|
ســفه
وقوفـك
فـي
عـراص
الـدار
|
مــن
بعــد
رحلـة
زينـب
ونـوار
|
|
مـا
أنـت
واللفتـات
في
أكنافها
|
ظعـن
الفريـق
وخـف
عنـه
الساري
|
|
أخلــت
فـؤادك
مـن
عـزائك
نيـة
|
أخلـت
سـماءك
مـن
سـنا
الأقمـار
|
|
مـا
كـان
احلـي
مـن
سـؤالك
منة
|
لـو
كـان
تـدفع
عنـك
لاهـب
نـار
|
|
جهـل
بهـذا
الـدار
ان
تر
عندها
|
مـــالا
يــراه
مــتيم
مــن
دار
|
|
أم
ضـاع
حلمك
يوم
بادرها
النوى
|
نــادت
ببــدرك
للرحيــل
بـدار
|
|
فــاتيت
تسـأل
رجعـة
مـن
ذاهـب
|
مــا
للرجــوع
وســالف
الاعصـار
|
|
كـم
قـد
أتيت
الدار
اسألها
على
|
مـا
كـان
مـن
عـذل
ومـن
اعـذار
|
|
نشـوان
تشـرب
مـاء
دمعـي
وجنتي
|
مـــن
بعــد
ري
ملابســي
وازاري
|
|
فـاذا
بهـا
عجمـاء
تنطق
عن
حشاً
|
متصـــاعب
الانفــاس
بالتزفــار
|
|
فرجعـت
لا
الوجـد
القـديم
مزحزح
|
عنــي
ولا
كفــي
خلـت
مـن
طـاري
|
|
حيـران
مطـوي
الضـلوع
علـى
حشا
|
منهوكـــة
بالوجــد
ذات
عــوار
|
|
يـا
دار
امـك
زور
شـوق
مـا
لهم
|
غيـر
اللقـا
مـن
مقصـد
الـزوار
|
|
وصـلوك
اذ
هجروا
على
علل
السرى
|
لــك
جــانب
الاوطــان
والاوطـار
|
|
وصـلوك
بالشوق
الجميع
وان
غدوا
|
يتشــــعبون
تشـــعب
الاعشـــار
|
|
وافـوك
مـن
بعـد
الأنيس
واصبحوا
|
يرضــون
بعــد
العيــن
بالاثـار
|
|
حيـــوك
وفــد
زائرون
فــانعمى
|
مــا
فــي
تحيـة
زائر
مـن
عـار
|
|
فعلام
يـا
بـاب
الـديار
واهلهـا
|
لا
تفقهــــن
لــــزائر
أو
زاري
|
|
هــل
زل
رأيـك
أم
رمـاك
بخطبـة
|
صــرف
الزمـان
وطـارق
المقـدار
|
|
لا
صـلح
بعـدك
والمـدى
ان
تلتقي
|
والنقــع
كــأس
والمهنـد
عـاري
|
|
للسـلم
حسـن
سـاعة
فـاذا
انتفت
|
قبحــت
مــواقعه
علــى
الانظـار
|
|
أنـرى
الزمـان
بظننـي
اغضي
على
|
مـا
كـان
مـن
هظمـي
ومن
اضراري
|
|
ابــدى
لا
عيــن
حاسـدي
مقـاتلي
|
وازاح
عــن
ارض
الحـبيب
مـزاري
|
|
آليـــت
لا
القـــاه
إلا
واحــداً
|
فـي
جمعـه
خلـق
الهزبـر
الضاري
|
|
فليجلبـن
مـا
شـاء
مـن
اجنـاده
|
الغربــات
والتفريــق
والاعسـار
|
|
لا
عيـب
مـن
محـن
الزمـان
فانما
|
خلــق
الزمــان
مهانـة
الاحـرار
|
|
او
مـا
كفـاك
مـن
الزمان
فعاله
|
بهنــي
النــبي
وآلــه
الاطهـار
|
|
ولعــت
بفــارع
قـدرهم
اخطـاره
|
مــا
اولــع
الاخطــار
بالاقـدار
|
|
الـذكر
اجمـل
حيـن
يقـرأ
قـارئ
|
والجـودا
كمـل
حيـن
يطـرق
قاري
|
|
بيــض
يريــك
جمــالهم
وجلالهـم
|
تــم
البــدور
عشــية
الاســرار
|
|
يكسـو
ظلام
الليـل
نـور
وجـوههم
|
لــو
الشــموس
وزينــة
الاقمـار
|
|
شـرعوا
بصـافية
الفخـار
وخلفوا
|
للــــواردين
تكفـــف
الاســـار
|
|
يلفـي
العفـاة
بغيـر
مـن
منهـم
|
كمـا
اصـبح
مبتسماً
بوجه
الساري
|
|
خطبـاء
ان
شهدوا
الندى
ترى
لهم
|
فيــه
شقاشــق
فحلــه
الهــدار
|
|
فـاذا
هم
شهدوا
الكريهة
ابرزوا
|
غلبــاً
تجعجـع
بـالفريق
ضـواري
|
|
فـان
احتـبى
بهم
الظلام
رأيت
في
|
المحــراب
سـجع
نـوائح
الاسـحار
|
|
لا
تســـتبين
كلامهـــم
فكــأنهم
|
قـد
خولطـوا
مـن
خشـية
الجبـار
|
|
تخفــي
عبـارة
ذكرهـم
عـبراتهم
|
عنهـم
فلسـت
تـرى
سـوى
استعبار
|
|
هـادون
فـي
طـول
القيام
كأنهمذ
|
بيـن
السـواري
الجامـدات
سواري
|
|
يمسـون
مـن
طـي
الهجيرة
لم
تذق
|
إلا
القـــراح
تحلـــة
الافطــار
|
|
وبيـت
صـبيتهم
علـى
ذاك
الطـوى
|
مشـــغولة
بتتـــابع
الاذكـــار
|
|
وبيــت
ضــيفهم
بــانعم
ليلــة
|
لــم
يحــص
عـدتها
مـن
الأعمـار
|
|
للكـون
مـن
أنفاسـهم
طيب
الشذا
|
ارجــا
كجيـب
الغـادة
المعطـار
|
|
فكأنمــا
الآصــال
مـن
أردانهـم
|
نفــس
الصــبا
بخمـائل
الأزهـار
|
|
وكأنمــا
السـاحات
مـن
آثـارهم
|
روض
الكلــى
متتــابع
الامطــار
|
|
مـا
شـئت
مـن
نسـب
وعظـم
جلالـة
|
فانسـب
وقـل
تصـدق
بغيـر
عثـار
|
|
وحيـاة
نفـس
فضـلهم
لـو
لم
يكن
|
تــدلي
مصــائبهم
لهــا
ببـوار
|
|
وكفـاك
لـو
لـم
تـدر
إلا
كـربلا
|
يـوم
ابـن
حيـدر
والسيوف
عواري
|
|
أيـام
قـاد
الخيـل
توسـع
شأوها
|
مــن
تحــت
كـل
شـمر
دل
مغـوار
|
|
هيـج
إلـى
الحـرب
العوان
كأنما
|
تبــدي
لهــم
عـذراء
ذات
خمـار
|
|
يمشـون
فـي
ظـل
السـيوف
تبختراً
|
مشــي
النزيــف
معـاقراً
لعقـار
|
|
وتنـاهبت
أجسـادهم
بيـض
الظبـا
|
فمســربل
بــدم
الـوتين
وعـاري
|
|
وانصـاع
حـول
الجيش
شبل
الضيغم
|
الكــرار
شـبه
الضـيغم
الكـرار
|
|
يـوفى
علـى
الغمـرات
لا
يلوى
به
|
فقــد
الظهيــر
وقلــة
الأنصـار
|
|
لليـوم
مـن
أنـواره
وقـد
انكفت
|
بنهــاره
الهبــوات
خيـر
نهـار
|
|
يلقـى
الألـوف
بمثلهـا
مـن
نفسه
|
فكلاهمـــا
فـــي
فيلــق
جــرار
|
|
غيــر
ان
يبتـدر
الصـفوف
كـأنه
|
يجــري
وإياهــا
إلــى
مضــمار
|
|
أمضـى
من
الليث
الهزبر
وقر
نبا
|
رمــح
الكمــي
وصـارم
المغـوار
|
|
فكأنمـا
الـدفعات
سـاعة
يلتقـي
|
حلــق
الوفــود
عشــية
الايسـار
|
|
شـهذارة
فـي
السـرج
غـرب
لسانه
|
فـي
الجمـع
مثـل
حسـامه
البتار
|
|
حـتى
انتـه
مـن
العنـاد
مراشـة
|
شـلت
يـد
الرامـي
لهـا
والباري
|
|
وهـوى
فقـل
فـي
الطود
خر
فاصبح
|
الرجفــان
فـوق
قواعـد
الافطـار
|
|
بـابي
وأمـي
عـافرون
على
الثرى
|
أكفـانهم
نسـج
الريـاح
الـذاري
|
|
تصــدق
نحـورهم
فينبعـث
الشـذا
|
فكأنمـــا
تصـــدى
بمســك
داري
|
|
ومطرحــون
تكــاد
مـن
أنـوارهم
|
يبــدو
لعينــك
بــاطن
الأسـرار
|
|
نفسـت
بهـم
أرض
الطفـوف
فاصبحت
|
تــدعى
بهــم
بمشــارق
الأنـوار
|
|
بـالبيت
أقسـم
والركـاب
تحجبـه
|
قصــداً
لادكــن
قــالص
الاســتار
|
|
لـولا
السـقيفة
والـذين
تـبرموا
|
نقضــاً
لحكــم
الواحـد
القهـار
|
|
فنفــوا
مقـام
نـبيهم
عـن
ربـه
|
ومضــوا
بنحلـة
بضـعة
المختـار
|
|
لـم
يلـف
سـبط
محمـد
فـي
كربلا
|
يومــاً
بهـاجرة
الظهيـرة
عـاري
|
|
تطــأ
الخيــول
جـبينه
وضـلوعه
|
بســـنابك
الابـــراه
والاصــدار
|
|
كلا
ولا
راحـــت
بنـــات
محمـــد
|
يشــهرن
فـي
الفلـوات
والامصـار
|
|
حسرى
تقاذفها
السهول
إلى
الربا
|
وتلفهـــا
الانجـــاد
بــالاغوار
|
|
تسـبى
فقل
في
الزنج
تملك
أمرها
|
أيــدي
الجفـاة
والسـن
الاشـرار
|
|
ضــرباً
وسـحباً
وانتهـاك
محـارم
|
وســباً
وســباً
بعـد
غربـة
داري
|
|
يطـوى
بهـن
علـى
الطوى
وقلوبها
|
يطــوين
مـن
ثكـل
علـي
كالنـار
|
|
حسـرى
الوجـوه
غـاد
لامـن
سـاتر
|
يحمــي
المحاسـن
أعيـن
النظـار
|
|
مـا
بعـد
هتكـك
يـا
بنـات
محمد
|
فـي
الـدهر
هتـك
مصـونة
من
عار
|
|
كلا
ولا
لابــــي
ضـــيم
بعـــدها
|
يـــأبى
تحمـــل
ذلــة
وصــغار
|
|
للهتــك
بعـدك
سـتر
كـل
مصـونة
|
ولــدى
المهانـة
نخـوة
الجبـار
|
|
مـا
العـز
مكسـب
لابسـيه
بعيدها
|
شــرفاً
ولا
مــدل
لهــم
بفخــار
|
|
أم
أي
نــدب
بعـد
نـدبك
يبتغـي
|
شــيم
الغيـور
وشـيمة
المغـوار
|
|
قــدر
أصــارك
للخطــوب
دربــة
|
هـة
فـي
البريـة
واحـد
الأقـدار
|
|
لـم
يلبسـوك
غـداة
ينـزع
بينهم
|
برديـــك
بــردي
عفــة
ووقــار
|
|
فالصـون
حيـث
النفـس
لا
مـا
ظنه
|
قـــوم
بحيـــث
خميصـــة
وازار
|
|
يـا
طالبـاً
بالثـار
وقيت
الردى
|
طــال
المقـام
علـى
طلاب
الثـار
|
|
يـا
مـدرك
الأوتار
قد
طال
المدى
|
طـال
المـدى
يـا
مـدرك
الأوتـار
|
|
يـا
ابن
النبي
وخير
من
علقت
به
|
كــف
الــولي
ووالــد
الأبــرار
|
|
أنــا
عبـدكم
ولكـم
ولاي
وفيكـم
|
أملــي
ونحـو
نـداكم
اسـتنظاري
|
|
واليـك
اهـديت
القريـض
فـرائداً
|
منظومـــة
بغـــرائب
الأشـــعار
|
|
فـاعطف
علـي
ففـي
من
ضعف
القوى
|
مـا
ليـس
بالخـافي
علـى
الأبصار
|
|
وعلـي
مـن
أصـر
الـذنوب
عظـائم
|
وعلـــى
علاك
حمالـــة
الأوصــار
|
|
وعلاك
كافلــد
بمــا
أرجــو
مـن
|
الصــفح
الجميــل
وحطـة
الأوزار
|
|
والـدهر
قـرن
لسـت
مـن
أكفـائه
|
ان
لــم
تكونـوا
عنـده
أنصـاري
|
|
أفنـاركي
يا
ابن
النبي
وما
أنا
|
هيهـــات
لا
والواحــد
القهــار
|
|
ثــم
الصـلاة
علـى
النـبي
وآلـه
|
مـا
نـاحت
الورقـاء
فـي
الأوكار
|