|
منـى
القلـب
أن
تـدنو
منـي
والمحصب
|
وللركـــب
قصـــد
دون
ذاك
ومطلـــب
|
|
إذا
كـان
مـا
بـي
فـات
مـا
يطلبونه
|
وإن
كـان
مـا
هـم
فـات
ما
كنت
أطلب
|
|
فكيـف
الـتئام
الشـمس
وهـو
كما
ترى
|
فريقــان
والفصــدان
شــرق
ومغــرب
|
|
خليلـي
عوجـا
بـي
علـى
الربـع
عوجة
|
عسـى
يشـتفي
فيهـا
السـقيم
المعـذب
|
|
ولــو
لــم
يكــن
إلا
بتعريـس
سـاعة
|
لمامــا
نــؤدي
بعــض
فــرض
وننـدب
|
|
خليلــي
لا
واللَــه
لـو
قـد
علمتمـا
|
مــن
النـازح
الثـاوي
بـه
والمغيـب
|
|
لمـا
اخترتمـا
يومـاً
على
ذاك
منزلا
|
ولـو
لـم
يكـن
إلا
مـن
الـدمع
مشـرب
|
|
فعوجـــا
بنفســي
انتمــا
وبيننــا
|
فخيــر
صــحاب
المــرء
مـن
لا
يـؤنب
|
|
تقــولان
قصــد
العيــس
جمـع
ويـثرب
|
صــدقتم
وهــذا
الربـع
جمـع
ويـثرب
|
|
ولا
تعجبـــاً
ممـــا
يحــاول
مــدنف
|
فـامر
كمـا
فـي
اللـوم
ادهـي
واعجب
|
|
دعــاني
واشــجان
الفــؤاد
فــانني
|
جعلتكمـا
فـي
اوسـع
الحـل
فـاذهبوا
|
|
صـحبتكما
كـي
تسـعفاني
علـى
الجـوى
|
امـا
سـبة
اذ
لـم
تفـوا
ان
تؤنبـوا
|
|
جـزا
اللَه
قوما
احسنو
الصبر
والبلا
|
مقيـم
وداعـي
الخطـب
يـدعو
او
يخطب
|
|
بحيـــث
حســـين
والرمــاح
شــواخص
|
اليـــة
والحـــاظ
الاســـنة
ترقــب
|
|
وفرســان
صــدق
مـن
لـوي
بـن
غـالب
|
يــؤم
بهــا
يبغــي
المغـالب
اغلـب
|
|
اخـو
الفضـل
لا
اللاجـي
إلـى
طود
عزه
|
يضـــام
ولا
الراجــي
لــديه
يخيــب
|
|
سـروا
خـابطي
الظلماء
في
طلب
العلا
|
إلـى
أن
بـدى
منهـا
الخفـي
المحجـب
|
|
بكــل
محيــا
منهــم
ينجلـي
الـدجى
|
كـأن
كـل
عضـو
منـه
فـي
الليل
كوكب
|
|
مضـى
ابـن
علـي
الليـث
لانفـس
ماجـد
|
تهــم
ولا
قلــب
مــن
الحــزم
يقـرب
|
|
إذ
الصـــارم
الهنـــدي
خلا
طريقــه
|
وحــاد
عـن
القصـد
السـنان
المـدرب
|
|
وخــوفه
بــالموت
قــوم
حــتى
دروا
|
بـان
حسـيناً
مـن
لقـا
المـوت
يرهـب
|
|
وقـــامت
تصـــادى
دونــه
هاشــمية
|
تحــن
إلــى
وصــل
المنايـا
وتطـرب
|
|
فــوارس
مــن
عليــا
قريـش
تسـنموا
|
مـن
المجـد
صـعباً
ظهـره
ليـس
يركـب
|
|
اتــوافي
العلا
مــا
ليــس
تســنموا
|
معـاني
الثنـا
في
مجدهم
حيث
اغربوا
|
|
اســود
لهــا
الاســد
لضـراغم
مطعـم
|
ومــا
ســفك
الـبيض
الصـوارم
مشـرب
|
|
تـرى
الطيـر
في
آثارهم
طالبي
القرى
|
مـتى
ضـمهم
فـي
حومـة
الطعـن
مـوكب
|
|
عشــية
اضـحى
الشـرك
مرتفـع
الـذرى
|
وولــت
بشــكل
الـدين
عنقـاء
مغـرب
|
|
تــراع
الــوغى
منهــم
بكـل
شـمردل
|
نـــديماه
فيهـــا
ســمهري
ومقضــب
|
|
بكــل
فــتى
للطعــن
فـي
حـر
وجهـه
|
مـــراح
وللضــرب
المرعبــل
ملعــب
|
|
بكــل
نقـي
الخـد
لـولا
خطـا
القنـا
|
تـرى
الشـمس
مـن
معنـاه
تبدو
وتغرب
|
|
كــثير
حيــاً
لــولا
وقاحــة
رمحــه
|
لحـــق
بـــه
للعـــارفين
التشــبب
|
|
كـان
الحـداد
الـبيض
تخضـب
بالـدما
|
لعينيــه
ثغــر
بـارد
الظلـم
اشـنب
|
|
كــان
القنــا
العسـال
وهـي
شـوارع
|
قــدود
تثنــى
فــي
المـراح
وتلعـب
|
|
كـــان
صـــليل
المرهفــات
لســمعه
|
غـــوان
تغنـــي
بالصـــبا
وتشــبب
|
|
كــأن
منايــا
السـود
يطلـع
بينهـا
|
اخــو
البـدر
معشـوق
الجمـال
محجـب
|
|
كــان
ركـام
النقـع
مـن
فـوق
راسـه
|
آرائك
تبنــــى
للوصـــال
وتضـــرب
|
|
كــان
الضــبا
فيــه
نجــوم
مضـيئة
|
ويــومهم
مــن
ثــآير
النقـع
غيهـب
|
|
كـان
صـدور
الـبيض
مـن
ضربها
الطلي
|
اخــو
صــبوة
مضــنى
الفـؤاد
معـذب
|
|
كـــان
اطـــاريف
الاســـنة
تكتســي
|
دمــاً
طــرف
صـب
احمـر
الـدمع
صـيب
|
|
كــان
ازدحــام
القـرن
منـه
لقرنـه
|
نــديمان
فـي
كفيهمـا
الـراح
تقطـف
|
|
كــان
الســهام
الــواردات
لصــدره
|
بنـــان
يعـــاطيه
المــدام
مخضــب
|
|
كــان
حطيــم
السـمر
فـي
لمـس
كفـه
|
مــن
الطعـن
هـداب
الـدمقس
المـذهب
|
|
ومــروا
علــى
مــر
الطعــان
كـأنه
|
لــديهم
جنـى
النحـل
بـل
هـو
اطيـب
|
|
إلـى
أن
ثـووا
تحـت
العجـاج
تلفهـم
|
ثيــاب
علا
منهــم
مــا
حــاك
قعضـب
|
|
واقبــل
ليــث
الغـاب
يهتـف
مطرقـاً
|
علـى
الجمـع
يطفـوا
فـي
لالوف
ويرسب
|
|
إلـى
أن
اتـاه
السـهم
مـن
كـف
كافر
|
الا
خـــاب
بـــاريه
وضــل
المصــوب
|
|
فخــر
علــى
وجــه
الــتراب
لـوجهه
|
كمـا
خـر
مـن
رأس
الشـنا
خيـب
اخشب
|
|
ولـم
انـس
مهمـا
انـس
اذ
ذاك
زينباً
|
عشـــية
جـــاءت
والفــواطم
زينــب
|
|
عراهـا
الاسـى
حـتى
استباح
اصطبارها
|
واذهلهــا
حــتى
اســتبان
المنقــب
|
|
اتـت
وهـي
حسـرى
الـوجه
مما
يروعها
|
وكـــم
حاســر
فــي
صــونه
يتنقــب
|
|
تحـــن
فيجـــري
دمعهــا
فتجيبهــا
|
ثواكــل
فـي
احشـائها
النـار
تلهـب
|
|
نــوائح
يعجمــن
الشــجي
عبراتهــا
|
تــبين
عــن
الشــجو
الخفـي
وتعـرب
|
|
نــوائح
ينســين
الحمــام
هــديلها
|
اذا
مـا
حـدا
الحـادي
وثـاب
المثوب
|
|
ومــا
أم
عشـر
أهلـك
الـبين
جمعهـا
|
عــداداً
يقفـي
البعـض
بعضـاً
ويعقـب
|
|
رأو
غــارة
شــعواء
قـد
وجبـت
لهـا
|
مــن
الحــي
اكنــاف
تنــوح
وتنـدب
|
|
فحلـوا
علـى
أولـى
الطريـدة
لم
تبل
|
قليــل
العنـا
فيمـا
يقـول
المـؤنب
|
|
فراحــوا
كـرام
تحـت
مشـتبك
القنـا
|
يمزقهـــم
منهـــن
نـــاب
ومخلـــب
|
|
وابقـوا
فراخـاً
مـا
لهـم
قوت
يومهم
|
ولا
قــدرة
للكســب
فيهــم
فيكسـبوا
|
|
فبــاتوا
جياعــاً
كلمــا
عـج
منهـم
|
صــبي
غــدت
بالويــل
تبكـي
وتنحـب
|
|
فلمــا
بــدى
صــبح
بـدت
غيـر
غـرة
|
تفتـــش
عـــن
قــوت
لهــم
وتنقــب
|
|
فلــم
تلــف
مـا
منهـم
يسـد
لفـاقه
|
علــى
أن
كلا
مــن
اذى
الضــر
يثغـب
|
|
فراحــت
لهـم
تبغـي
كفيلاً
فلـم
تجـد
|
مـن
النـاس
مـن
يحنـو
هنـاك
ويحـدب
|
|
فـأمت
بهـم
تنحـو
جـواداً
فلـم
يكـن
|
سـوى
باخـل
مـن
ذكـره
الجـود
يهـرب
|
|
فعــادت
علــى
بـأس
وهـم
يكنفونهـا
|
عــويلا
يــذيب
القلـب
شـجواً
ويشـغب
|
|
فبينـا
هـم
فـي
حالـة
الضـر
اذ
بدى
|
لهــم
اشــجع
قاسـي
الفـؤاد
عصبصـب
|
|
اخـــو
تـــرة
اردي
ابــاه
ابــوهم
|
فبـــات
بقلـــب
بـــالجوى
يتقلــب
|
|
وصــادف
منهــم
غــرة
بعـد
ان
غـدا
|
عـــداد
ســـنين
راصـــداً
يتطلـــب
|
|
فغــادرهم
صــرعى
فهـم
نصـب
عينهـا
|
بعيـــن
لهـــم
ترعــى
وروح
تغيــب
|
|
بــا
وهـي
قـوى
منهـن
سـاعة
فـارقت
|
حسـيناً
ونـادى
سـائق
الركـب
ركبـوا
|
|
فركبــــن
حســـرى
لاقنـــاع
ولا
ردى
|
ســوى
الصــون
يحمـى
والأشـعة
تحجـب
|
|
ورحــن
كمــا
شــاء
العــدو
بعولـة
|
يـذوب
الصـفا
منهـا
ويشـجي
المحصـب
|
|
اســـارى
بلا
فــاد
ولا
مــن
مناجــد
|
يعنفهـــا
حـــاد
ويعنـــف
مركـــب
|
|
إلـى
اللَـه
اشـكو
لوعـة
عنـد
ذكرهم
|
تســح
لهــا
العينـان
والخـد
يشـرب
|
|
أمــا
فيكـم
يـا
أمـة
السـوء
غيـرة
|
اذا
لــم
يكـن
ديـن
ولـم
يـك
مـذهب
|
|
بنــات
رســول
اللَـه
تسـبي
حواسـراً
|
ونســـوتك
بالصــون
تحمــي
وتحجــب
|
|
بــوادي
للرائيــن
مــن
كــل
نـاظر
|
يصــــعد
فيهـــا
طرفـــة
ويصـــوب
|
|
اذا
لــم
يكــن
حـب
القرابـة
قربـة
|
فيـا
ليـت
شـعري
بعـدها
مـا
التقرب
|
|
ابـــاد
وهــم
قتلا
واســراً
ومثلــة
|
كــأن
رســول
اللَــه
ليــس
لهـم
أب
|
|
كــأن
رســول
اللَـه
مـن
حكـم
شـرعه
|
علــى
أهلـه
أن
يقتلـوا
أو
يصـلبوا
|
|
أو
ان
بنيــه
دينهــم
غيــر
دينــه
|
فشــرق
يبغــي
رشــد
قــوم
وغربـوا
|
|
أو
انهــم
قــد
نـافقوا
بعـد
مـوته
|
فحظهـــم
فــي
المســلمين
التجنــب
|
|
يذادون
امثال
الغرائب
خالد
الصحيحة
|
منهــــا
صــــاحب
العـــر
أجـــرب
|
|
ففـــي
كـــل
نجــد
والبلار
وحــاجر
|
لهـــم
قمــر
يهــوى
وشــمس
تغيــب
|
|
كـأن
لـم
يكـن
هـدي
النـبيين
هديهم
|
ولا
حبهــم
فــرض
مــن
اللَــه
يـوجب
|
|
بنـي
الـوحي
يا
كهف
الطريد
ومن
بهم
|
لـــوذ
فينجــو
الخــائف
المــترقب
|
|
منــــازلكم
للنــــازلين
مرابـــع
|
يريــف
بهــا
عــاف
ويخصــب
مجــدب
|
|
وايــــديكم
للســــائلين
ســـحائب
|
يهــل
بهــا
عــذاب
النـوال
ويسـكب
|
|
واســيافكم
حمـر
الضـبا
يـوم
معـرك
|
لهـا
الهـام
ملهـى
والـترائب
ملعـب
|
|
واكنـــافكم
للمعتقيـــن
تحـــوطهم
|
بأشـــفق
مـــن
أم
ومــن
واصــل
أب
|
|
ومجــدكم
ذاك
المــدى
كــف
فــاقتي
|
تمـــد
لــه
دون
البرايــا
وتنصــب
|
|
وعينــي
اليكــم
لا
إلـى
مـن
عـداكم
|
وان
كـان
مـن
قـد
كـان
ترنـو
وترقب
|
|
وقصـــد
ســـواكم
لا
تــؤم
ركــائبي
|
وان
كــان
بالنعمــاء
واديـه
مخصـب
|
|
فيــأس
تــراه
النفـس
منكـم
وخيبـة
|
أحــب
لقلــبي
مــن
ســواكم
وارغـب
|
|
فمنعكـــم
لــي
أي
نعمــا
وغيركــم
|
نـــداه
رداً
أشـــقى
بـــه
وأعــذب
|
|
وخلــب
بــرق
منكــم
فــوق
مطلــبي
|
وبــرق
السـوى
عنـدي
وإن
جـاد
خلـب
|
|
فحســبي
اذا
مــا
كـان
حسـبي
انتـم
|
ويــا
رب
حســب
حســبه
ليــس
يحسـب
|
|
فجـد
يـا
بـن
طـه
بالـذي
انـت
اهله
|
فــانت
الــذي
أرجــو
وإيـاك
اطلـب
|
|
وكـن
حاضـري
عنـد
احتضـاري
وناصـري
|
إذا
مــا
أتــاني
منكـر
وهـو
مغضـب
|
|
ولــي
منــك
موعــود
أرجــى
نجـاجه
|
وموعــدك
الحــق
الــذي
ليـس
يكـذب
|