|
أمــا
طلــل
يـا
سـعد
هـذا
فتسـئل
|
نزالـي
فهـذي
الـدار
إن
كنـت
تنزل
|
|
أمـا
منـزل
يشـجيك
إن
كنـت
عاشـقاً
|
فهـل
عاشـق
مـن
ليـس
يشـجيه
منـزل
|
|
هـي
الـدار
لا
شـوقي
إليها
وإن
خلت
|
يحـــال
ولا
عــن
ســاكنيها
يحــول
|
|
قفـوا
بـي
علـى
أطلالهـا
علنـا
نرى
|
ســميعاً
فنشـكوا
أو
مجيبـاً
فنسـأل
|
|
وعجــوا
إليهـا
بـالحنين
واضـرموا
|
باكنافهـا
نـار
التصـابي
واشـعلوا
|
|
عسـاها
إذا
مـا
ابصـرت
لاعـج
الحشا
|
تجيــب
فتشــفي
ذا
ضــناً
أو
تعلـل
|
|
ابــت
شــقوتي
إلا
هواهــا
واهلهـا
|
وان
بــان
عنهــا
أهلهـا
وتحملـوا
|
|
إلـى
اللَه
كم
تلحوا
اللواحي
وتعدل
|
وكــم
ابتــدى
عــذراً
وكـم
اتنصـل
|
|
يريــدون
بــي
مسـتبدلاً
عـن
احبـتي
|
احـالوا
لعمـري
فـي
الهوى
وتمحلوا
|
|
وقـد
علـم
اللاحـون
ان
اخـا
الهـوى
|
إلــى
اللَــوم
لا
يصــغى
ولا
يتعقـل
|
|
مــتى
كـانت
العـذال
تنصـح
عاشـقاً
|
مــتى
كـانت
العشـاق
للنصـح
تقبـل
|
|
علـى
الـدار
منـي
ألـف
الـف
تحيـة
|
وان
غضـــبت
منهــا
وشــات
وعــذل
|
|
وغزالـة
بعـد
النـوى
تطلـب
الصـفا
|
وهيهــات
مــا
بعـد
النـوى
متغـزل
|
|
أبعـد
نـوى
الهـادين
مـن
آل
هاشـم
|
يروقـــك
غـــزلان
ويصـــبيك
غــزل
|
|
بنـو
الحسـب
الوضـاح
والمحند
الذي
|
معــانيه
فــي
العليــاء
لا
تتعقـل
|
|
بهــا
ليـل
امثـال
البـدور
زواهـر
|
وليـل
الـوغى
مسـتحلك
اللـون
اليل
|
|
تفانوا
على
المجد
المؤثل
في
العلا
|
كــذا
لكــم
المجـد
المؤثـل
يفعـل
|
|
أفــادهم
المجــد
التليــد
ابـاءة
|
فافنــاهم
والمجــد
للحــر
اقتــل
|
|
ولا
يــومهم
وابــن
النـبي
بكـربلا
|
وللنقــع
فـي
جـو
السـماكين
قسـطل
|
|
يكـــر
فتنحـــو
نحـــوه
هاشــمية
|
فــوارس
امثــال
الضــراغم
ترفــل
|
|
فـوارس
امثـال
الضـراغم
فـي
الوغى
|
مـن
الحـزم
لا
مـن
خيفـة
الطعن
جفل
|
|
فــرارس
مــن
عليـا
الريـش
وخنـدف
|
لهـم
سـالف
فـي
المجـد
يروى
وينقل
|
|
فـوارس
اذ
نـادى
الصـريخ
تـرى
لهم
|
مكانـاً
بمسـتتن
الـوغى
ليـس
يجهـل
|
|
يــؤم
بهــم
للمطلـب
الصـعب
اصـعب
|
مقبـــل
اطـــراف
البنــان
مبجــل
|
|
ومنخــرق
السـربال
لـم
يـوف
عهـده
|
غــداة
يــوافيه
الكمــي
المسـربل
|
|
بكـل
فـتى
عـدل
القضـا
جائر
النقا
|
صــدوق
كــثير
الطعــن
فيـه
معـدل
|
|
إلـى
أن
ثـووا
تحـت
العجـاج
تلفهم
|
ثيـــاب
علا
منهـــا
قنــي
وانصــل
|
|
فضــل
وحيــداً
واحـد
العصـر
عزمـه
|
كضـــيغم
مطــوي
الضــلوع
شــمردل
|
|
وشــد
علــى
قلــب
الكتيبـة
مهـره
|
فراحــت
ثبــاً
مثـل
المهـى
تتجفـل
|
|
اخــو
نجـدة
لـم
يثنـه
عـن
عزيمـة
|
ســنان
ولـم
يمنعـه
مـا
رام
منصـل
|
|
يكــــر
فلا
تلقـــاه
إلا
جماجمـــاً
|
تطيـــر
واجســاداً
هنالــك
تعقــل
|
|
وإلا
طلا
تـــــبرى
ومعتقلاً
يـــــرى
|
وســـابغة
تفـــرى
وعضـــب
تفلــل
|
|
فـديتك
كـم
مـن
مشـكل
لك
في
الوغى
|
ألا
كــل
معنــى
مـن
معانيـك
مشـكل
|
|
تحيـي
القنـا
رحباً
وقد
ضاقت
المضا
|
وتوســـعها
ريـــا
وقلبــك
مشــعل
|
|
فتلــك
منايــا
أم
امـاني
تنالهـا
|
وذاك
حريــــق
أو
رحيـــق
معســـل
|
|
ومـالاال
يفـري
النحـر
والثغر
سيفه
|
ويعقـــل
ضـــرغاماً
وآخــر
يرســل
|
|
إِلــى
أن
أتـاه
الحشـا
سـهم
مـارق
|
فخــر
فقــل
فــي
يـذبل
قـل
يـذبل
|
|
وادبــر
ينحــو
المحصــنات
حصـانه
|
يحــن
ومــن
عظــم
البليــة
يعـول
|
|
والحبلــن
ربــات
الحجــال
وللأسـى
|
تفاصـــيل
لا
يحصـــى
لهــن
مفصــل
|
|
فواحـــدة
تحنـــو
عليـــه
تضــمه
|
وأخـــرى
عليــه
بــالرداء
تضــلل
|
|
واخـرى
يفيـض
النحـر
تصـبغ
وجههـا
|
واخـرى
لمـا
قـد
نالهـا
ليـس
تعقل
|
|
واخــرى
علــى
خــوف
تلـوذ
بجنبـه
|
واخـــرى
تفـــديه
واخــرى
تقبــل
|
|
تكــف
الــدما
عنـه
وتهمـل
مثلهـا
|
دموعــاً
فلــم
تــبرح
تكـف
وتهمـل
|
|
واخـرى
دهاهـا
فـادح
الخطـب
بغتـة
|
فاذهلهــا
والخطــب
يــذهي
ويـذهل
|
|
وجــاءت
لشــمر
زينـب
ابنـة
فـاطم
|
تعنفــــه
عـــن
امـــره
وتعـــذل
|
|
تـــدافعه
بــالكف
طــوراً
وتــارة
|
إليـــه
بطاهـــا
جـــدها
تتوســل
|
|
تقــول
لــه
مهلاً
فهـذا
ابـن
احمـد
|
وشــبل
علــي
المرتضــى
المتفضــل
|
|
أيـا
شمر
مهما
كنت
في
الناس
جاهلاً
|
فمثــل
حسـين
لسـت
يـا
شـمر
تجهـل
|
|
أيـا
شـمر
هـذا
حجة
اللَه
في
الورى
|
أعـد
نظـراً
يـا
شـمر
ان
كنـت
تعقل
|
|
أعــد
نظــراً
ويــل
لأمــك
بعــدها
|
إذا
الويـل
لا
يجـدي
ولا
العذر
يقبل
|
|
أيـا
شـمر
لا
تعجـل
علـى
ابـن
محمد
|
فــذو
تـرة
فـي
مثلهـا
ليـس
يعجـل
|
|
ومــر
يحــز
النحــر
غيــر
مراقـب
|
مـــن
اللَــه
لا
يخشــى
ولا
يتوجــل
|
|
وزلزلــت
الارضــون
وارتجـت
السـما
|
وكـــادت
لـــه
أفلاكهـــا
تتعطــل
|
|
وراحــت
لــه
الأيـام
سـوداً
كأنمـا
|
تجلبهــا
قطــع
مــن
الليـل
أليـل
|
|
وأضـحى
كتـاب
اللَـه
مـن
أجـل
فقده
|
يحـــن
لـــه
فرقـــانه
والمفصــل
|
|
ولـم
أنـس
لا
واللَـه
زينـب
إذ
دعـت
|
بواحــدها
والــدَمع
كـالمزن
مسـبل
|
|
تقـول
اخـي
يـا
شـق
روحـي
ومهجـتي
|
ويــا
واحــداً
مــالي
سـواه
مؤمـل
|
|
أخـي
يـا
أخـي
لـو
كنت
تنظر
زينباً
|
تســـاق
وزيــن
العابــدين
مكبــل
|
|
أخــي
كيــف
تنسـانا
وتعلـم
أننـا
|
لبينــــك
لا
نقــــوى
ولا
نتحمـــل
|
|
وراحـت
تنـادي
جـدها
حيـن
لـم
تجد
|
كفيلاً
فيحمـــي
أو
حميـــاً
فيكفــل
|
|
أيـا
جـدنا
هـذا
الحبيب
على
الثرى
|
طريحـــاً
يخلــى
عاربــاً
لا
يغســل
|
|
يخلــى
بــأرض
الطـف
شـلواً
وراسـه
|
إلـى
الشـام
فوق
الرمح
بهدى
ويحمل
|
|
ايـا
جـد
لـو
عـاينته
وهـو
بالظمى
|
يقاسـي
المنايـا
والقنـا
منه
تنهل
|
|
أيـا
جـد
ثغـراً
كنـت
تلهـو
برشـفة
|
تســاقط
عنــه
بالقضــيب
المقبــل
|
|
فلـو
خلـت
كيـف
الشـمر
بقطـع
راسه
|
وكيـــف
حســـين
يســتغيث
وتقتــل
|
|
وكيــف
عـوادي
الخيـل
تركـض
فـوقه
|
فلــم
يبــق
منــه
مفصــل
لا
يفصـل
|
|
لتبـك
المعـالي
يومهـا
بعـد
يـومه
|
إذا
مــا
بغــى
بـاغ
واعضـل
معضـل
|
|
وبيـض
الظبـا
والسـمر
تدمي
صدورها
|
وخيـل
الـوغى
تخفـي
وبالهـام
تنعل
|
|
وغــر
المســاعي
والمراعــي
ولهـا
|
ومرملــة
فــي
الحـي
تلحـى
ومرمـل
|
|
ومنقبـــة
تتلـــى
وذكـــر
يرتــل
|
ومكرمـــة
تبنـــي
ومجـــد
يؤثــل
|
|
وليلـــة
مســـكين
تحمـــل
قــوته
|
اليــــه
ســـراراً
والظلام
مجلـــل
|
|
ويـوم
الـوغى
والحـرب
تسعر
والدجى
|
ومحرابـــه
والطـــول
والمتطـــول
|
|
وافـراس
غـارات
الصـياح
اذا
اغتدى
|
بفرســانها
للطعــن
تســعى
وتعجـل
|
|
بكـاء
العـذاري
الفاقـدات
كفيلهـا
|
عشــية
جـدا
الخطـب
والخطـب
مهـول
|
|
مــتى
نبصـر
النصـر
الألهـي
مشـرقاً
|
بــانواره
تكســى
الربــى
وتجلــل
|
|
فيفـــرح
محـــزون
ويكمــد
حاســد
|
ويرتـــاح
مشــتاق
ويرتــاع
عــذل
|
|
يــروم
ســلوى
فـارغ
القلـب
مثلـه
|
وذلــك
خطــب
دونــه
الصـعب
يسـهل
|
|
وآخـر
يـدعوني
إلـى
الحـزن
زاعمـاً
|
وهــل
واقــع
بعــد
الحصـول
يحصـل
|
|
حـرام
علـى
قلـبي
العزا
بعد
فقدكم
|
وفـرط
الجـوى
فيـه
المبـاح
المحلل
|
|
ولـولا
الـذي
أرجـوه
مـن
أخذ
ثاركم
|
فـــاعلق
آمـــالي
بـــه
واعلـــل
|
|
لمـت
علـى
مـا
كـان
مـن
فوق
نصركم
|
أسـى
وجـوى
والمـوت
فـي
ذاك
امثـل
|
|
ولــي
ســيئات
قــد
عرفـت
مكانهـا
|
فظهــري
منهـا
احـدب
الظهـر
مثقـل
|
|
ولــي
فيهــا
مــن
يـد
غيـر
اننـي
|
عليكــم
بهــا
بعــد
الالــه
اعـول
|
|
وسـمعاً
بنـي
المختـار
نظـم
بديعـة
|
يــذل
لهــا
بشــر
ويخضــع
جــرول
|
|
تجـاري
كميتـاً
كـالكميت
ولـم
يكـن
|
بهـا
اخطـل
اذ
ليـس
في
الشعر
اخطل
|
|
فـان
تمنحـوا
حسـن
القبـول
فشأنكم
|
ومــا
عنكــم
ان
يطــردوا
متحــول
|
|
عليكــم
ســلام
اللَـه
مـا
لاح
بـارق
|
ومــا
نــاح
قمـري
ومـا
هـب
شـمأل
|