|
لا
خطـــت
بعــدك
فرســان
ولا
|
جـرد
الشجعان
يوم
الروع
نصلا
|
|
مـا
نعتـك
الخلـق
لكن
قد
نعت
|
فيـك
إحسـاناً
ومعروفـاً
وبذلا
|
|
بـأبي
المقتـول
عطشـاناً
وفـي
|
كفـه
بحـر
يـروي
الخلـق
جملا
|
|
بـأبي
العـاري
ثلاثـاً
بـالعرى
|
ولقــد
كــان
لأهــل
الأرض
ظلا
|
|
بــأبي
الخــائف
أهلـوه
وقـد
|
كـان
للخـائف
أمنـاً
أيـن
حلا
|
|
وإذا
عـــاينت
أهليــه
تــرى
|
نوبـاً
فيها
رزايا
الخلق
تسلى
|
|
مـن
أسـير
وسـدته
البزل
حلساً
|
وقتيــل
وســدته
البيـد
رملا
|
|
ومصـــونات
عفـــاف
أصـــبحت
|
باديـــات
للعـــدى
حلا
ورحلا
|
|
وبنفســي
مــن
غــدت
نادبــة
|
جـدها
والدمع
في
الخد
استهلا
|
|
جــد
لــو
تنظرنـا
إذ
قربـوا
|
نحونـا
للسـير
انقاضـا
وهزلا
|
|
لــرأت
عينــاك
خطبـاً
فادحـا
|
جـل
أن
يلقـى
له
الناظر
مثلا
|
|
وتــرى
الســجاد
مغلـولاً
علـى
|
قتــب
الرحــل
عليـه
مسـتذلا
|
|
وتــرى
هــذي
تنــادي
ولــدي
|
وأبــي
هــذي
وذي
تنــدب
خلا
|
|
يـا
مصـاباً
هـد
أركـان
الهدى
|
وغــدت
فيـه
يـد
الآمـال
شـلا
|
|
أحســين
فــوق
بوغـاء
الـثرى
|
ويزيـد
فـوق
تخـت
الملـك
حلا
|