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أهـاج
حشـاك
للشـادي
الطروب
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قرير
العين
في
الغصن
الرطيب
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فكـم
للقلـب
مـن
وجـد
وحـزن
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وكـم
للطـرف
مـن
دمـع
سـكوب
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ونفــس
حشــو
أحشـاها
همـوم
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يشـيب
لها
الفتى
قبل
المشيب
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تــبيت
وليلهـا
بـالهم
هـاد
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وحشـو
نهارهـا
عقـد
الكـروب
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تخيــل
ان
ضـوء
الصـبح
ليـل
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بـه
جـاء
الصـباح
من
الغروب
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تحهـم
ليـس
تـدري
مـا
تلاقـي
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كفايتهـا
مـن
الصـبح
القريب
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تـرى
الاحزان
مثل
الفرض
فرضاً
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وتحريـم
السـلو
مـن
الوجـوب
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وكيـف
يسـوغ
في
شرع
التصابي
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سـلو
القلـب
عـن
فقد
الحبيب
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تريـد
مـن
الليـالي
طيب
عيش
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وهـل
بعـد
الطفوف
رجاء
طييب
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سـقى
اللَه
الطفوف
وان
تناءت
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سـجال
السـحب
منزعـة
الذنوب
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فكـم
لـي
عنـدها
فـرط
ووجـد
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وحــر
جــوى
لأحشــائي
مـذيب
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أســلوان
لقلــبي
وابـن
طـه
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علـى
الرمضـاء
ذو
خـد
تريـب
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معـرى
فـي
الهجيـرة
لا
يوارى
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مخلا
مـــن
قريــب
أو
حــبيب
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بنفسـي
والـذي
ملكـت
يمينـي
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وأحبــابي
وخلــي
والصــحيب
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فـديت
مضـيعاً
فـي
الطف
فرداً
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ترامـاه
الحـزن
إلـى
السهوب
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عــديم
النصـر
إلا
مـن
قليـل
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مـن
الأنصـار
والرحـم
القريب
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تفـانوا
دونـه
والرمـح
عـاط
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بنــاظره
إلـى
ثمـر
القلـوب
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يـرون
المـوت
أحلا
مـن
حـبيب
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أبـاح
الوصـل
خلـواً
من
رقيب
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فتلـك
جسومهم
في
الترب
صرعى
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عليهـا
الطيـر
تهتف
بالنعيب
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تكفنهـا
الرمـاح
السـمر
حتى
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كــأن
سـليبها
غيـر
السـليب
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وتشـرق
بـالنجميع
كأن
كساها
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صـبيغ
الارجـوان
مـن
الشـحوب
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تخــوفه
المنـون
جنـود
حـرب
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وهل
يخشى
المنون
ابن
الحروب
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أبـي
الضـيم
حامـل
كـل
ثقـل
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عـن
العليـاء
كشـاف
الكـروب
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أبـو
الاشبال
في
يوم
التصادي
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أبو
الايتام
في
اليوم
السغوب
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مسـرة
قلـب
فـاطم
لـو
رأتـه
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وان
أدى
المـآل
إلـى
الشعوب
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لسـرت
لـو
رأتـه
كيـف
ينحـو
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مضـيق
الكـرب
بالقلب
الرحيب
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يحـل
علـى
الكتيبـة
وهو
فرد
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حلول
الليث
في
السرب
السروب
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يــدافع
عــن
مكـامه
ويحمـي
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بصـارمه
عـن
الحسـب
الحسـيب
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خطيــب
بالأســنة
والمواضــي
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وقــرت
ثــم
شقشـقة
الخطيـب
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إِذا
انتظمت
يداه
الرمح
راحت
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لـه
أسـد
الـوغى
بدل
الكعوب
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فاحمــد
حيـن
تلقـاه
خطيبـاً
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وحيـدرة
تـراه
لـدى
الخطـوب
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وظــل
مجاهـداً
بـالنفس
حـتى
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أتـى
فعـل
ابن
منجبة
النجيب
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كـان
المجـد
لا
يرضـى
كريمـاً
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إذا
لـم
يعـد
طعـم
قناً
وذيب
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وولــى
مهــره
ينعـاه
حزنـاً
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بمقلــة
ثاكــل
وحشـاً
كئيـب
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وكـم
مـن
ثاكـل
تهـوى
عليـه
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لصـبغ
الوجه
بالقاني
الصبيب
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وناديــة
تعنــف
فيـه
شـمراً
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وشــمر
ممكــن
حــد
القضـيب
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ونــادت
زينــب
منهـا
بصـوت
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يصـدع
جـانب
الطـود
الصـليب
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أخـي
يـا
سـاحباً
فوق
الثريا
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ذيــول
علا
نقيــات
الجيــوب
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ويــا
متجمعــاً
لنعـوت
فضـل
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سـليم
النقـص
معـدوم
العيوب
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ويـا
سر
المهيمن
في
البرايا
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وشــاهده
علـى
غيـب
الغيـوب
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ويـا
شمساً
بها
تجلى
الدياجي
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رماهـا
الـدهر
عنها
بالمغيب
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ويـا
قمـراً
أحـال
علـى
غروب
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وعاقبـة
البـدور
إلى
الغروب
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فـديتك
لـو
تعـاين
مـا
ألاقي
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لعـز
عليـك
ذلـي
يـا
حبيـبي
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فمـن
ترجـو
لصعب
الخطب
يوماً
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ومـن
نـدعوه
لليـوم
العصـيب
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ومـن
للسـائلين
يفيـض
جـوداً
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وقـد
مجلت
يد
المولى
الوهوب
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ومــن
للمــرملات
ولليتــامى
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كسـوباً
عنـد
فقـدان
الكسـوب
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أخـي
لـم
لا
يفـارقي
اصطباري
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ومــم
وكيـف
لا
يعلـو
نحيـبي
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ورأسـك
فـوق
رأس
الرمـح
عال
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تجـاذبه
الشـمال
إلى
الجنوب
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وبعـدك
يـا
أخـي
عجـب
حياتي
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وكـم
للـدهر
مـن
خطـب
عجيـب
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رمـاني
الـدهر
بالأرزاء
فيكم
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أمـا
للمـوت
عنـدي
مـن
نصيب
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فيـا
بـن
القـوم
حبهـم
نجات
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لمعتصــم
وحطــة
كــل
حــوب
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مـدحتك
راجيـاً
غفـران
ذنـبي
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ومـدحك
فيـه
غفـران
الـذنوب
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أروح
وأغتـدي
نحـو
المعاصـي
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وتلــك
سـعابتي
ولهـا
دؤبـي
|
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فخـذ
بيـدي
واعطف
وارع
ضعفي
|
فانـك
عـدتي
يـا
بـن
الحبيب
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