|
أَتُـــرى
مَــدى
عُمــري
يُمــدّ
قَليلا
|
وَأَرى
مقامـــــا
لِلرَســــول
جَليلا
|
|
لا
قــولَ
قولــك
يــا
شـهاب
مـثيلا
|
هَــذا
اللقــاء
وَمــا
شـفيت
غَليلا
|
|
كَيـــفَ
اِحتيــالي
إن
عزمــت
رَحيلا
|
|
وأنــادي
يـا
مَـولاي
أَدعـو
فاسـتَجِب
|
فــي
روضـة
عَـن
خـاطري
لَـم
تحتجِـب
|
|
مــن
يَــدعُ
فيهـا
رَبَّـه
كرمـا
يُجـب
|
يـا
دار
مـن
أَهـوى
وَحقـك
لَـم
أُجِـب
|
|
داعــي
التفــرق
لَـو
وجـدت
سـَبيلا
|
|
دار
تَفـوق
الـدور
مـن
حيـث
السـنى
|
لســناء
ســاكنها
أَجـل
مـن
اِبتَنـى
|
|
فَمَـتى
أَقـول
إليـك
يـا
دار
الهنـا
|
أَأَروم
عنـكِ
وَقَـد
بلغـت
بـكِ
المنـى
|
|
يومــا
عَلــى
طـول
الرجـاء
بَـديلا
|
|
نَفسـي
عَـن
الـدنيا
وَمـا
فيهـا
نأت
|
إلا
رحابـــك
وَالمَديـــح
اســتمرأت
|
|
ومــن
الــوَرى
ذي
الافـتراء
تـبرأت
|
هَيهـات
أَيـنَ
لـيَ
البَـديل
وَقَـد
رأت
|
|
عينـــي
معــالم
للهــدى
وطلــولا
|
|
إِن
شــمت
مكــة
ثـم
طيبـة
وَالحمـى
|
وَشــفيت
قَلبــاً
مــن
قـديم
مغرمـا
|
|
بالحــج
ثــم
زيـارة
تـروي
الظمـا
|
فَلتَصــنَع
الأيــام
مــا
شـاءَت
فَمـا
|
|
أَبقَـــت
لِقَلــبي
بعــدها
مــأمولا
|
|
واهــاً
ليَــوم
فيـه
أَحظـى
بـاجتلا
|
أَنـوار
بيـتِ
اللَـه
كعبة
ذا
المللا
|
|
وَأَقـــول
قـــربَ
ضــَريحه
متوســلا
|
أَصـبحت
فـي
الحـرم
الشَريف
بحيث
لا
|
|
أَحتــاج
فيـه
إِلـى
الرَسـول
رَسـولا
|
|
مــاذا
أقــدّم
لؤلــؤاً
أَو
جــوهرا
|
لمقــام
مـن
أَعطـاه
ربـي
الكـوثرا
|
|
وأذلّ
كســـرى
ثــم
أَخضــع
قيصــرا
|
أُثنــي
عليــه
بمــا
أطيـق
مقصـّرا
|
|
وأبــــث
أَشـــواقي
إليـــه
مُطيلا
|
|
وَأَبـــوح
بالآمـــال
تلــك
حقــائق
|
تُرجــــى
إذا
صـــحت
لـــديه
عَلائقُ
|
|
وَبـــه
أَلــوذ
وَكــأس
صــفوي
رائق
|
وأكَفكِــف
العــبراتِ
وَهــي
ســوابق
|
|
لا
يَرعـــوين
وَقَــد
وَجــدن
ســَبيلا
|
|
وَالعيــن
مـن
فـرط
السـرور
تكرّمـا
|
تَســـخو
بفيـــض
لا
يَفيــض
تألمــا
|
|
لَكِنَّنـــي
أبقـــي
بكــائي
ريثَمــا
|
وَأَقــول
يــا
إنسـان
عينـي
فربمـا
|
|
تَهــوى
وَلا
تــك
بالــدموع
عَجــولا
|
|
وتمــلَّ
بالأحبــاب
وَقتــا
قـد
رأوا
|
فيـه
اللقا
واشكر
كَثيراً
ما
ارتأوا
|
|
ثـم
اِغتَنِـم
زَمنـا
بـه
بُعـداً
أَبـوا
|
واصــبر
فـإن
وَراء
يومـك
إن
نـأوا
|
|
بهــواك
سـبحا
فـي
الـدموع
طَـويلا
|
|
ســـُقي
الحجــاز
وأشــرقت
آثــارُه
|
وَالســــاكِنون
بـــه
كَـــذا
زوّارُه
|
|
وَتـــألقت
طــول
البقــا
أَنــوارُه
|
طــوبى
لمــن
أَضــحى
بطيبــة
داره
|
|
لا
يُضـــمَرُ
الأزمـــاع
وَالتَحـــويلا
|
|
مـن
سـار
شـوقا
نَحـوَ
يَـثرِب
أَو
سَرى
|
يحمــد
بــزورة
أَحمــد
غِـبّ
السـُرى
|
|
ومـن
اِجتَباهـا
موطنـا
فـاقَ
القُـرى
|
يَلقــى
الحَـبيب
مَـتى
أَراد
وَلا
يـرى
|
|
إلا
مقامــــا
بالهـــدى
مـــأهولا
|
|
لِلَّــه
أَشـكو
مـن
شـواغل
ذا
الزَمـن
|
وَعــوائق
رمــت
العَــزائم
بـالوَهن
|
|
أَمـا
حَنينـي
فَهـوَ
حَتّـى
فـي
الوَسـن
|
أمنــازلَ
الأحبـاب
لَيـسَ
الصـبر
عـن
|
|
هَـــذا
الجمــال
وإن
بعــدت
جَميلا
|
|
مـا
حيلَـتي
مـا
حيلَـتي
لَـم
يَبقَ
لي
|
إلا
ضــــراعة
مُبتلـــى
للمُبتَلـــي
|
|
فَمَــتى
أَراكِ
وَفــي
رحابِــك
أَختَلـي
|
لــوحي
لعينــي
فـي
الـدنو
لأجتلـي
|
|
واصــغي
إلــى
مــا
أَشـتَكي
لأقـولا
|
|
أمســي
وأصـبحُ
فـي
البعـاد
مسـلّما
|
وَمناجيــــا
بتـــذلل
آل
الحمـــى
|
|
متوســـلا
بهـــم
إِلــى
رب
الســَما
|
لا
تحجـــبي
عنهـــم
ســلامي
كلمــا
|
|
حملتـــه
منـــي
صـــَباً
وَقَبـــولا
|
|
مـن
لـي
بِتَمـتيع
النـواظر
فـي
رُبى
|
كثبــان
طــي
أَو
ســهول
فــي
قُبـا
|
|
وَريـاض
مـن
أَهـواه
مـن
عهـد
الصبا
|
حيّتـك
يـا
دار
الهَـوى
ريـح
الصـَبا
|
|
وافــتر
روضــك
بالنَــدى
مَطلــولا
|
|
لا
زلــت
جنــة
ذا
الوجـود
كُرُومهـا
|
دُنيــا
القُطـوف
وَكالبسـاط
أَديمهـا
|
|
وَجفتــك
أَيــام
الحَــرور
ســمومها
|
وونــى
صــَحيحا
فـي
رُبـاك
نَسـيمها
|
|
وأُجـــل
قـــدرَك
أَن
أَقـــول
عَليلا
|
|
وَبَقيــت
عنــد
المحـل
طيبـةَ
الأُكـل
|
يَرتــادك
الــزوار
مـن
كـل
السـُبل
|
|
وَبجــودك
الوســميّ
ســقيا
للنــزُل
|
وَترقرقــت
فــي
سـاحتيك
مـدامع
ال
|
|
عشـــاق
هاميــة
الشــؤون
هُمــولا
|
|
فَعَلــى
جُفــوني
فــرض
عيــن
كلمـا
|
بـــرق
أَضــاء
مبشــراً
آل
الحمــي
|
|
بالخصـب
وَالرحمـات
مـن
مُـزن
السما
|
مطـر
تزيـد
بـه
القلـوب
عَلـى
ظمـا
|
|
فيهـــن
ريّـــا
وَالجفــون
محــولا
|
|
يـا
رَوضـة
الـدُنيا
وحقـك
مـا
لنـا
|
شـــيء
ســـواك
محقـــق
آمالنـــا
|
|
فَلقـــاك
يُنســـينا
بحـــق
آلنــا
|
ولأَنــت
أَحلــى
مــا
تخيلــه
لنــا
|
|
أَحلامنــــا
وأجلُّهــــا
تنــــويلا
|
|
لِلَّــه
إن
شــمتُ
الريــاض
بواســما
|
وَقَضــيت
للحــج
الشــَريف
مراســما
|
|
وَشــهدت
فــي
دار
النــبي
مواسـما
|
فلألثمـــنَّ
مـــن
المطــي
مَناســِما
|
|
أدنــت
إليــك
وأكــثر
التَقــبيلا
|
|
ولأَنفحـــن
عَبــد
الضــَريح
بحُلــتي
|
وَهنـــاكَ
أَشــكو
للحَكيــم
بعلَّــتي
|
|
وَبقبلـــة
الأعتــاب
أشــفي
غُلــتي
|
وأعفّــر
الوجنــات
فـي
الأرض
الَّـتي
|
|
جـــرَّت
بهـــا
آل
النــبي
ذيــولا
|
|
ولأنشــــدنَّ
قَصــــائدي
مترنمــــا
|
بمـــديحه
كالـــدر
صــيغ
منظمــا
|
|
لا
بَــل
أَراه
فــي
النفاسـة
أَعظمـا
|
ولأَشــكرنَّ
الــدهر
حيــن
وفـى
بمـا
|
|
أَملــت
منــه
وَكــانَ
قَبــلُ
مَطـولا
|
|
ولأبســطنَّ
يــديَّ
فــي
طلــب
الجـدا
|
مـن
أَجـود
الكرمـاء
فـي
الأعطايـدا
|
|
وأُهنـــي
جيـــدي
إذ
أراه
مُقلّــدا
|
ولأغبطـــنَّ
الجفــن
لمــا
أَن
غــدا
|
|
بِتُـــراب
تربـــة
أَحمــد
مكحــولا
|
|
قــد
عَــقَّ
عيسـى
نَهلُهـا
بَـل
عَلَّهـا
|
وَلَهــا
اِسـتَوى
حـزن
الفَلاة
وَسـهلها
|
|
حَتّــى
تَلـوح
لَهـا
الريـاض
وَنخلهـا
|
يــا
صـاحبي
هـذي
الـديار
وأَهلهـا
|
|
فَعلام
لا
تَقِـــــف
المَطـــــيُّ
قَليلا
|
|
وتنــي
بِنــا
بـالقرب
منهـا
فـترة
|
فيهـــا
نــبرّد
بالحُشاشــة
جمــرة
|
|
وَنقيــم
غُــدوة
يَومنــا
أَو
بُكــرة
|
لنـــزوّد
الأجفـــان
منهــا
نظــرة
|
|
تَبقــــي
بهـــا
آثـــارهم
تخييلا
|
|
فَهُنــاكَ
نَشــكو
وَالهمــوم
قــواهِرُ
|
وَهُنــاكَ
نَــدعو
وَالقلــوب
طــواهِرُ
|
|
وَهُنــاكَ
نَبكــي
وَالشــؤون
مــواطر
|
وَنـــردد
الحســرات
وهــي
ظــواهر
|
|
وَنبــث
وجــداً
فــي
الفـؤاد
دَخيلا
|
|
وَنُريـح
بـالزَفرات
نَفسـاً
مـا
اِشتكت
|
وَلَــو
انَّهـا
مـن
همهـا
قَـد
أَوشـكَت
|
|
وَكـذاك
نفـس
الحُـر
دَومـاً
لَـو
زكـت
|
وَنَتـوب
عَـن
فعـل
الغَمـائم
إن
بكـت
|
|
مثلـــي
وَمثلـــك
بكــرة
وَأَصــيلا
|
|
يـا
قَلـب
دع
مـا
أَنـتَ
فيـه
تألمـا
|
وَكَفــاكَ
مِمَّــن
قــد
أَســاء
تظلمـا
|
|
فَعَســى
يضــيء
إليــك
حــظ
أَظلمـا
|
أَو
مــا
تـرى
الأنـوار
تُخفـي
كلمـا
|
|
طلعــت
ســنا
بـدر
السـماء
أُفـولا
|
|
وَيَعــود
لــي
عهـد
الصـفا
وَسـروره
|
والأنــس
تشـرق
فـي
الـديار
بـدوره
|
|
برجــا
الَّــذي
جئنـا
لـذاك
نـزوره
|
أَوَ
مــا
تَــرى
حـرم
النَـبي
وَنـورُه
|
|
كالشــمس
قَــد
أَضــحى
عليـه
دَليلا
|
|
حـــرم
يَلــوح
لــدى
خلــوّ
آنســا
|
وَتُــرى
لنفســك
مـن
سـَناه
مؤانسـا
|
|
وَجَميــع
مــا
فيــه
يُـرى
متجانسـا
|
وكأَنَّمـــا
فيــه
النــبي
مُجالِســا
|
|
أَصــــحابه
وَمخاطبــــا
جـــبريلا
|
|
كَــم
مـن
فَـتى
بـالغم
بـات
مُعفّـرا
|
فَــدَعا
الإلــه
بجــاهه
واِســتغفرا
|
|
حَتّــى
اِنجَلــى
عنــه
بصـفو
أسـفرا
|
فاســأل
فثَـمَّ
تـرى
النـوال
مـوفرا
|
|
وَالخَيــر
جمّــا
وَالعَطــاء
جَــزيلا
|
|
واغنــم
وصــالا
بــالأُلى
أَحببتهــم
|
يـا
لَيـت
آلـي
قـد
حُظـوا
يا
لَيتهم
|
|
فَصــغ
الــدعاء
لهـم
وَقَـد
خلفتهـم
|
واشــفع
لصــحبك
وَالَّــذين
تركتهـم
|
|
يَرجــون
نفعــك
إن
وجــدت
قبــولا
|
|
أَبشــر
بِتَحقيــق
الَّـذي
تَرجـوه
مـذ
|
حــزت
القبـول
ببـابه
فـاطلب
وخـذ
|
|
وَبسـاحة
الفيـض
العَميـم
اليـوم
لذ
|
فَلَقَــد
قـدمت
عَلـى
كَريـم
مـن
يَعُـذ
|
|
بحمـــاه
عـــاد
مكرّمــا
مســؤولا
|
|
ملجـا
الضـَعيف
ان
ضـاقَ
يومـا
ذرعه
|
وَثِمــال
مــن
بالجــدب
صـوَّح
زرعـه
|
|
ومجــنّ
مــن
ثقبــت
بســهم
درعــه
|
يــا
ســيداً
لَــولا
هُــداه
وَشــرعه
|
|
لَـــم
نعــرف
التَحريــم
وَالتَحليلا
|
|
يـا
منهَـل
الـورّاد
يـا
خيـر
الملا
|
طــرّاً
وَأَحلــى
ذا
الأنــام
شـمائلا
|
|
أولاك
مُــولي
النـاس
أَنـواع
الحُلـى
|
لَــولاك
مـا
قطعـت
بنـا
عـرضَ
الفلا
|
|
عيـــس
تَبارينـــا
ضــَنىً
وَنحــولا
|
|
قَـــد
شــفّها
وجــدانها
فأحالهــا
|
أَنضــاء
لا
تَشــكو
لغيــرك
حالهــا
|
|
ومـــن
اِشــتياق
للقــاء
أَمالهــا
|
تســري
بنـا
عَنَقـا
فـإن
غنّـى
لهـا
|
|
حــادي
الســُرى
سـارَت
إليـك
ذميلا
|
|
كَـم
بيـن
هـذي
العيـس
مـن
دنف
زمن
|
وَبراحـــة
مِمّـــا
يُعـــانيه
قمِــن
|
|
بـــل
كلّهـــا
متجلــدات
لَــم
تئن
|
شــُعث
ضــوامر
كالقِســي
تُقــل
مـن
|
|
شـــُعث
ســواهم
كالســهام
حُمــولا
|
|
حجــاج
بيــت
اللَــه
أَكــرم
عصـبة
|
ســارَت
عَلــى
حــرّ
الهَجيـر
لقربـة
|
|
وَبرغــــم
آل
بيــــوتهم
وأحبـــة
|
هجَــروا
الظلال
وَيممــوا
مـن
طيبـة
|
|
ظلا
هنـــاك
عَلـــى
العُفــاة
ظَليلا
|
|
لِلَّــه
مــا
أَزكــى
نفوسـهمُ
اِرتَضـَت
|
بــدل
اســتراحتها
شــَقاً
وتمرَّضــت
|
|
فلِــذا
وأَخطـار
المفـاوز
قَـد
قَضـَت
|
يَتلفتـــون
إذ
الوهـــاد
تعرضـــت
|
|
فَتَــرى
عيــونهم
الصــَحيحة
حــولا
|
|
إن
شــمتهم
فــوق
الرحـال
رحِمتهـم
|
وَالشــوق
أَنســاهم
جَميعــا
قـوتهم
|
|
وَبكيــت
عطفــاً
لَـو
هنـاك
رأَيتهـم
|
يَبكــون
والأنضــاء
تــرزِم
تحتهــم
|
|
فكـــأنّ
كلا
قَـــد
أضـــلَّ
فَصـــيلا
|
|
لكـــن
إذا
خنقتهمـــوا
عــبراتهم
|
وَتصــاعَدت
مــن
تَــوقهم
زفراتُهــم
|
|
ورثــت
إِلــى
ذاكَ
العنـاء
عـداتهم
|
تحــدو
بــذكرك
فـي
الفلاة
حُـداتهم
|
|
فكأنهـــا
فيهـــم
تــدير
شــَمولا
|
|
لأحبـــة
ســـكِروا
بــراح
ودادهــم
|
وَشـــَفوا
بقربــك
غلــة
بفــؤادهم
|
|
فَتَقــدموا
مــن
بعـد
طـول
بعـادهم
|
يَرجـــون
منــك
شــفاعة
لمعــادهم
|
|
إذ
لَيــسَ
غيــرك
شــافِعاً
مقبــولا
|
|
بــالأمس
فــي
الأوطـان
كـان
محلّهـم
|
يَغشـــاه
بــالإكرام
منهــم
خِلّهــم
|
|
وَيحيــط
آلهمــوا
بهــم
أو
جُلّهــم
|
والآن
قــد
صــاروا
إليــك
وكلهــم
|
|
ضــيف
لــديك
وَلَــن
تــرد
نــزيلا
|
|
نعــم
الرِفــاق
بغربـة
مـا
عِبتهـم
|
يَومــا
بشــيء
أو
عليــه
عَتَبتهــم
|
|
وَمــن
المَلائكــة
الكِــرام
حسـبتهم
|
قَــدِموا
بِــزاد
مـن
تُقـى
وَصـحبتهم
|
|
أبــدي
اليســار
وأكتــم
التَطفيلا
|
|
لُـــذنا
بروضــتك
الســنية
علّنــا
|
بــالعز
مــن
مَــولاك
نُكفــي
ذُلنـا
|
|
وَيَعــود
يرغبنــا
الَّـذي
قـد
مَلّنـا
|
فاقبــل
ضـراعتنا
إليـك
وكـن
لنـا
|
|
يَـــوم
القيامــة
بالنَجــاة
كَفيلا
|
|
بــك
نَغتَنـي
عَـن
آلنـا
مـع
صـحبنا
|
وَعـن
الألـى
رغبـوا
جفـاً
عَـن
قربنا
|
|
واِســتبدلوا
بــالمزق
خـالص
حبنـا
|
فــاللَه
قَـد
أَعطـاك
مـن
لطـف
بنـا
|
|
جاهــاً
عَريضـاً
فـي
المعـاد
طَـويلا
|
|
مـن
شـاء
فـي
الـدارين
سعداً
فليلذ
|
بحمــاك
يــا
خَيـر
البَريَّـة
وَليَعُـذ
|
|
فَبناصـري
أَرجـوك
فـي
الحـالين
خُـذ
|
فــاللَه
أَعطــاك
الشـَفاعَة
يـوم
إِذ
|
|
كـــل
غَــدا
عَــن
قــومه
مَشــغولا
|
|
لَيـــتَ
الــدراري
تــدنون
لِنــاظم
|
ليصــوغ
عقـدا
فـي
البهـاء
كخـاتم
|
|
لنبـــوَّة
مـــذ
جئت
أســمى
خــاتِم
|
أَنــتَ
المُبــوّأ
مــن
ذؤابـة
هاشـِم
|
|
شــرفا
أَنـاف
عَلـى
الكـواكِب
طـولا
|
|
قـد
صـين
عُنصـرك
الشـَريف
مـن
الأزل
|
فــي
ظهــر
آدم
طيبــاً
حتّــى
وصـل
|
|
لأبيــك
عَبـد
اللَـه
أشـرف
مـن
نَسـَل
|
بــك
كَـرَّم
اللَـه
الجـدود
وطهـر
ال
|
|
آبـــــاء
إِذ
ولـــــدوك
جيلا
جيلا
|
|
بـــك
أُمَّــة
الإســلام
أَشــرف
أمــة
|
حــازَت
بهــذا
الـدين
أكمـل
نعمـة
|
|
وَبنــور
شــرعك
أُخرجــت
مـن
ظُلمـة
|
وَبــك
اســتَفاد
أبـوك
أعظـم
عصـمة
|
|
أَضــحَت
عَلــى
كــرم
النجـار
دَليلا
|
|
مـن
ذا
يُسـامي
نـور
شمسـك
قـد
نسخ
|
أَضــواء
أَســنى
فرقــد
مهمـا
بَـذَخ
|
|
وإليــك
أذعــن
كـل
سـام
قـد
شـمخ
|
وَلــك
المقــام
وَزَمــزَم
ولأجلـك
اخ
|
|
تـــص
الفــداء
أَبــاكَ
إِســماعيلا
|
|
عفــوا
إذا
قَلَمـي
مـديحك
لَـم
يُجِـد
|
إذ
شـبه
ذاتـك
فـي
البَريَّـة
ما
وجد
|
|
وَبنــات
حــوّا
قـط
مثلـك
لـم
تَلـد
|
حملتــك
آمنــة
الحصـان
فَلَـم
تجِـد
|
|
عِـــبئا
كعبـــء
الحـــامِلات
ثَقيلا
|
|
حقـــا
وَذاتـــك
إنَّهـــا
لعنايــة
|
مــن
ربــك
الأعلــى
بهــا
وَرعايـة
|
|
رُفِعــت
لهــا
شــرفا
بوضـعك
رايـة
|
ووُلـــدت
مَختونـــا
وَذلـــك
آيــة
|
|
مَشـــــهورة
لا
تقبـــــل
التَعليلا
|
|
بظهــور
دينــك
كـل
ديـن
قَـد
بُهِـت
|
وَالشــرك
إذعانــاً
لِتَوحيــد
كبِــت
|
|
وَالعــالم
العلــويّ
كالسـفلي
لُفـت
|
وَرأت
لـك
الأحبـار
وَالرُهبان
في
الت
|
|
تَـــوراة
وصـــفا
طـــابق
الإنجيلا
|
|
بعـض
الـرؤس
ذَوو
الرئاسـة
أكـبروا
|
أن
يخضـَعوا
فلـذا
عمـوا
واِستَكبَروا
|
|
وَذوو
البَصــائِر
للحَقيقــة
أبصـَروا
|
فاِستبشــروا
بـك
إذ
ظهـرت
وبشـروا
|
|
إلا
قَليلا
حرّفــــــوا
مـــــا
قيلا
|
|
سـاوَت
قريـش
فـي
الصـفا
بـك
يعرُبا
|
واهــتز
حيـن
ولـدت
مـن
طـرب
قبـا
|
|
وَغــدت
تهنــي
مكَّــة
بــك
يَثرِبــا
|
وَكـذاك
بشـرت
الهواتـف
فـي
الرُبـا
|
|
بــك
وَالكــواهِن
أجملــت
تَفصــيلا
|
|
وَبيُمنـك
المَـولى
كَفـى
الناس
المِحَن
|
بالخسـف
عنـد
السـخط
أَو
مسخ
السحن
|
|
وَرمـى
الأُلـى
زاغـوا
بأصـناف
الاحَـن
|
وَالجــن
تُرمــى
بـالكواكِب
بعـد
أن
|
|
كــانَت
تطيـق
إلـى
السـماء
وصـولا
|
|
أَنــتَ
المظلـل
بالغَمامـة
حيـث
حـل
|
وَعَلَيـكَ
كالتَسـليم
قـد
أرغـى
الجمل
|
|
وَالنخــل
بالهامــات
حيّـا
واِبتهـل
|
وَخمـود
بيـت
النـار
مـن
آياتـك
ال
|
|
لاتـــي
تــرد
الطــرف
عنــك
كَليلا
|
|
كَــم
نـاظِم
قبلـي
بمـدحك
قـد
قصـد
|
سـرد
الَّـذي
أعطـاكه
الفـرد
الصـمد
|
|
مــن
معجــزات
مــع
مَزايـا
لا
تُعـد
|
وَكــذا
بُحيــرة
ســاوة
غاضـَت
وَقَـد
|
|
كـــانَت
جوانبهـــا
تَفــوق
النيلا
|
|
قــامَ
المَســيح
مبشــراً
بــك
آلَـه
|
وَكــذاك
يوســف
حــاز
منـك
جمـالَه
|
|
وَالبــدر
منــك
قـد
اسـتمد
كَمـاله
|
والموبـــذان
رأى
مَنامـــاً
هــاله
|
|
وَســَطيح
شــرف
باســمك
التــأويلا
|
|
كــل
لشــأنك
قــد
أَشــارَ
بمــوجَز
|
وَاللَــه
كــانَ
لــذاكَ
أَقـدَر
مُنجِـز
|
|
بعلـــوّ
قــدرك
فــوقَ
كــل
معــزَّز
|
وَكــذاكَ
فــي
الإيـوان
أَعظَـم
معجِـز
|
|
بهــر
العقــول
وحيّــر
المَعقــولا
|
|
مــا
بــاله
وَمشــيده
طـول
العُمُـر
|
مــا
أَثّــرت
بشــهوقه
غيــرٌ
تمــرّ
|
|
مــاذا
أحــسّ
الجـص
أَم
شـعر
الاجـر
|
لمــا
هَــوَت
شــرُفاته
وانشــق
مُـر
|
|
تجـــس
البنــاء
مشــطراً
مخــذولا
|
|
مـا
الشـمس
يـا
مَولاي
في
برج
الحَمَل
|
يَومـاً
بأَشـرق
منـك
فـي
المهد
الأجل
|
|
وَالخيـر
يَـوم
وُلـدت
للنـاس
انهمـل
|
واِسترضــعتك
حَليمــة
فَـرأت
مـن
ال
|
|
برَكــات
مــا
أَغنــى
أَخــاً
وَخَليلا
|
|
وَالغَيـث
جـاد
عَلـى
المَزارِع
بالجَدا
|
مـن
بعـد
مـا
قد
كادَ
يقتلها
الصدى
|
|
لكــن
ذاكَ
صـدى
صـفاتك
فـي
النـدى
|
وَبيُمــن
وَجهــك
صـدَّ
خالقـك
العـدا
|
|
عَـــن
بيـــت
كعبتـــه
ورَدّ
الفيلا
|
|
أَنعــم
بجســم
بالطهـارَة
قـد
غُـذي
|
واكــرم
بقلــب
بالمثــاني
معــوذ
|
|
مــن
شــر
وسوســة
لإبليــس
القـذي
|
وَلَقَــد
رأى
العلمـانُ
جبريـل
الَّـذي
|
|
شــــق
الفــــؤادَ
وردَّه
مغســـولا
|
|
الشـمس
تُغمِـضُ
إن
رأتـك
مـن
الحَيـا
|
وَالبـدر
معـترف
بِفَضـلك
فـي
الضـيا
|
|
يـــا
مـــن
ولــدت
مكحلا
متحليــا
|
وَنشــأت
يُستَســقى
بغُرَّتــك
الحَيــا
|
|
وفضــلت
بالصــدق
الــورى
تَفضـيلا
|
|
أَبــدى
الأنــام
إليـك
طـرّاً
تَـوقَهم
|
مــذ
وافقـت
منـك
الشـَمائل
ذَوقَهـم
|
|
وأســرت
بــاللطف
الرفـاق
ونـوقَهم
|
وَرأى
بَحيــرا
ركــب
مَكَّــة
فــوقهم
|
|
ظـــل
الغمامـــة
يشـــبه
الإكليلا
|
|
فَغَـــدا
لربــك
بالضــمير
موحّــدا
|
وإلــى
ســويّ
صــراط
مَـولاك
اِهتـدى
|
|
لا
غـروَ
مـذ
قَـد
شـامَ
مصـباح
الهدى
|
وَرآك
والأشــــجار
حولـــك
ســـُجَّدا
|
|
لـــك
حيــث
مِلــت
تفيــأت
لتميلا
|
|
وَمَضــى
مَــع
الأشـواق
إِثـرَ
جِمـالهم
|
مستأســــراً
لجلالهـــم
وَجمـــالهم
|
|
متفيـــأ
معهـــم
بســـاط
ظِلالِهــم
|
فــرآك
وَهــي
عليــك
عنـد
رحـالهم
|
|
فَســـَعى
إليـــك
وأَكــثر
التَبجيلا
|
|
وَلَقَـــد
تمنــى
أَن
يَكــون
ملازمــا
|
للركــب
ثــم
إلــى
ركابـك
خادِمـا
|
|
مـذ
شـام
جـوداً
منـك
يُنسـي
حاتمـا
|
وَجلاك
أَوصـــافاً
وَشـــاهد
خاتمـــا
|
|
لَــك
ثــم
فــاز
بلثمــه
تَقــبيلا
|
|
كــلّ
يســرّ
بــذاك
جِــدّاً
لَـو
طُلِـب
|
عبــداً
إليــك
حفيـدَ
عبـد
المطلـب
|
|
لكــن
بحيــرا
راهــب
لَــم
يَنقَلِـب
|
وأســـر
للعــمّ
الشــَقيق
بــأن
لاب
|
|
نِ
أَخيــكَ
شـأناً
فـي
الوجـود
جَليلا
|
|
ســيؤيّد
الرســل
الكِــرام
وَدينهـم
|
وَيُــري
البَريَّــة
شــكَّهم
وَيقينهــم
|
|
وَبهـــديه
يُعلــي
الإلــه
شــؤونهم
|
فاحــذر
عليـه
مـن
اليهـود
فـإنهم
|
|
إن
يقــدروا
يَومــاً
عليـه
اغـتيلا
|
|
صــحت
فراســته
بمــا
أَنبــا
فَلـم
|
يُخطـي
الَّـذي
قَـد
خَـطَّ
باللوح
القلم
|
|
وَبرؤيـة
الهـادي
انجلـت
عنه
الظُلم
|
طـوبى
لـه
نظـر
الهـدى
فأتـاه
لـم
|
|
مـــا
أَن
رآه
وَلَــم
يــر
التَعطيلا
|
|
قــل
للــواتي
شــِمنَ
يوسـفَ
ليتكُـن
|
قــرَّت
بنــور
البــدر
طــه
عينكُـن
|
|
أولــى
لحسـنك
أن
يشـار
بـذا
لكـن
|
وَلَقَـــد
رأى
كــل
حُلاك
وَلَــم
تكــن
|
|
لَــولا
الهــدى
عنـد
امـرئ
مَجهـولا
|
|
قَــد
قمــت
تصــدع
بالـدعاء
لملّـة
|
بـــأعزة
نُصـــروا
بجمــع
القِلَّــة
|
|
وَرَمـــوا
جمــوع
الأكــثرين
بذلــة
|
حَتّـــى
علـــت
أَعلام
ملتــك
الَّــتي
|
|
عمــت
حزونــا
فـي
الـوَرى
وَسـهولا
|
|
وَاللَــه
شــاءَ
بــأن
يتـم
ظهورهـا
|
فســـرت
نجــوم
قَبــائل
وَبــدورها
|
|
يســعون
حيــث
سـعى
بهـم
منصـورها
|
فَأَضــاءَت
الــدنيا
وأشــرق
نورهـا
|
|
وَبَـدا
الهـدى
وَغَـدا
الضـلال
ضـَئيلا
|
|
نـــور
أَبــي
مَــولاك
أن
لا
يَنطَفــي
|
بـالرَغم
عَـن
أَفواه
ذي
الشرك
الخَفي
|
|
فَلِــذاك
كــل
ســار
خلفــك
يَقتَفـي
|
وَأَتــاكَ
بـالوَحي
الأميـن
وأنـت
فـي
|
|
أقصــــى
حِــــرا
متبتلا
تَبـــتيلا
|
|
فــي
شــكل
دحيــة
حاكيــا
لاهـابه
|
غـــض
الشـــَباب
مســربلا
بثيــابه
|
|
أَقــراك
مــن
بعـد
انكشـاف
نقـابه
|
فــوعيت
مـا
أُوحـي
وَقَـد
ألقـي
بـه
|
|
قَــولا
مــن
الــذكر
الحَكيـم
ثقيلا
|
|
ثِقَــل
ولكــن
لــم
نجــد
مـن
مَلّـه
|
بـــل
كـــل
إنســـان
تَلاه
أجلّـــه
|
|
وَهـــداه
منــه
إذا
هــواه
أضــله
|
نـــور
كـــأن
بكـــل
قلــب
حلّــه
|
|
لضـــياء
بـــاطنه
بـــه
قنــديلا
|
|
يـا
مـا
أُحَيلـى
فـي
النفـوس
حلوله
|
وَقعـــا
وأســلس
للســماع
وصــوله
|
|
لكـــن
رأى
البلغـــاء
أن
مَقــوله
|
عجـز
الـوَرى
عنـه
فَمـا
اِسطاعوا
له
|
|
حاشــــاه
تشـــبيها
وَلا
تَمـــثيلا
|
|
إن
تَتــلُ
أَجــزاه
تجــد
مَعســولها
|
حلــوَ
المكــرَّر
قـد
نفـى
مَعسـولها
|
|
مـن
ذا
الَّـذي
في
الأنس
يأتي
مثيلها
|
بــل
آيـة
منـه
لَـو
اِجتَمَعـوا
لَهـا
|
|
والجــن
عــادوا
خاســئين
نكــولا
|
|
قَــد
أنزلـت
آيـاته
اللاتـي
اِرتقـت
|
فـي
لَيلَـة
القـدر
الَّـتي
قـد
أشرقت
|
|
فغــدوت
تَتلوهــا
كَمــا
قـد
نسـقت
|
وَصـــدعت
بــالحق
الضــلال
فمزقــت
|
|
أنــوار
شــرعك
ثــوبه
المســدولا
|
|
وَقــرأت
باسـم
اللَـه
علّـم
بـالقَلَم
|
فــأريت
نهــج
الارتقــا
كـلَّ
الأمـم
|
|
ســيّان
عُـرب
النـاس
عنـدك
وَالعجـم
|
فأجـاب
مـن
سـبقت
لـه
الحسـنى
وَلَم
|
|
يحتــج
وَقَــد
وضــح
الطَريـق
دَليلا
|
|
عـــرف
اللَــبيب
مَعاشــه
وَمعــاده
|
فَســـَعى
وَراءَك
يَبتَغـــي
إســـعاده
|
|
ومــن
التُقــى
وَالخيـر
أَكـثر
زاده
|
وَعصــاك
مــن
خَتـم
الشـقاء
فـواده
|
|
فَغَــدا
وَقَــد
وضـح
الهـدى
مَكبـولا
|
|
كَــم
صــُوّبت
مــن
كــل
وغـد
منهـمُ
|
لعلاك
عَــن
قــوس
الجهالــة
أَســهُمُ
|
|
وَعتــــادهم
داء
وَهـــديك
مَرهـــم
|
فصـــبرت
تَــدعوهم
وَتحلــم
عنهــم
|
|
وَتَـــروضُ
جـــامِحَهم
وَتُلطِـــف
قيلا
|
|
ويـــل
لِقَـــوم
كـــبرهم
أَرداهــم
|
وَثنـــاهم
نحـــو
الضــلال
هــواهُم
|
|
أَنــى
لهـم
فـي
الحـق
أن
يَتوهمـوا
|
وَرأى
انشــقاق
البــدر
كــل
منهـم
|
|
فعمــوا
وَزادوا
بالهــدى
تَضــليلا
|
|
بســعود
حظــك
عــاد
عــاثر
جَـدّهم
|
يبـــدي
الملام
لزيــدهم
وَعبيــدهم
|
|
مــدو
الشــباك
فقصـَّرت
عَـن
صـيدهم
|
وَحمــاك
ربــك
مــن
حبـائل
كيـدهم
|
|
ليتـــم
ســابق
أَمــره
المَفعــولا
|
|
ســاءَت
قلــوب
قَــد
تَنــاهَت
غِلظـة
|
وَكَـــذا
طبــاع
قــد
تبــدَّت
فَظَّــة
|
|
أَو
لَــم
يَـروا
فـي
معجزاتـك
لحظـة
|
أَســرى
إلــى
الأقصـى
بجسـمك
يقظـة
|
|
لا
فــي
المَنــام
فيقبـل
التـأويلا
|
|
قــد
صــدَّق
الإسـراء
مِمَّـن
قـد
أسـن
|
صــديقك
المحيـي
الفَـرائض
وَالسـُّنَن
|
|
وَمـن
الشـَبيبة
والـد
السـبط
الحَسن
|
إذ
أَنكرتــه
قريـش
قبـل
وَلَـم
تكـن
|
|
لـترى
المهـول
مـن
المنـام
مهـولا
|
|
جـاءَ
الـبراق
إِليـك
يـا
خير
الملا
|
مُتَبَختِــــراً
يحكـــي
أغـــرّ
محجلا
|
|
متَســربِلا
بــالخزّ
زُركِــش
بــالحُلى
|
فَعرجــت
تَختَــرِق
الســموات
العُلـى
|
|
شــرفاً
عَلــى
الفلـك
الأثيـر
أَثيلا
|
|
قـد
حـزت
سـبق
الأنبيـا
مِمَّـن
خَلـوا
|
مـن
عهـد
آدم
مـع
بَنيـه
وَلَـو
عَلوا
|
|
فلـذاك
مـذ
حضروا
الجماعة
واِقتدوا
|
صــليت
والأفلاك
خلفــك
قــد
تلــوا
|
|
فيهـــا
كليمـــا
ســـابقا
وَخَليلا
|
|
مـن
حـلَّ
حيـثُ
حلَلـت
فـي
الأقصى
أمن
|
وَلنفســه
منــك
الشـَّفاعةَ
قـد
ضـمن
|
|
مــذ
ســِرت
فــي
ركـب
بـإجلال
قمـن
|
وَصـعدت
مَـع
جبريـل
حَتّـى
القـاب
من
|
|
قوســين
أَو
أَدنــى
بلغــت
حُلــولا
|
|
يــا
لَيلــة
عَــن
وصـفها
أَفواهُنـا
|
عجــزت
وَفيهــا
قــد
دَعـاك
إلهُنـا
|
|
لحظيــرة
جبريــلُ
إذ
عَنهــا
وَنــى
|
جــاوزت
مــوقفه
وَقلــت
إلـى
هنـا
|
|
يــا
صــاحبي
يَــدع
الخَليـل
خَليلا
|
|
أَمســَيت
للمــولى
الكَريــم
مُكلمـا
|
وَمشــاهد
اللـذاتِ
فـي
عـرش
السـما
|
|
وَمــذ
اِصـطَفاكَ
عَـن
الكليـم
تَقـدُّما
|
أوحـى
إليـك
اللَـه
مـا
أوحـى
وَمـا
|
|
كــذب
الفــؤاد
وَلا
اسـتراب
ذُهـولا
|
|
طُـويت
فَيـافي
الكـون
مـن
أُم
القُرى
|
لِلقـدس
ثـم
إِلـى
الطِّبـاق
بلا
افتِرا
|
|
حتّــى
حَظيــت
بــذات
ربــك
لامِــرا
|
وَرجعـت
وَاللَيـل
الَّـذي
فيـه
السـُّرى
|
|
وَالعَــودُ
مـا
خَلَـع
السـوادُ
نُصـولا
|
|
يـا
سـعد
مَـن
مِـن
آل
مكـة
أُلهِمـوا
|
تَصــديق
مــا
أَخفــاه
لَيــلٌ
أدهَـمُ
|
|
فَرَضــيت
ثــم
لِلَّــه
قَبلَــك
عنهــمُ
|
وَدَعــــوت
إذ
آذاك
قـــوم
منهـــمُ
|
|
علمـــا
بـــأنهمُ
أَضـــلُّ
ســـبيلا
|
|
كَــم
قَــد
دَعـوت
لهـم
بهـدي
كلَّمـا
|
زادوا
التَفنّــن
فــي
أَذاكَ
تحكُّمــا
|
|
فـــوكلت
لِلَّـــه
قِصاصـــاً
صــارِماً
|
فأصـابهم
مـا
قلـت
وانصـرعوا
كَمـا
|
|
أَخـــبرت
كلا
حيـــثُ
رُمــت
جَــديلا
|
|
بـاتوا
وَقَـد
بُهِتـوا
مسـاء
هَجرتهـم
|
مــن
بعــد
أن
حــاججتَهم
وَحججتَهـم
|
|
فَلِــذا
مـع
الحـب
المزيـد
مَججتهـم
|
وَخرجــت
يــا
بُشــرى
لقـوم
جئتهـم
|
|
وَخســـار
مــن
فــارقتهم
مملــولا
|
|
ســوء
النَوايــا
وَالحفــائظ
منهـم
|
طَبعــا
ثنــى
منـك
العَواطِـف
عنهـمُ
|
|
فـــتركتهم
حيــث
الجفــا
لــديهمُ
|
وأويــت
كَــي
تخفــي
سـُراك
عليهـمُ
|
|
غـــاراً
وَصـــاحبك
اتخـــذت
زَميلا
|
|
بعثـوا
سـُراقة
فارِسـاً
مـن
حيـث
خَف
|
وَسـواه
مـن
فـرط
العَمايـة
وَالسـخف
|
|
للحـاق
مـن
بعنايـة
المـولى
التَحف
|
فَتَقــول
حيــن
تَـرى
خُطـاهم
لا
تخـف
|
|
وَكَفــى
بِثــاني
اثنيـن
فيـه
وَكيلا
|
|
ســـلمت
خُطــاك
وَلا
تَــزال
رَفيعــة
|
مــن
شــيمة
رفضــت
إليــك
شـَريعة
|
|
ســـاروا
وَراءَك
مضـــمرين
وَقيعــة
|
فَبنــى
عليــه
العَنكبــوت
خَديعــة
|
|
بهــمُ
وصــاح
بــه
الحمـام
هَـديلا
|
|
كــادوا
إليــك
فــرد
ربـك
كيـدَهم
|
فــي
نحرهــم
وَرمــى
بهـزم
جنـدهم
|
|
وأذل
ســــيدهم
إليـــك
وَعبـــدهم
|
وأتــى
ســراقة
يَبتَغـي
بـك
عنـدهم
|
|
مـــالاً
غـــدا
لغُــواتهم
مبــذولا
|
|
وَالمـــرء
إن
ولِعــت
بــه
حُســّاده
|
يَســمو
إِلــى
أَوج
الســماك
عمـاده
|
|
بعثـــوه
عَــن
رأي
جفــاه
ســداده
|
فَـــوَهت
عزيمتـــه
وَســاخ
جــواده
|
|
فــي
الأرض
مرتطمــا
بــه
مَشــكولا
|
|
كَــم
بــاتَ
بالمرصـاد
وغـد
راصـِدا
|
مـن
لَـم
يسـئ
قصـداً
فَخـاب
مقاصـدا
|
|
فَكــذاك
كنــت
نظيـر
غرسـك
حاصـداً
|
وأتيــت
خيمــة
أم
معبــد
قاصــداً
|
|
فيهــا
وَقَــد
حمــي
الهَجيـر
مقيلا
|
|
واهــا
لهـا
مـذ
قـد
مكثـت
هُنيهـة
|
وَالســعد
وافاهــا
بــذاك
بَديهــة
|
|
وَالفقـــر
حــال
لا
تــزال
كريهــة
|
فَرأَيــت
فــي
كسـر
الخبـاء
شـويهة
|
|
عجفــاء
يابســة
الضــروع
هــزيلا
|
|
طبـع
الكَريـم
عَلـى
التكـرم
غالِبـاً
|
حَتّــى
تَــراه
مَـع
الخصاصـة
واهيـا
|
|
لا
غــرو
حيــن
رأَيــت
دَراً
ناضــِباً
|
فمســـحت
ضــرعيها
فــدرَّت
حالبــا
|
|
رِســلا
يظــنّ
لــه
المَعيــن
رسـيلا
|
|
يــدك
الَّــتي
فاضـَت
بنبـع
بحارهـا
|
أَجــرت
عيــون
الـدر
مـن
أَغوارهـا
|
|
وَبـــذاك
أمكنهــا
قــرى
زوّارهــا
|
فشــربت
وَالرهــط
الَّــذين
بـدارها
|
|
وَتركتهــا
شــكرى
الضــروع
حفـولا
|
|
وَتركـــت
ربتهـــا
بُعيــد
القلّــة
|
لا
تَشـــتَكي
للضـــيق
أَدنــى
علــة
|
|
مــا
دام
فــي
الأخلاف
قـوت
اللَيلـة
|
وأتيــت
طيبــة
دار
هِجرتــك
الَّـتي
|
|
تُحــدى
إليهــا
الراقِصــات
قُفـولا
|
|
فُتحـــت
نواديهــا
إليــك
رَحيبــة
|
وَاليُمــن
رد
بهــا
الريـاض
خَصـيبة
|
|
وصـــغت
قلـــوب
للــدعاء
مجيبــة
|
وأَتتـــك
أَملاك
الســـماء
كَتيبـــة
|
|
فــي
يــوم
بــدر
فوارسـا
وخيـولا
|
|
مــن
شــاء
مــولاه
المهيمـن
عصـمه
|
لا
يَســتَطيع
النــاس
يَومــا
وصــمه
|
|
مـــن
ذا
لجيشــهم
يحــاول
قصــمه
|
وَرآهــم
مــن
كــان
يقصــد
خصــمه
|
|
فَيــراه
مــن
قبـل
الوصـول
قـتيلا
|
|
كَــم
مِــن
كَريــم
بــالوَلاء
ملكتـه
|
وَعَظيــم
قــوم
بعــد
مــا
أَمسـكته
|
|
منّـــا
عليـــه
لنفســـه
ملّكتـــه
|
وَالجــذع
حــن
إليــك
حيـن
تركتـه
|
|
وعلــوت
منــبرك
الشــريف
عــدولا
|
|
أبـــدى
إليـــك
غَرامــه
فرحمتــه
|
لمّـــا
علمـــت
بوجـــده
وَفهمتــه
|
|
واِهــتز
مــن
طــرب
وقــد
كلمتــه
|
حتّــى
رجعــت
إليــه
ثــم
ضــممته
|
|
فَغَــــدا
يئن
كمـــن
يحـــن
عَليلا
|
|
ســاد
الجــذوع
وَتـاه
مـذ
بـاركته
|
وَشـــفيت
علتـــه
وَمـــا
تــاركته
|
|
وَصــــفيته
ودّا
وَمــــا
مـــازقته
|
لَــو
ذابَ
مــن
كمــد
وقَـد
فـارقته
|
|
أســفاً
لــذلك
لَــم
يكــن
معـذولا
|
|
مـن
معجزاتـك
بـدر
هـذا
الكـون
شق
|
وَالأمـر
لـو
للشـمس
أُصـدِر
لَـم
يشـق
|
|
لا
غــرو
أن
أدنيـت
أَنجـم
ذا
الأفـق
|
وَدَعــوت
بالأشــجار
فاِبتــدرت
تشـق
|
|
ق
الأرض
خاضـــعة
إليـــك
ذلـــولا
|
|
مــا
إن
رأَينـا
الغـرس
قبلا
مغرمـا
|
يجنــي
الـرؤوس
إلـى
سـواك
مُسـلّما
|
|
لا
غـــرو
مـــذ
شــرفتها
متكلمــا
|
وأمرتهــا
بــالعود
فاِنتصـبت
كَمـا
|
|
كــانَت
وَمــا
وجــدت
لـذاك
ذُبـولا
|
|
كــالوَرد
أَزهــر
زاهيــاً
فـي
كمـه
|
متمنـــي
التَشـــريف
منــك
بشــمّه
|
|
وَشــكا
البَعيــر
إليـك
فـادح
همّـه
|
وَكـــذاك
أَخــبرك
الــذراع
بســمّه
|
|
فـي
الـزاد
حيـن
أَتـوا
بـه
محمولا
|
|
كَــم
قَــد
عفـوت
تكرمـاً
عمـن
جنـى
|
فغــدت
ثمـار
العفـو
طيبـة
الجنـى
|
|
وَصـفحت
عَـن
مـن
قـد
هجـا
مسـتهجِناً
|
وَمنحــت
فــي
بــدر
عُكاشـة
مِحجنـا
|
|
فَغَــدا
حســاما
فــي
يـديه
صـقيلا
|
|
ســعد
الَّـذي
بـالقَلب
أَمسـى
مُصـغيا
|
لـــك
وده
ومــن
التكلــف
مُعفيــا
|
|
فمنحتـــه
منــك
الرضــاء
موفيّــا
|
وَكَـذا
ابـن
سـلم
وابـن
جحـش
الفيا
|
|
عـــود
الجريــد
مُهَنّــدا
مَســلولا
|
|
نمــرود
أَوقــد
لِلخَليــل
وأَضــرما
|
نــاراً
غــدت
بــرداً
وَسـلما
سـلّما
|
|
وَالــروح
أوحــى
بالمَسـيح
لمريمـا
|
ورددت
طــرف
قتــادة
مـن
بعـد
مـا
|
|
أَودى
فأضــــحى
كالصــــَحيح
كحيلا
|
|
كَــم
علَّــة
أَبرأتهــا
حيـن
اِلتَـوَت
|
طــرق
العلاج
عَلــى
أسـاة
قـد
كـوت
|
|
وأعــدت
ناضــرة
نفوســاً
قــد
ذوت
|
وَكَــذا
رفاعـة
وابـن
عمـك
إذ
حـوت
|
|
عَينـــاه
ريقــك
فيهمــا
متفــولا
|
|
حقــاً
خلقـت
لـذي
البَسـيطة
محـورا
|
وَغـــدوت
للأرجـــاء
طــرا
مُبصــِرا
|
|
لا
غـــرو
أن
حــدّثت
عمــا
لا
يــرى
|
وَنعيــت
بـالغَيب
ابـن
عمـك
جعفـرا
|
|
مَــع
صــاحبيه
وَقَــد
غَـدا
مَقتـولا
|
|
كســرى
أَنــو
شــروان
قـد
حاسـنته
|
وَهِرقــل
عَــن
يــد
جزيــة
هـادنته
|
|
وَحفظــت
عهــد
مَقــوقس
مــا
خنتـه
|
وَكَــذا
النَجاشــيّ
الَّــذي
عــاينته
|
|
قـــد
راحَ
فــوق
ســَريره
مَحمــولا
|
|
فهــم
ابــن
داود
الحَــديث
لنملـة
|
وَقَضـــى
بإنصـــاف
أَبــوه
لســخلة
|
|
ضــَد
الَّــذي
جــافى
أَخــاه
بزَلّــة
|
وأمــرت
عزقــاً
شــامِخاً
فـي
نخلـة
|
|
شــماء
فاِبتــدر
الصــَعيد
نــزولا
|
|
وَلَقَــد
شـفى
بـالقرب
منـك
تباعـدا
|
وَحظـــى
فَقَبَّــل
راحتيــك
وَســاعدا
|
|
فرضــيت
عنــه
بــادئا
أَو
عــائدا
|
وأمرتـــه
فَثنـــى
إليــه
صــاعِدا
|
|
حَــتى
اســتقر
بـه
المكـان
حلـولا
|
|
وَلئن
مشـت
نحـو
الكليـم
عَلـى
حَيـا
|
مبعوثـــة
مـــن
والــد
مستســقيا
|
|
فَلَقَــد
ســقاها
وحــدها
مســتجديا
|
وَدعـوت
عـام
المَحـل
فانهـلَّ
الحيـا
|
|
حَتّــى
دعــوت
وَقَــد
طفــى
ليَـزولا
|
|
وَلَئن
سـعت
كالحيَّـة
الرَقطـا
العَصـى
|
بيــد
لـه
ابيضـت
وَلَـم
يـك
ابرصـا
|
|
فالكـــل
منـــك
معمّمــاً
وَمخصصــا
|
وَكَـذا
الطعـام
لـديك
سـبّح
وَالحصـى
|
|
بيـــديك
أســمعَ
مصــغياً
وَذَهــولا
|
|
لاذ
الأَديــب
بمــدح
مَـولى
قـد
غُـذي
|
بلبــان
آداب
لــه
يَشــكو
البَــذي
|
|
نعــــم
الملاذُ
لمــــادح
متعـــوّذ
|
وأَتـاكَ
جـابر
يَشـتَكي
الـدين
الَّـذي
|
|
لَــم
يَكتَفــوا
بـالتمر
فيـه
مَكيلا
|
|
وَالــدائنون
إن
اِســتَباحوا
رِقهــم
|
لمـــدينهم
كتبــوا
بــذلك
صــَكَّهم
|
|
وَلِـذا
التجـا
يَرجـو
بجاهـك
محقهـم
|
فجلســت
فاكتــالوا
فكمّــل
حقهــم
|
|
وكـــأنهم
لَـــم
ينقصــوه
فَــتيلا
|
|
مــن
جــاده
المَـولى
بوابـل
فيضـه
|
رُزق
الأداء
لنفلـــه
مـــع
فرضـــه
|
|
فإليــك
فضــل
زيــادة
عَــن
قرضـه
|
وَالــزاد
أَشــبعت
المئيــن
ببعضـه
|
|
وَالكـــل
كـــانَ
لجـــائعين
قَليلا
|
|
غُمِــرت
بغيــث
الجـود
منـك
صـحابة
|
وَبفضــلك
اِعــترفت
إليــك
ســحابة
|
|
لــم
لا
تهيــم
بهــم
إليـك
صـَبابة
|
وَالمــاء
روّى
الجيــش
وهـو
صـُبابة
|
|
بيــديك
ثــم
طَغــى
بهــا
ليسـيلا
|
|
للمعجـــزات
وكمّهــا
مــع
كيفهــا
|
حكَــم
تحــار
عقولنــا
فـي
كشـفها
|
|
لا
غــرو
أن
أُعطيــتَ
أَعجــب
صـنفها
|
وأتيــت
عيــن
تبـوك
وهـي
لضـعفها
|
|
لا
تَســتَطيع
مــن
المعيــن
مســيلا
|
|
عيـــن
ولكـــن
لا
تُـــروّي
قاصــِداً
|
قـد
أَمّهـا
لشـفا
الغَليـل
من
الصدى
|
|
فكأنهــا
بالاســم
عيــن
كالصــدى
|
تبــدي
يســيراً
كالصــّبابة
راكِـدا
|
|
وَتُبِــــضّ
مـــاء
كالســـراب
قَليلا
|
|
حَتّـى
الرعـاة
شـكوا
لطـول
رِشـائها
|
وَشــقا
الــدلاء
لشــحّها
بروائهــا
|
|
وَكـــدورة
أعيــت
مريــد
صــفائها
|
فغســلت
وجهــك
وَاليــدين
بمائهـا
|
|
وأعـــدته
فيهـــا
فَعــاد
ســيولا
|
|
لِلَّــــه
أَرض
بِــــالفلاة
ســــحيقة
|
جــدباء
مــن
صـهد
الحَـرور
شـريقة
|
|
بــاتَت
بســيب
يــديك
وَهـيَ
غَريقـة
|
وَغــدت
كَمــا
أخــبرت
وَهـي
حَديقـة
|
|
تحــــوي
مَــــزارع
جمّـــة
وَنَخيلا
|
|
كَــم
قَــد
شــكا
لـك
ضـُرَّة
ذو
علـة
|
فكشـــفته
بـــالمس
أَو
بالتفلـــة
|
|
مــن
ريقـك
التريـاق
شـافي
الغلـة
|
وَكَــذاك
فــي
بئر
الحديبــة
الَّـتي
|
|
أَلفيتهـــا
وَشـــلا
المعيــن
محيلا
|
|
بئر
كبحــر
الشــعر
ذادت
بــالثَرى
|
غُصصــا
فَلَيـسَ
بهـا
إِرتـواء
للـوَرى
|
|
أَو
كالمضـيف
الخُلـو
مـن
زاد
القِرى
|
نزحــت
فَكــاد
قرارهــا
أن
لا
يـرى
|
|
طَـــرف
الرشــاء
بمــائه
مَبلــولا
|
|
وأَبــى
الكَريـم
وأَنـتَ
أَكـبر
مُنقِـذ
|
للجيــــش
إلا
أن
يُغـــاث
بمَنفـــذ
|
|
وَالمــاء
عــزَّ
وقـل
قـوت
المغتـذي
|
فتفلـت
فيهـا
فاِغتـذى
الجيـش
الَّذي
|
|
أَوردتــــه
بنميرهــــا
معلـــولا
|
|
مــا
عــزّ
قـطّ
عليـك
أبعـد
ملتمـس
|
في
الجو
أَو
في
البحر
طار
أَو
انغمس
|
|
حَتّــى
شــفيت
برقيــة
مخبــول
مَـس
|
وأصـاب
صـحبك
فـي
الفلا
ظمأ
فما
اس
|
|
طـــاعوا
هنــاك
لقطــرة
تحصــيلا
|
|
وَغــدت
نفــوس
القـوم
تبغـي
مُعللا
|
لجسـومها
تَخشـى
مـن
العطـش
البِلـى
|
|
وَصــَدى
المجاهـد
شـرّ
أنـواع
البَلا
|
فَبَعثـت
فـي
وادي
كُـدا
امـرأة
عَلـى
|
|
بكـــر
يقـــل
مَزادَهـــا
محمــولا
|
|
كيمـــا
تَعـــود
بقــوة
لجهادهــا
|
بعــد
الكفــاف
بربّهــا
وبزادهــا
|
|
وَالنــار
لا
تــوري
بــدون
زنادهـا
|
فــأتوك
بالمــاء
الَّــذي
بمزادهـا
|
|
فســـقيت
منــه
واِســتقيت
حمــولا
|
|
حَتّــى
شــفيت
أُوام
مـن
منهـم
أغـص
|
وَالمـاء
يَنبـوع
الحَيـاة
كـذاك
نُـص
|
|
ورويــت
كــل
حشــى
بغُلّتــه
مُغِــص
|
وأعــدت
مــا
بمزادهـا
لـم
ينتقِـص
|
|
شــَيئا
وزدت
لهــا
القِــرى
تنفيلا
|
|
كَــم
عقــدة
مـولى
المـوالى
حَلّهـا
|
وَضـــغينة
طــيّ
القلــوب
اســتلها
|
|
وأحـــل
بــاللطف
الــوَلاء
محلّهــا
|
وَصــَلاة
عصــر
لَــم
تجِـد
مـاء
لهـا
|
|
إلا
قَليلا
لا
يبـــــــــــــلّ
غَليلا
|
|
وَرأَيـــت
تركهــم
الصــَلاة
أَهمهــم
|
وأداءَهــا
فـي
الـوقت
ينفـي
همهـم
|
|
وَســلاحها
الماضــي
يشــدد
عزمهــم
|
فوضــعت
كفــك
فــي
الانـاء
فعمهـم
|
|
غـــررا
بفضــل
وضــوئهم
وَحُجــولا
|
|
لَــو
شــئت
تحويـل
الـتراب
بلمسـة
|
تــبراً
لكــان
كَمــا
أَردت
بهمســة
|
|
أَو
رمـــت
تُحــي
كالمَســيح
بمســَّة
|
وَاللَــه
خصــك
فــي
الأنـام
بخمسـة
|
|
لَــم
يُعطهــا
بَشــر
ســواك
رَسـولا
|
|
وَزيــادة
عنهـا
السـيادة
فـي
الأزل
|
وَعَلَيــكَ
أَحكــم
كُتــب
مَولانـا
نـزل
|
|
ومـن
الحقوق
لِذي
الحَماسة
لا
الغَزال
|
حـل
الغَنـائِم
فـي
الجهـاد
وَلَم
تزَل
|
|
للنـــار
يـــوم
تَقـــرّب
مــأكولا
|
|
وَالقُــرب
مــن
ذات
العلا
وَخطابهــا
|
قربـــا
تقــدره
القِســيّ
وَقابهــا
|
|
وَالقبلــة
الغــرا
كــذا
محرابهـا
|
والأرض
أَجمـــع
مســـجد
وَترابهـــا
|
|
طُهُـــر
يبيـــح
الفــرض
وَالتَنفيلا
|
|
وَشــمول
مــن
واليـت
جـوداً
بـالألا
|
وَعِقــاب
مـن
عـاداك
بغيـاً
بـالقِلى
|
|
مــن
بعــد
أن
أَعـددت
داركَ
مـوئِلا
|
وَشـــفاعة
عمَّـــت
وارســـال
إلــى
|
|
كــــل
الـــوَرى
طُـــراً
وَجيلا
جيلا
|
|
قَـد
خـابَ
فـي
الدارَين
من
لَم
يعتقد
|
تَسـليم
مـا
فـي
وصـف
ذاتـك
قد
سُرد
|
|
وَبأنــك
المــولى
بُعِثـت
بـدين
جِـد
|
وَنُصـِرت
بـالرعب
الشـَديد
فمـن
تُـرِد
|
|
تَغـــزوه
بـــات
بــذُعره
مخبــولا
|
|
شـــاهَت
وجــوه
وَالــتراب
لــديهم
|
مثــل
النبــال
وحــق
ذاك
عليهــم
|
|
وَبنصــر
ربــك
فقــت
حقــاً
عنهــم
|
وَبقبضــة
فــي
وجــه
جيــش
منهــم
|
|
أَلقَيتهـــا
فَغَــدا
بهــا
مَغلــولا
|
|
ســحقت
جســوم
مــع
نفــوس
ســوّلت
|
لهـــم
العــداء
لــرب
ذات
كملّــت
|
|
فَلِــذا
المصــاعب
كلهـا
لـك
ذُللـت
|
وَكَــذا
الصــبا
نصـرتك
ثـم
ونكلـت
|
|
مثــل
الــدبور
بمــن
عصـى
تَنكيلا
|
|
أَنــتَ
الَّــذي
طـابَ
الثَـرى
برُفـاته
|
وَبجـــوده
أَثـــرى
جَميــع
عُفــاته
|
|
مــذ
سـدت
خلـق
اللَـه
فـي
عرفـاته
|
يــا
ســيداً
لَـو
رمـت
حصـر
صـفاته
|
|
أَلفيـــت
صــارم
منطقــي
مفلــولا
|
|
كــادَ
اِشــتياقي
للحجــاز
يَهــدُّني
|
وَعَــن
الزيـادة
ذا
الزَمـان
يصـدُّني
|
|
فَعَســى
المَــدائح
للقــاء
تُعــدّني
|
قســما
لَـو
ان
البحـر
كـانُ
يمـدُّني
|
|
لَـــم
أَســـتَطِع
لأقلهـــا
تحصــيلا
|
|
بــي
أَحــدقت
وسـط
العُبـاب
عواصـِف
|
بـــالي
وحـــق
علاك
منهــا
كاســف
|
|
فلعـــل
رَبـــي
لِلشـــَدائد
كاشــِف
|
مــاذا
بــه
يحصــي
صــفاتِك
واصـف
|
|
وَاللَـــه
نـــزّل
ذكرهــا
تَنــزيلا
|
|
حقــــق
إِلاهـــي
للمُعنـــى
ظنّـــه
|
واهــزِم
زَعـانف
فـي
المضـايق
خنّـه
|
|
حيــث
اِحتَمــي
بالمَـدح
يَرجـو
منّـه
|
مــاذا
يَفــوه
بـه
امـرؤ
لـو
أَنـه
|
|
نظــم
النجـوم
مـن
القَريـض
بَـديلا
|
|
نظّــم
يراعــي
مــدح
راجــي
عطفـه
|
مـــا
تَســـتَطيع
لكلــه
أَو
نصــفه
|
|
وَدَع
الَّــذي
يَلهــو
بملعــب
قَصــفِه
|
الأمـــر
أعظــم
أَن
يحــاط
بوصــفه
|
|
مــن
رام
عــدّ
القطـر
كـان
جهـولا
|
|
يــا
ملـة
الإسـلام
يـا
قـومي
سـَلوا
|
فأمـــامكم
بحـــر
خِضـــمّ
مرســـل
|
|
فَعَســـى
ذنـــوبكمُ
بفيـــض
تغســل
|
يـا
مـن
بـه
الرسـل
الكرام
توسلوا
|
|
فَغَـــدا
توســـلهم
بـــه
مَقبــولا
|
|
إِنّــي
بجاهــك
لــي
عليــك
معــوّل
|
ولكــل
حــال
فــي
الوجــود
تحـول
|
|
فَكَــم
التجــا
لــك
بــائِس
متسـول
|
يــا
خــاتم
الرســل
الكِـرام
وأول
|
|
فيهــــم
وآدم
طينــــة
مجبـــولا
|
|
بــالعَجز
جــاء
إلـى
رحابـك
مُرتـد
|
وَبجَـــدِّه
حســـّانِ
مـــدحُك
مُقتـــدِ
|
|
يَزهـــو
بنســـبته
لأكـــرم
محتِــد
|
يــا
ســيد
الكرمــاء
دعـوة
مجتـد
|
|
جــادَ
الزَمــان
لــه
وَكــانَ
بَخيلا
|
|
بفــؤاد
مشــتاق
مـن
البعـد
اتقـد
|
متلــذذ
بالســُهد
يَجفــو
مـن
رقـد
|
|
لَــم
يثنــه
مــن
لام
جهلا
واِنتقــد
|
أَدنـــاه
منــك
ولاؤُهُ
فغــدا
وقــد
|
|
مثلـــت
ضـــراعته
إليــك
مُثــولا
|
|
فليهــنِ
مادحــك
الشــهابَ
وصــوله
|
وَدخـــوله
حرمـــاً
بـــه
مــأموله
|
|
ســـعدت
بـــذاك
فروعــه
وأصــوله
|
قطــع
القفــار
إليـه
لَيـسَ
يهـوله
|
|
طـــي
المفـــاوز
رحلــة
وقفــولا
|
|
فَمَــتى
أرانــي
لِلــديار
مفارِقــا
|
وَلآل
بيـــتي
القاعـــدين
معانقــا
|
|
مثـل
الشـهاب
وَمـذ
حظـى
بـك
وامقا
|
حَــط
الرجــاء
بِبــاب
بـرّك
واثِقـا
|
|
أَن
يَنثَنــــي
بنـــواله
مشـــمولا
|
|
وأتــاك
الانصــاري
بنظــم
عقــوده
|
مبعـــوثه
للبعـــد
طـــي
بريــده
|
|
فبحــق
جــودك
حــلّ
عاطــل
جيــده
|
واجعـــل
اجــازة
قصــده
وَقصــيده
|
|
منــك
القبــول
ليبلــغ
المـأمولا
|
|
يــا
سـعد
عبـد
حـلّ
ناديـك
النـدي
|
بــالروح
والأمــوال
ذاتــك
يفتـدي
|
|
ودعــا
بــأعلى
صــوته
كـن
مسـعدي
|
وأَعِـــذ
بجاهــك
كفّــه
أَن
يغتــدي
|
|
فـــي
عنقـــه
بـــذنوبه
مغلــولا
|
|
لـي
مـن
قـديم
فـي
المديـح
مواقِـف
|
أدّى
لهــا
حســن
الشــهادة
ناصــف
|
|
أدعـــوك
مشــتاقا
وَدَمعــي
واكــف
|
مــا
لــي
سـوى
أَنـي
ببابـك
واقِـف
|
|
صـــــَبّ
أردّد
حســــرة
وعــــويلا
|
|
كَــم
جولــة
بــالحق
يومـا
جُلتهـا
|
لحِمــى
الضـعاف
وَصـولة
قـد
صـُلتها
|
|
راجيـــك
كشـــف
شــدائد
حمّلتُهــا
|
مستنصــر
بــك
مــن
ذنــوب
خِلتهـا
|
|
لَـــولا
نـــداك
تردنـــي
مَخــذولا
|
|
عطفــا
عَلــى
هَــذا
المحـب
وَقَلبـه
|
جــافى
المَضــاجع
للهمــوم
بجنبـه
|
|
وَنــأى
بهــا
عَــن
آلـه
مـع
صـحبه
|
فــاللَه
أعطــى
مــن
أتـاك
لـذنبه
|
|
متشـــفعا
بـــك
رحمـــة
وَقبــولا
|
|
قــد
داهَمتنــي
بالقَضــاء
مســائل
|
دَمعــي
العصــيُّ
لهــا
وَحقـك
سـائل
|
|
وَلحلّهـــا
عـــزَّت
علـــيَّ
وَســـائل
|
يــا
ســيدي
وَوســيلتي
أنـا
سـائل
|
|
وَنــداك
كَـم
أَعطـى
لمثلـي
السـولا
|
|
مــا
لــي
عَلــى
غيـر
الإلـه
معـوّلُ
|
وَلـــبيت
آمـــالي
مــديحك
مَــدخل
|
|
والأمـــر
لِلَّـــه
المُهيمــن
مُوكَــلُ
|
أَأَعــود
دون
النـاس
إذ
أنـا
مثقَـل
|
|
بالـــذَنب
محــروم
الشــقاء
عَليلا
|
|
مـا
فـي
السـؤال
مذلـة
فاِبسـط
يدا
|
مــا
دامَ
مســؤول
الأيــادي
ســيّدا
|
|
يَرتــاح
لا
يَرتـاع
مـن
طلـب
الجـدا
|
حاشــا
لعــزَّة
جاهـك
الجـمّ
النـدا
|
|
إنـــي
أَعــود
كَمــا
أَتيــت
ذَليلا
|
|
كُــن
للشــكاية
يـا
كَريـم
سـميعها
|
لَــولاك
لَـم
أَكُ
فـي
الأنـام
مُـذيعها
|
|
فَمَـــتى
أشــاهد
طيبــة
وَبقيعهــا
|
يــا
لَيــت
أَيّـام
الحَيـاة
جميعهـا
|
|
يمـــددن
أيّـــامي
بطيبــة
طــولا
|
|
لا
خيـــر
فــي
خيــل
وَلا
صــَهواتها
|
إن
لــم
تسـر
بـي
نحوهـا
بقواتهـا
|
|
وَعَســى
المطــيّ
تجـد
بـي
خطواتِهـا
|
لا
ســرّ
طــرف
الطـرف
فـي
عَرَصـاتها
|
|
متعــــــثرا
بــــــدموعه
وأجيلا
|
|
يـا
مـن
سـما
فـوق
السـماك
تقربـا
|
وَحبــاهُ
مَــولاه
بعــرش
مــا
حبــا
|
|
وَبليلــة
الإســراء
أُســمِع
مرحبــا
|
صــَلى
عليــك
اللَـه
مـا
هبـت
صـبا
|
|
وارفَـــضّ
ســـلك
غمامــة
محلــولا
|
|
وَســـقت
عيـــون
بــالفَلا
وَمنــابِع
|
حجـــاج
بيــت
للحَيــاة
تَــدافعوا
|
|
وَشـَكا
الرفيـع
مـن
الدناة
ترافعوا
|
وأَهـــلَّ
بــالإحرام
قــوم
تــابعوا
|
|
فيـــه
هــداك
وأكــثروا
التَهليلا
|
|
وَعليــك
صـَلى
اللَـه
مـا
طفـل
غُـذي
|
أو
لاذ
يَشــكو
كــلَّ
بــاغ
مــن
أذي
|
|
وعليـك
صـلى
اللَـه
مـا
خـزي
البَذي
|
وَعَلــى
أَبــي
بكــر
خَليفتـك
الَّـذي
|
|
كــانَ
الخَليــل
لَــو
اِتخـذت
خَليلا
|
|
صـــديق
أمتـــك
الجليــل
بصــدقه
|
وَصــديقك
الشــيخ
الوقــور
بحقــه
|
|
حــاز
الخلافــة
عنــك
منـك
بسـبقه
|
وَكَــذا
عَلـى
عمـر
الَّـذي
فـي
نطقـه
|
|
قــالَ
الصــواب
ووافــق
التنـزيلا
|
|
مــن
سـار
فيهـا
سـير
شـهم
معتـدل
|
بــالحق
جــاءَ
وَباطِـل
الأعـدا
خُـزل
|
|
مــا
لامــرئ
قــد
عـز
بـاللَه
مُـذل
|
وَعلـى
ابـن
عفـان
الشـهيد
مرتل
ال
|
|
قُـــرآن
فـــي
خلـــواته
تــرتيلا
|
|
كَـم
قـد
أَسـاء
الظـن
فـي
شـيخ
فُتي
|
وَرَمــاه
جهلا
بــالَّتي
ثــم
اللّــتي
|
|
فَقَضـى
ينـادي
خُـذ
بثـاري
يـا
بُنـي
|
وَعَلـى
ابـن
عمـك
هـازم
الأحـزاب
لي
|
|
ث
الغــاب
أقربهــم
لــديك
قَـبيلا
|
|
زوج
الَّــتي
ســادَت
بناتـك
واِقتـدت
|
بكمـــا
وَذكركمـــا
بنســل
خلّــدت
|
|
فَعَلَيـك
صـَلى
اللَـه
مـا
الورقا
شَدَت
|
وَكَـذا
عَلـى
عميـك
وابنـي
مـن
غـدت
|
|
فــي
نســكها
مثـل
البتـول
بتـولا
|
|
وَخديجــة
الكــبرى
وَعائشــة
ســوا
|
وَعمــوم
مــن
بحمـاك
مـن
زوج
ثَـوى
|
|
وَالســيدات
الرافِعــات
بـك
اللـوا
|
وَبقيــة
الصـحب
الكـرام
ومـن
حـوى
|
|
هَــذا
المقــام
ومــن
أجــد
رَحيلا
|
|
والآل
والأنصــار
مــن
منهــم
أَنــا
|
برضــاك
عنــا
سـيدي
نلنـا
المُنـى
|
|
فَعَلـى
النـبي
منـا
السلام
مع
الثنا
|
لا
كــانَ
هَــذا
العهـد
آخـر
عهـدنا
|
|
بــك
بــل
نَـراك
وَربعـك
المـأهولا
|
|
مــن
شـاء
أَن
يـأتي
بأحسـن
فَليَقُـل
|
بعـدي
فهـذا
جهـد
مـا
اِسطاع
المُقل
|
|
وَالسـعد
لـي
إن
كـانَ
مَـدحي
قد
قُبل
|
وأجــابني
للســول
فضــلا
مـن
سـُئل
|
|
إن
الكَريـــم
يحقـــق
المـــأمولا
|
|
حقــق
بفضــلك
يــا
إلاهــي
قصـدنا
|
واحبــط
بحولــك
كــل
مسـعى
ضـدّنا
|
|
حَتّــى
نَــرى
مـن
خـان
بغيـا
ودَّنـا
|
أَو
نقــدنا
مِمَّــن
علا
أو
مــن
دَنـا
|
|
مـــن
غلّـــه
أَو
فقـــره
مَقتــولا
|