|
مــا
لــي
أراك
نحــولا
عُـدت
كـالقَلم
|
وَشــكل
جســمك
حــاكى
أَحــرف
الكلـم
|
|
فَمــا
عَســى
بـك
مـن
كلـم
ومـن
أَلَـم
|
أَمـــن
تـــذكر
جيــران
بــذي
ســَلم
|
|
مزجــت
دَمعــاً
جَــرى
مـن
مقلـة
بـدم
|
|
أَو
ابتُليــتَ
مــن
الــدنيا
بقاصــمة
|
متـــن
الظهـــور
وَللـــذات
هازمــة
|
|
أَو
فكـــرة
لهمــوم
اللَيــل
ناظمــة
|
أَم
هبــت
الريــح
مـن
تلقـاء
كاظمـة
|
|
وَأومـض
الـبرق
فـي
الظلمـاء
مـن
أضِم
|
|
فـإن
تقـل
مُقلتـاي
القلـب
قـد
حَمتـا
|
مــن
الغَـرام
وَمـا
بـي
عـاذلي
شـِمتا
|
|
وَالحـال
مثـل
مَقـالي
الـدهر
قَد
صَمتا
|
فَمــا
لِعَينيـك
إن
قلـت
اكففـا
همتـا
|
|
وَمــا
لِقَلبــك
إن
قلــت
اسـتفِق
يَهـم
|
|
الصــبر
للعشــق
مَهمــا
طـال
مُنهـزم
|
وَفيـــهِ
كــل
حســاب
اللــب
مُنخــرم
|
|
كَــذاك
حبــل
اِســتتار
فيــه
مُنصـَرِم
|
أَيحســـب
الصـــب
أَن
الحــب
منكتــم
|
|
مـــا
بيــن
مُنســجم
منــه
وَمُضــطرم
|
|
فقــل
لمــن
مســّه
شــيء
مـن
الخلـل
|
بحــب
مــن
مـاس
فـي
حلـي
وَفـي
حُلَـل
|
|
وَبــاتَ
ينكــره
ســتراً
إلــى
الزلـل
|
لَـولا
الهَـوى
لَـم
تُـرق
دَمعـاً
عَلى
طلل
|
|
وَلا
أَرِقـــت
لــذكر
البــان
والعلــم
|
|
وَلا
قـــواك
لمـــا
كابـــدته
جهــدت
|
وَالنفـس
فـي
غيـر
مـن
هـامَت
به
زَهدت
|
|
وَالعيـن
مـن
حـر
قَلـب
بـالجوى
سـهدت
|
فَكَيــفَ
تنكــر
حبــاً
بعـد
مـا
شـهِدت
|
|
بــه
عليــك
عــدول
الــدمع
وَالسـقم
|
|
وعــدت
مــن
شــجن
جسـما
كعـود
قنـاً
|
لَــم
يعنــه
أَي
شـان
غيـر
شـان
عنـاً
|
|
وَالســهل
أَصـبحَ
حزنـاً
وَالصـفا
حزنـا
|
وَأَثبــت
الوجــد
خطــى
عــبرة
وضـنى
|
|
مثــل
البهــار
عَلــى
خـديك
وَالعنـم
|
|
يــا
مُلحفــاً
بســؤال
عنــه
شــوّقني
|
لمـــن
يُســـائِلني
عنـــه
ورنقّنـــي
|
|
جهــراً
أجيبـك
حيـث
السـر
لـم
يَقنـي
|
نعــم
ســَرى
طيـف
مـن
أَهـوى
فـأرَّقني
|
|
وَالحـــب
يعـــترض
اللــذات
بــالأَلَم
|
|
وإن
لــي
فـي
احتمـال
الوجـد
مقـدرة
|
أعُــدّها
فــي
ســَبيل
الحــب
مــأثرة
|
|
وأســـأل
اللَـــه
للـــزلات
مغفـــرة
|
يـا
لائمـي
فـي
الهـوى
العـذريّ
مَعذِرة
|
|
منــي
إليــك
وَلَــو
أَنصـفت
لَـم
تلُـم
|
|
واربــأ
بنفســك
لا
تسـأل
عَـن
الخـبر
|
فـإن
فـي
العيـن
مـا
يُغنـي
عـن
الأثر
|
|
وَلَيـــسَ
مثلــي
فــي
بَــدو
وَلا
حَضــر
|
عَـــدَتك
حـــاليَ
لا
ســـرّي
بمســـتتر
|
|
عَــــن
الوشـــاة
وَلا
دائي
بمُنحســـم
|
|
اقصـــِر
فـــإن
فـــؤادي
لا
يروّعـــه
|
شـيء
وَلَـو
كـانَ
فـي
ذا
الحـب
مصـرعه
|
|
وَلا
اِرعــواء
إلــى
مــن
ذاك
منزعُــه
|
محَّضــتني
النصــح
لكــن
لسـت
أَسـمعه
|
|
إن
المحــب
عَــن
العــذال
فــي
صـَمم
|
|
أرِح
فُــؤاد
أَســير
الحــب
مــن
جَـدَل
|
وَمــن
لَجــاج
بســمع
الصــّب
مبتــذل
|
|
وَلا
تــرجّ
اِعتــدالي
مــع
هَــوى
غـزل
|
إنــي
اتهمـت
نصـيح
الشـيب
فـي
عـذل
|
|
وَالشــيب
أَبعـد
فـي
نصـح
عَـن
التّهـم
|
|
وَأَيـــن
منــي
امــرؤ
نفســه
يقِظــت
|
بكلمــة
لهــداها
إِثــرَ
مــا
لُفظــت
|
|
أَو
آيــة
بلســان
الحــق
قــد
وعظـت
|
فــإنّ
أَمــارتي
بالســوء
مـا
اِتعظـت
|
|
مــن
جهلهــا
بنـذير
الشـيب
وَالهِـرَم
|
|
مــاذا
أَقــول
غَــداً
لِلَّــه
معتــذرا
|
إذا
كتــابي
بمــا
لَــم
يُرضـِه
نُشـرا
|
|
وَالنفـس
للخيـر
مـا
أَبقـت
بـه
أَثـرا
|
وَلا
أَعــدّت
مــن
الفعـل
الجَميـلِ
قـرى
|
|
طيـــف
أَلَــم
برأســي
غيــر
محتشــم
|
|
إذا
تصــابى
فــؤاد
المــرء
يعــذره
|
طيــش
الصــبا
وَقَليــل
مــن
يعــزّره
|
|
لكــن
تهتّــك
مثلــي
الشــيبُ
ينكـره
|
لَــو
كنــت
أَعلَــم
أَنّــي
مـا
أوقـره
|
|
كتمــت
ســراً
بـدا
لـي
منـه
بـالكَتَم
|
|
أَشـكو
إِلـى
اللَـه
نَفسـاً
خلـف
رايتها
|
قــد
ســِرت
سـير
أَسـير
نحـو
غايَتهـا
|
|
فطــوَّحت
بــي
إلــى
أَقصــى
عمايتهـا
|
مــن
لــي
يــردّ
جِمـاح
مـن
غَوايتهـا
|
|
كَمــا
يُــرَدّ
جِمــاح
الخيــل
بـاللجُم
|
|
إِن
حكمـــت
رأيهــا
طوعــاً
لقوّتهــا
|
حَتّـــى
تَهيـــأت
الأعضـــا
لنزوتهــا
|
|
وَخانــك
العــزم
إِذعانــاً
لنزعتهــا
|
فَلا
تَــرُم
بالمَعاصــي
كســر
شــهوتها
|
|
إن
الطَعـــام
يقــوي
شــهوة
النهــم
|
|
واعــزم
عَلـى
عـدم
الإصـرار
بعـد
ولا
|
تكــن
ســوى
رجـل
قَـد
مـالَ
واِعتـدلا
|
|
فكـل
مـن
رام
هجـر
الريـم
عنـه
سـَلا
|
وَالنَفـس
كالطفـل
إِن
تُهملـه
شـبّ
عَلـى
|
|
حُـــب
الرضــاع
وإن
تفطمــه
يَنفطــم
|
|
كَــم
منَّــت
القَلــب
خـدعاً
أن
تحليَـه
|
إذا
اِمتَطــى
صــَهوة
الأهــوا
وتـوليَه
|
|
لكــــن
توبتهـــا
شـــاءَت
تخليـــه
|
فاِصــرف
هَواهــا
وَحــاذر
أَن
تــوليه
|
|
إن
الهَــوى
مــا
تَـولى
يُصـم
أَو
يَصـم
|
|
وكـــل
نفـــس
لهـــا
حــال
ملائمــة
|
فَراقِـــب
اللَـــه
لا
تأخـــذك
لائمــة
|
|
وَخــذ
حــذارك
منهــا
وَهــي
صــائمة
|
وَراعهــا
وَهــي
فــي
الأعمـال
سـائمة
|
|
وإن
هــي
اِســتحلت
المرعــى
فَلا
تُسـم
|
|
صــوَّر
فَــديتُك
هــذي
النَفــسَ
خاتِلَـةً
|
للخيـــر
تاركـــة
للشـــر
فاعِلـــة
|
|
فَماشــِها
واخـش
منهـا
الـدهر
غائلـة
|
كَـــم
حســنت
لــذة
للمــرء
قاتلــة
|
|
مـن
حيـث
لَـم
يَـدرِ
أَن
السم
في
الدّسم
|
|
ثـم
اِحتمـل
واحـترس
يـا
صـاح
من
خُدع
|
وَداو
أَدواءهــا
مــن
غيــر
مـا
جـزع
|
|
واســلك
سـَبيل
الهـدى
دَومـاً
بِلا
بـدع
|
واخــش
الدَسـائس
مـن
جـوع
ومـن
شـبع
|
|
فَـــرُبَّ
مخمصـــة
شـــر
مــن
التُخــم
|
|
مــرآة
نفســك
تجلــى
كُلمــا
صــدأت
|
بتوبــــة
فتعهـــدها
إذا
ابتـــدأت
|
|
وداوِهـــا
بِنَقيـــع
الصــبر
إن
ظمئت
|
واِسـتفرغ
الـدمع
مـن
عيـن
قَـد
امتلأت
|
|
مــن
المَحــارِم
وَالـزم
حميـة
النـدم
|
|
لكــن
بمــائدة
الطاعــات
كـن
نَهِمـا
|
واِســبق
سـواك
إلـى
الألـوان
مُلتَهِمـا
|
|
وَقُــم
بعزمـك
فـي
الأسـحار
نحـو
حِمـى
|
وَخــالِف
النفــس
وَالشـيطان
واعصـهما
|
|
وإن
همـــا
محضــاك
النصــح
فــاتّهم
|
|
همــا
عــدواك
مهمــا
كنــت
معتصـما
|
فاحـذر
وَلا
تَـكُ
فـي
الميـدان
منهزِمـا
|
|
فَلا
تعاملهمــــا
بيعـــاً
وَلا
ســـَلما
|
وَلا
تُطِـــع
منهمــا
خصــما
وَلا
حَكمــا
|
|
فــأَنتَ
تعــرف
كيــد
الخصـم
وَالحكـم
|
|
إنــي
ومُ
اللَـه
فيمـا
صـُغت
مـن
جُمَـل
|
كناقـــــة
تــــدَّعي
حملا
بِلا
جَمــــل
|
|
إذ
لَـــم
أضـــحّ
بكبـــش
لا
وَلا
حمــل
|
أَســتَغفِر
اللَــه
مــن
قــول
بِلا
عَمَـل
|
|
لَقَــد
نســبت
بــه
نَســلا
لِـذي
عقـم
|
|
وَقَـــد
عجبــت
لِقَلــبي
مــن
تقلبــه
|
وَهجـــره
نهـــج
هــدي
بــل
تنكبُّــه
|
|
وَلَيـــسَ
يبلـــغ
وانٍ
بـــاب
مطلبــه
|
أَمرتـك
الخيـر
لكـن
مـا
ائتمـرت
بـه
|
|
وَمـا
اِسـتقمت
فَمـا
قَـولي
لـك
اِسـتقم
|
|
وَلا
صـــحبت
لحـــج
الـــبيت
قافلــة
|
وَلَــم
أَزر
روضــة
المختــار
حافلــة
|
|
وَلا
اِعتـــبرت
بــروح
النــاس
آفلــة
|
وَلا
تـــزوّدت
قبـــل
المــوت
نافلــة
|
|
وَلَــم
أُصــلّ
ســوى
فــرض
وَلَــم
أَصـُم
|
|
أُوتيـت
عِلمـاً
وَلَـم
أحسـن
بـه
العملا
|
فَكَيــفَ
أَطمــع
فــي
أَن
أبلــغ
الأملا
|
|
وَالأَمـــر
لِلَّـــه
لا
حـــولٌ
إلــيَّ
وَلا
|
ظلمــت
ســنة
مــن
أَحيـا
الظَلام
إلـى
|
|
إن
اشــتكت
قــدماه
الضــر
مــن
ورم
|
|
مــا
ضــل
يومـا
وَلا
خـانته
قـط
قُـوى
|
فطـراً
وَصـوما
كَـثيراً
مـا
عليـه
نـوى
|
|
وَلَــم
يُـزغ
قَلبـه
المعصـومَ
غـيُّ
هَـوى
|
وشـــدّ
مـــن
ســغّب
أَحشــاءه
وَطــوى
|
|
تحــت
الحجــارة
كشــحا
مُــترف
الأدَم
|
|
وَلَــم
يُــدارِ
قويّــا
ضــل
مــن
رَهَـب
|
فـي
الحـق
مـن
قـومه
حَتّـى
أَبـي
لَهـب
|
|
وَالجـوع
مـا
عـاق
عزمـا
منـه
عَن
أُهَب
|
وَراودتــه
الجبــال
الشــُم
مـن
ذهـب
|
|
عَـــن
نفســه
فأراهــا
أَيمــا
شــَمَم
|
|
وَأوقَفـــت
مـــدّ
عينيـــه
بصـــيرتُه
|
وَزخــرفُ
العَيــش
لَــم
تخـدعه
صـورته
|
|
وَلا
اِســــتمالته
دنيـــاه
غَرورتـــه
|
وأكـــدت
زهـــده
فيهـــا
ضـــرورتُه
|
|
إن
الضــرورة
لا
تعــدو
عَلــى
العِصـَم
|
|
كَــم
قــد
رَمـاه
بمكـروه
لـديه
زمـن
|
وَأحـــدقت
فتــن
مــن
حــوله
ومِحَــن
|
|
فلـم
تملـهُ
إليهـا
فـى
الخطـوب
إِحـن
|
وَكَيـفَ
تَـدعو
إِلـى
الـدنيا
ضـرورةَ
من
|
|
لَـولاه
لَـم
تخـرج
الـدنيا
مـن
العـدم
|
|
ذاكَ
الَّــذي
هُـوَ
مـن
روحـي
أَحَـب
إلـي
|
ومــن
ضــيا
نــاظري
حقـا
أَعـز
عَلـي
|
|
مَــن
شـرَّف
النـاس
تَعميمـا
وخـص
قُـري
|
محمـــد
ســـيد
الكــونين
وَالثقلــي
|
|
نِ
وَالفَريقيــن
مــن
عُــرب
وَمـن
عَجَـم
|
|
مـــا
للأنـــام
ســواه
قــط
مُلتَحــد
|
يــوم
الزحــام
وخلــق
اللَـه
مُحتَشـِد
|
|
ذاكَ
الَّــذي
اهــتز
مرتاحـاً
لـه
أحـدُ
|
نَبينـــا
الآمـــر
النــاهي
فَلا
أَحــد
|
|
أَبـــرّ
فــي
قــول
لا
منــه
وَلا
نَعــم
|
|
كنــز
الثَــراء
لمــن
قلَّــت
بضـاعته
|
مَلجــا
الضــَعيف
إذا
وَلَّــت
جَمــاعته
|
|
عَــروس
يــوم
تُشــيب
الطفــلَ
سـاعته
|
هُــوَ
الحَــبيب
الَّــذي
تُرجـى
شـَفاعته
|
|
لكـــل
هــول
مــن
الأهــوال
مقتَحــم
|
|
قَــد
اِمتَطـى
العـزم
إدراكـا
لمطلبـه
|
فـي
الـدين
لَـم
تثنـه
أَوصـاب
منصـبه
|
|
أنعـــم
بِشـــرعته
أَكـــرم
بمــذهبه
|
دَعــا
إِلــى
اللَـه
فالمستمسـكون
بـه
|
|
مستمســـكون
بحبـــل
غيـــر
مُنفصــِم
|
|
كــأَنه
مــع
كِــرام
الرسـل
فـي
أفُـق
|
لاحـوا
بـدوراً
لِهـدى
الخلـق
فـي
غَسـق
|
|
لكنــــه
وَســـناه
زادَ
عَـــن
فلـــق
|
فــاقَ
النــبيين
فـي
خَلـق
وَفـي
خُلُـق
|
|
وَلَــم
يــدانوه
فــي
علــم
وَلا
كَــرَم
|
|
شــمس
الوجــود
جَميـع
الشـهب
مقتبـس
|
منهــا
الضــياء
كَمِشــكاة
بهـا
قَبَـس
|
|
فنـــورهم
منـــه
كــالمرآة
منعكــس
|
وَكلهــم
مــن
رَســول
اللَــه
ملتمِــس
|
|
غرفـا
مـن
البحـر
أَو
رشـفا
من
الديم
|
|
قــد
أشــربوا
حِكمــا
منــه
بمــدِّهم
|
كــالبَحر
فيــه
ومنــه
كُــلُّ
صــيدهم
|
|
لكنهـــم
دونــه
فــي
نهــج
قصــدهم
|
وَواقفــــون
لـــديه
عنـــد
حـــدهم
|
|
مـن
نقطـة
العلـم
أَو
مـن
شكلة
الحِكم
|
|
لِلَّــــه
تكــــوينه
لِلَّـــه
فِطرتـــه
|
جــاءَت
كَمـا
شـاءَها
المـولى
وقـدرته
|
|
لا
غــرو
أَن
شـرُفت
فـي
النـاس
عِـترته
|
فهــوَ
الَّــذي
تــم
معنــاه
وَصــورته
|
|
ثُــمَّ
اِصــطَفاه
حَبيبــا
بـارئ
النسـم
|
|
جَمـــال
ظــاهره
مــن
نــور
بــاطنه
|
كَبَـــدرِ
تِـــم
تجلــى
مــن
مــواطنه
|
|
أَو
طــالع
اليمـن
يَبـدو
فـي
مَسـاكنه
|
مُنـــزَّه
عَـــن
شــريك
فــي
محاســنه
|
|
فجــوهر
الحســن
فيــه
غيــر
منقسـم
|
|
يــا
أَفصــح
النــاس
فـانيهم
وحيّهـم
|
مــاذا
تَقــول
وَقَــد
بــاؤوا
بعيّهـمِ
|
|
عَــن
دَرك
شــأوِ
مديــح
فــي
ســميّهم
|
دَع
مــا
ادّعتـه
النَصـارى
فـي
نـبيهم
|
|
واحكـم
بِمـا
شـئت
مـدحاً
فيـه
واحتكم
|
|
واصـرف
قـواك
فَمـا
بالصـرف
مـن
سـَرَف
|
فــي
جمـع
أَوصـافه
مـن
روضـة
الطُـرَف
|
|
وَقــف
وقــوف
فَــتى
بــالعجز
معـترف
|
وانسـب
إلـى
ذاتـه
مـا
شـئت
مـن
شرف
|
|
وانسـب
إلـى
قَـدره
مـا
شـئت
مـن
عِظَم
|
|
ســفائن
الشــعر
لــم
تبلـغ
سـواحله
|
إِذ
أبحــر
المـدح
قـد
أَعيـت
فطـاحِله
|
|
وَالمنتهــي
فيــه
لَـم
يَـبرح
أَوائلـه
|
فــإن
فضــل
رَســول
اللَــه
لَيـسَ
لـه
|
|
حـــد
فيُعـــرب
عنـــه
نــاطق
بِفَــم
|
|
فلـذ
بِبـاب
الَّـذي
سـاد
الـوَرى
قـدما
|
عَســاكَ
تثبــت
فــي
أعتــابه
قَــدما
|
|
وَصـُغ
مـن
الـدر
عقـد
المـدح
منتظمـا
|
لَــو
ناســبت
قــدرَه
آيــاتُه
عِظمــا
|
|
أحيـا
اسـمه
حيـن
يُـدعى
دارس
الرّمـم
|
|
وَقــل
لمــن
ســار
شـوطاً
فـي
تجنبـه
|
طوعـــاً
لعامــل
جهــل
مــن
تعصــبه
|
|
وَمُنكـــر
مــا
تبــدّى
مــن
غَرائبــهِ
|
لَـم
يمتحنـا
بِمـا
تعيـا
العقـول
بـه
|
|
حرصــاً
عَلَينـا
فَلَـم
نَرتَـب
وَلَـم
نَهِـم
|
|
وقــل
لمــن
أَمعـن
الأنظـار
وَالفِكـرا
|
فــي
دَرك
كنــه
نــبيّ
للســماء
سـَرى
|
|
وَنـالَ
فـي
العـرش
مـن
مَـولاه
خير
قرى
|
أَعيـا
الـوَرى
فهـم
مَعنـاه
فَلَيـسَ
يُرى
|
|
للقــرب
وَالبعــد
فيــه
غيـر
مُنفحـم
|
|
قـد
ينكـر
النـاس
قـدرَ
المرء
من
حسد
|
أَغشــى
البَصــائرَ
كالأبصـار
مـن
رمـدِ
|
|
فَلا
يَـــرون
لـــه
فضــلا
عَلــى
أَحــد
|
كالشــَمس
تظهــر
للعينيــن
مـن
بُعـد
|
|
صـــَغيرة
وتُكــلّ
الطَــرف
مــن
أمــم
|
|
ضـــل
الألــى
خــالفوا
جهلا
طَريقَتــه
|
كَمــا
اِســتظل
الأُلــى
أَمّـوا
حـديقته
|
|
وَالكــل
لَــم
يَعلمــوا
حقـاً
وَثيقتـه
|
وَكَيــفَ
يــدرك
فــي
الـدنيا
حقيقتـه
|
|
قــوم
نيــام
تســلوا
عنــه
بـالحُلم
|
|
مَهمــا
اشــرأبت
إِلــى
عليـائه
فكـر
|
وَحـــامَ
حـــول
هيــولا
ذاتــه
نظــر
|
|
وَقـالَ
فـي
المـدح
مـن
لـم
يُعيِـه
حصر
|
فمبلـــغ
العلــم
فيــه
أَنــه
بشــرُ
|
|
وأنـــه
خيـــر
خلــق
اللَــه
كلهــم
|
|
شــواهِد
الفضــل
أَعيَــت
عـد
حاسـبها
|
وَذاتــه
قــد
تَنــاهَت
فــي
مَناقبهـا
|
|
فَكَيـــفَ
يحصـــرها
تبيــان
كاتبهــا
|
وكــل
آي
أَتــى
الرسـل
الكِـرام
بهـا
|
|
فإنمـــا
اِتصــلت
مــن
نــوره
بهــم
|
|
إِنَّ
النبـــوة
قــد
ضــاءَتَ
قوالبُهــا
|
بنــوره
قــدر
مـا
اِسـتدعى
تناسـبُها
|
|
مـــن
عهـــد
آدم
حَتّــى
لاحَ
صــاحبُها
|
فـــإنه
شــمس
فضــل
هــم
كواكبُهــا
|
|
يُظهــرن
أَنوارَهـا
للنـاس
فـي
الظلَـم
|
|
طَلــق
المُحيــا
فَمـا
بَـدر
ومـا
فَلَـق
|
حلـــوُ
الشـــَمائِل
لا
نــزق
وَلا
مَلَــق
|
|
طـــابَت
عَناصــرُه
مَــع
أَنَّهــا
عَلَــق
|
أَكـــرِم
بخَلـــق
نــبيّ
زانــه
خُلــق
|
|
بالحســـن
مشـــتمل
بالبِشــر
متســِم
|
|
مـا
اِمتـازَت
النـاس
إلا
فـي
صـفا
نطف
|
عَــن
الشــوائب
مــن
نقـص
ومـن
سـَخف
|
|
لِــذاكَ
كــانَ
بِمــا
أوليـه
مـن
تحـف
|
كــالزَهر
فـي
تَـرَف
وَالبـدر
فـي
شـرف
|
|
وَالبحــر
فـي
كـرم
وَالـدهر
فـي
همـم
|
|
عَــذب
الفُكاهَــة
مــرّ
فــي
بســالته
|
عَلـــى
عتــلّ
تَمــادى
فــي
جَهــالته
|
|
يُهـــاب
هيبــة
ســيف
فــي
حِمــالته
|
كـــأنه
وهـــو
فَـــرد
مـــن
جلالــه
|
|
فــي
عســكر
حيــن
تَلقـاه
وَفـي
حَشـم
|
|
لا
تعجبــــنَّ
لصــــب
مغـــرم
دَنِـــف
|
بحــب
مــدح
رَســول
اللَــه
ذي
شــغف
|
|
مــن
زهــر
روض
رَبيـع
الحسـن
مقتطـف
|
كأَنَّمــا
اللؤلــؤ
المَكنـون
فـي
صـَدَف
|
|
مــن
مَعــدنى
منطــق
منــه
وَمُبتَســم
|
|
وَصـــفوة
القــول
أَنَّ
اللَــه
أكرمــه
|
وَمجمــع
الرســل
فــي
الإسـراء
قـدّمه
|
|
وباصـــطفاه
حَـــبيب
الــذات
عظّمــه
|
لا
طيــبَ
يعــدُل
تُربــاً
ضــم
أَعظمــه
|
|
طـــوبى
لمنتشـــق
منـــه
وَملـــتئم
|
|
مُـــذ
آن
للكـــون
تَشــريف
بمظهَــره
|
وَحــــانَ
للأفـــق
إِشـــراق
بنيّـــره
|
|
وحــنَّ
ملــك
الــوَرى
شــوقاً
لقيصـَره
|
أَبـــانَ
مولــدُه
عَــن
طيــب
عنصــُره
|
|
يـــا
طيــب
مبتــدأ
منــه
ومختتَــم
|
|
يـــوم
بـــه
آلــه
الأمجــاد
ســرّهم
|
أن
قــد
تبــدى
لعيــن
الخلـق
سـِرّهُم
|
|
يــــوم
تحقـــق
للعربـــان
ظنهـــمُ
|
يـــوم
تفــرس
فيــه
الفُــرس
أَنّهــم
|
|
قــد
انـذروا
بحلـول
البـؤس
وَالنقـم
|
|
لَــم
يبــق
بعـد
ضـياء
الحـق
منخـدع
|
بمــا
يروجــه
فــي
النــاس
مبتــدِع
|
|
وَقَــد
أَحــسَّ
بنســخ
الشــرك
مرتــدع
|
وَبــاتَ
إِيــوان
كســرى
وهــو
منصـدع
|
|
كشــمل
أَصــحاب
كِســرى
غيــر
ملـتئم
|
|
مــا
شــأن
شــرفاته
تنحـط
عَـن
شـرف
|
وَشــأنه
حينمــا
قــد
كــفَّ
عَـن
صـَلَف
|
|
فَهَــل
أحــسّ
بـذا
مـا
فيـه
مـن
غُـرَف
|
وَالنــار
خامِــدة
الأنفــاس
مـن
أَسـف
|
|
عليـه
وَالنهـر
سـاهي
العيـن
مـن
سَدم
|
|
وَهَـــل
حـــديقته
جفـــت
خُضـــيرتها
|
أَم
يـا
تُـرى
كَيـفَ
مـا
كـانته
سيرتُها
|
|
بــالطبع
غــادرت
الغــدران
ميرتهـا
|
وَســـاءَ
ســارة
أَن
غاضــت
بُحيرتهــا
|
|
ورُدَّ
وارِدُهـــا
بــالغَيظ
حيــنَ
ظِمــي
|
|
فَربمـــا
صـــحت
الأجســـام
بالعِلَــل
|
وحــوَّل
اللَــه
بحــراً
مَصــَّة
الوَشــَل
|
|
وَفـي
التحاويـل
مـا
يغنـي
عـن
المثل
|
كــأنَّ
بالنـار
مـا
بالمـاء
مـن
بلـل
|
|
حزنـاً
وَبالمـاء
مـا
بالنـار
مـن
ضرم
|
|
مــا
مِثــل
آمنـة
فـي
النـاس
واضـِعة
|
وَلا
ســـواها
لشــأن
الكــون
رافعــة
|
|
فــي
لَيلــة
شمســها
بالسـعد
طالعـة
|
وَالجـــن
تهتـــف
والأنــوار
ســاطعة
|
|
وَالحــق
يظهــر
مـن
مَعنـى
ومـن
كلـم
|
|
وافـى
الوجـودَ
وجهـل
النـاس
عـمَّ
وَطَم
|
وَغايـة
الهـدى
أَن
يجثـوا
أمـام
صـَنَم
|
|
لِــذا
وَقَــد
لاحَ
نـور
مثـل
نـار
عَلَـم
|
عمــوا
وَصــموا
فـاعلان
البَشـائر
لـم
|
|
تُســمع
وَبارقــة
الأنــذار
لــم
تُشـَم
|
|
فَلا
وَرَبـــك
مـــا
اِمتنَّــت
محاســنهم
|
مــن
ذا
وَلا
رضــيت
عنهــم
أَمــاكنهم
|
|
وَلَـــم
يُقـــم
حــولهم
إلا
مُــداهنهم
|
مـن
بعـد
مـا
أخـبر
الأقـوام
كـاهنهم
|
|
بـــأنَّ
دينهــم
المعــوجَّ
لَــم
يقــم
|
|
وإِثــر
مــا
حــفّ
بـالميلاد
مِـن
عَجـب
|
أَمـــاط
عنهــم
بحــق
كــل
ذي
حُجُــب
|
|
وَزادَ
فــي
نَشــب
بــالجود
مــن
سـحب
|
وَبعـدما
عـايَنوا
فـي
الأفـق
مـن
شـهب
|
|
منقضــة
وفـق
مـا
فـي
الأرض
مـن
صـنم
|
|
تعجــب
الجــن
إذ
لَــم
يَـروِ
ذا
قِـدَم
|
شــُهب
رأوهــا
بمـن
فـي
الأرض
تصـطدم
|
|
فَهـــالهم
أَن
مـــن
تمسســه
منهــدم
|
حَتّــى
غَـدا
عَـن
طَريـق
الـوحي
منهـزم
|
|
مــن
الشــياطين
يَقفـوا
إِثـر
منهـزم
|
|
وَلـــى
الجَميـــع
بأَشـــباح
مشــوَّهة
|
مِمّــــا
دَهــــاهم
وَأَرواح
مُولهــــة
|
|
بحالـــة
لفـــراش
النـــار
مُشــبهة
|
كـــأنهم
هربـــاً
أَبطـــال
أَبرَهـــة
|
|
أَو
عســكر
بالحصـى
مـن
راحـتيه
رُمـي
|
|
حــدّث
عَــن
البحـر
تَقريبـاً
لشـأنهما
|
فــإنه
يحكــى
جــوداً
بعــض
منهمــا
|
|
والرمـــى
لِلَّـــه
تَحقيقــاً
لظنهمــا
|
نبــذاً
بــه
بعــد
تَســبيح
ببطنهمـا
|
|
نبــذ
المســبّح
مــن
أَحشــاء
مُلتقِـم
|
|
قـــامَت
لبعثتـــه
الآيـــات
شــاهدة
|
بـــالرغم
عَـــن
فئة
ظَلَّــت
معانــدة
|
|
وَبينَمـــا
أَبَـــت
الإذعـــان
جامــدة
|
جـــاءَت
لـــدعوته
الأشــجار
ســاجدة
|
|
تمشــي
إليــه
عَلــى
ســاق
بلا
قــدم
|
|
ماســت
بهيــف
قــدود
حينمــا
طربـت
|
بأنهـــا
ســـعدت
منــه
إذ
اِقــتربت
|
|
وَفــوقَ
ذلــك
مــا
مـادت
وَلا
اِضـطربت
|
كأنمــا
ســطرت
ســطراً
لمــا
كتبــت
|
|
فروعهــا
مــن
بَــديع
الخـط
بـاللقَم
|
|
أَنعـــم
بهــا
حينمــا
أمتــه
زائرة
|
وَللمنـــابت
عـــادت
بعـــدُ
طــائرة
|
|
لَــم
تعــدُ
قــط
لخــط
السـير
دائرة
|
مثــل
الغمامــة
أَنــى
ســار
سـائرة
|
|
تَقيـــه
حــر
وَطيــس
للهجيــر
حمــي
|
|
أكــرم
بفطــرة
مــن
لَـو
شـاء
بـدَّله
|
بــالترب
تــبراً
فَمـا
أَعلـى
تَنـازله
|
|
فصــفه
مــا
شــئت
لا
تحصــي
شـَمائله
|
أَقســـمت
بــالقمر
المنشــق
ان
لــه
|
|
مــن
قَلبــه
نســبةً
مَــبرورة
القَسـَمِ
|
|
فــإنه
البــدر
إذ
أســري
إِلـى
حـرم
|
وَطيبــة
قــد
زهــت
تيهــاً
عَلـى
إِرم
|
|
فـــأين
مــدح
زُهيــر
فــي
عُلا
هــرم
|
وَمـا
حـوى
الغـار
مـن
خيـر
ومـن
كرم
|
|
وكــل
طــرف
مــن
الكفـار
عنـه
عمـي
|
|
إنَّ
الكَريــم
لــه
مــن
جنســه
كرمـا
|
يصــفونه
الـود
مهمـا
ضـاقَ
أَو
حُرمـا
|
|
وَالعهــد
بينهــم
لا
يُلفــى
منصــرما
|
فالصـدق
فـي
الغـار
وَالصديق
لَم
يرما
|
|
وَهــم
يَقولــون
مـا
بالغـار
مـن
أرم
|
|
وَفــي
كَــثير
يخـون
النـاس
عهـد
وَلا
|
وَلا
يُراعــــــون
إِلا
لِلقَريـــــب
وَلا
|
|
حَتّــى
إلـى
القَتـل
لكـن
للخطـوب
جلا
|
ظنـوا
الحمـال
وظنـوا
العنكبـوت
عَلى
|
|
خَيــر
البَريَّــة
لَـم
تَنسـج
وَلَـم
تحُـم
|
|
وَيــل
لمــن
شــذ
منهـم
عَـن
محالفـة
|
وَنــاهضَ
الحــق
حبــاً
فــي
مخالفــة
|
|
فَلَـــم
يضـــِره
بكيـــد
أَو
مقارَفــة
|
وقايــة
اللَــه
أَغنَــت
عــن
مضـاعفة
|
|
مــن
الــدروع
وَعَــن
عـال
مـن
الأطُـم
|
|
وَأَســعدُ
النــاس
حظــاً
فــي
تحبُّبــه
|
مــن
فــازَ
منهــم
بقسـط
مـن
تقربـه
|
|
وكـــانَ
مــن
حزبــه
حقــاً
ومــذهبه
|
مـا
سـامني
الـدَهرُ
ضـَيما
واِستجرت
به
|
|
إلا
ونلــت
جــواراً
منــه
لَــم
يُضــَم
|
|
وَمـــا
تجـــاوزَ
حــداً
فــي
تمــرّده
|
شــَيطانَ
بَغــي
طَغـى
فـي
سـوء
مقصـده
|
|
إلا
اِنتصــرت
بمــولى
الكــون
ســيده
|
وَلا
التمســت
غنـى
الـدارين
مـن
يـده
|
|
إلا
اســتلمت
النـدى
مـن
خيـر
مسـتَلم
|
|
جــل
الَّــذي
ببَــديع
الحســن
جمَّلــه
|
وَبالمَحاســـــــِن
والأخلاق
كمَّلَــــــهُ
|
|
وَكَيـــفَ
مـــا
شــاءَ
ســَوّاه
وعــدَّله
|
لا
ننكــر
الــوحي
مـن
رؤيـاه
إن
لـه
|
|
قَلبــاً
إذا
نـامَت
العَينـان
لَـم
يَنَـم
|
|
فــاقَ
الألــى
قــاربوه
فــي
فُتــوّته
|
إِذ
كــانَ
يُعطــى
لكــل
حســن
قُـدوته
|
|
فَهــــاك
ديـــدنه
إِيّـــان
نشـــأته
|
وَذاكَ
حيـــن
بلـــوغ
مـــن
نبـــوَّته
|
|
فَلَيـــسَ
يُنكَــر
فيــه
حــالُ
مُحتلــم
|
|
وَكَـــم
تشـــبه
بالمختــار
ذو
نَســب
|
مــن
غيــرة
فـي
فـؤاد
غيـر
ذي
حسـب
|
|
فعزهــم
دَرك
مــا
قـد
نـال
مـن
كَثَـب
|
تَبــارَك
اللَــه
مــا
وحــيٌ
بمكتســب
|
|
وَلا
نــــبي
عَلــــى
غيـــب
بمتهـــم
|
|
إن
ضــقت
ذرعــاً
بمـا
تَخشـى
فـداحته
|
ففرجــة
الخطــب
مهمـا
اشـتدَّ
سـاحته
|
|
وَهــوَ
الَّــذي
تُرتجــى
دَومـاً
سـماحتُه
|
كَــم
أبــرأت
وصــِباً
بـاللمس
راحتـه
|
|
وأطلقــت
أَرِبــاً
مــن
ربقــة
اللعـم
|
|
زادَت
حَليمَـــة
مـــن
يمـــن
بنــوَّتُه
|
ســـعداً
وأَبناءَهـــا
أَيضــاً
أخــوَّته
|
|
واعـــتز
كــل
فَــتى
ضــمته
عزوتُــه
|
وَأَحيـــت
الســنةَ
الشــَهباء
دعــوتُه
|
|
حَتّــى
حَكَــت
غـرة
فـي
الأعصـر
الـدهم
|
|
فَعـــادَ
غافِــل
هــذي
الأرض
منتبهــا
|
بِمــا
تَجــدَّد
مــن
إِحيــا
جوانبهــا
|
|
وَحــار
للخصــب
جــدا
كــلّ
مجــدبها
|
بعــارض
جــادَ
أَو
خلـت
البطـاح
بهـا
|
|
ســَيبٌ
مـن
اليـمّ
أَو
سـَيل
مـن
العـرم
|
|
يــا
عـاذِلي
لا
تَلـم
عَينـي
إذا
سـَهِرَت
|
تســرّح
اللحــظ
فـي
روض
بـه
انبهـرت
|
|
وَتلــك
سـيرته
الغـرَّا
الَّـتي
اِشـتهرت
|
دَعنـــي
وَوَصــفي
آيــاتٍ
لــه
ظهــرَت
|
|
ظهــور
نــار
القــري
لَيلا
عَلـى
عَلـم
|
|
وَلا
تصــــمني
بشـــعر
كلُّـــه
حِكـــم
|
فَقَـــد
تفـــاوتَت
الألبــاب
والكلــمِ
|
|
كالمـــاء
يَركــدُ
أَحيانــاً
وَينســجم
|
فالــدر
يــزدان
حســناً
وهـو
منتظـم
|
|
وَلَيــسَ
يَنقــص
قَــدراً
غَيــرَ
منتظــم
|
|
قَــد
صــُغتُ
مـدحي
لعلّـي
أَبلـغ
الأملا
|
وإننــــي
كلمــــا
كـــررت
ذاك
حَلا
|
|
لكــن
مـداه
لمـن
يَبغـي
اِنتهـاه
عَلا
|
فَمــا
تطــاولُ
آمــال
المَديــحِ
إلـى
|
|
مــا
فيــه
مــن
كـرم
الأخلاق
وَالشـيَم
|
|
مـــاذا
تُحيــط
بــه
وَصــفاً
مخمّســة
|
أَو
تَحتَـــويه
وَلَـــو
فــاقَت
مسدَّســة
|
|
وَهــوَ
الَّــذي
فيــه
جاءَتنــا
مقدسـة
|
آيـــات
حــق
مــن
الرحمــن
محدثــة
|
|
قَديمـــة
صـــفة
المَوصــوف
بالقِــدَم
|
|
بهـــا
أَرادَ
إلــه
الخلــق
فاطرُنــا
|
أَن
يهتَــدي
لســواء
القصــد
سـائرُنا
|
|
ســـيان
أَوَّلُنـــا
فيهـــا
وآخرُنـــا
|
لَــم
تقــترن
بزَمــان
وهــي
تخبرنـا
|
|
عَــن
المَعــاد
وَعــن
عــاد
وَعَـن
إِرَمِ
|
|
يعيـا
البَليـغ
وَلَـو
عَـن
شـرح
مـوجزَة
|
منهـــا
وَيرجـــع
مَوســوماً
بمعجــزة
|
|
فَيــــا
لقَــــومي
لآيـــات
معجّـــزةٍ
|
دامَــت
لــدينا
فَفــاقَت
كــل
مُعجـزة
|
|
مــن
النــبيين
إذ
جــاءَت
وَلَـم
تَـدُم
|
|
لا
عـــذر
قـــط
لمرتـــاب
وَمُشـــتَبه
|
وَقَـــد
تجلـــت
مَعانيهـــا
لمنتبــه
|
|
لانهـــا
وَلَـــو
أن
اللفــظ
ذو
شــَبَه
|
محكّمـــات
فَمــا
يُبقيــن
مــن
شــبه
|
|
لــذي
شــقاق
وَمــا
يَبغيـن
مـن
حِكـم
|
|
كَــم
مِـن
زَنيـم
مـن
الأعجـام
أَو
عـرب
|
أَرادَ
تجريحهــا
مــن
غيــر
مــا
أَرب
|
|
وَفـــاته
أَنَّهـــا
وَالوغــد
ذو
هــرب
|
مــا
حــوربت
قــط
إلا
عـاد
مـن
حَـرب
|
|
أَعــدى
الأعـادي
إليهـا
مُلقـي
السـلَم
|
|
فَقُـــل
لنـــاثر
أَلفـــاظ
وَقارِضــها
|
مَهلا
فبحركمـــا
مــن
ســَيل
عارضــها
|
|
فإنهـــا
إن
تقـــس
بكــر
بفارضــها
|
ردت
بَلاغتهــــا
دَعــــوى
معارِضـــها
|
|
رد
الغَيــور
يـد
الجـاني
عَـن
الحَـرَم
|
|
مــا
قــورنت
بمقــال
قــط
فـي
صـدَد
|
إلا
تَبَـــدَّت
كمــاء
وهــو
مــن
زبــد
|
|
وَالفضــل
للـروح
فـي
قـول
وَفـي
جسـد
|
لَهــا
معــان
كَمَـوج
البحـر
فـي
مَـدَد
|
|
وَفَــوقَ
جــوهره
فــي
الحسـن
وَالقِيَـم
|
|
قَــد
أَعجــزت
كــل
منطيــق
قوالبهـا
|
بِمــا
تَحَلَّــت
بــه
عفــواً
غَرائبهــا
|
|
فَليَخــشَ
شــانِئُها
وَليخســا
عائبهــا
|
فَمـــا
تعـــد
وَلا
تُحصـــى
عَجائبهــا
|
|
وَلا
تُســـام
علــى
الإكثــار
بالســأم
|
|
إن
شــاء
مَــولاي
ســعد
العبـد
حمّلـه
|
منهــا
كَــثيراً
فَمــا
أَســمى
تحمّلـه
|
|
واِختارَهـــا
ورده
الصــافي
ومنهلــهُ
|
قــرَّت
بهــا
عَيـنُ
قاريهـا
فَقُلـتُ
لـه
|
|
لَقَــد
ظفِــرتَ
بحبــلِ
اللَــه
فاِعتصـم
|
|
أَبشــر
أخــيَّ
إذا
مــا
عشـتَ
محتفظـا
|
بمـــا
قــويتَ
لــه
حفظــا
وَمتعظــا
|
|
وَكــانَ
قَلبُــك
فــي
تَكريرهــا
يقظـا
|
إِن
تتلهــا
خيفـة
مـن
حـر
نـار
لظـى
|
|
أَطفــأت
حـرَّ
لظـى
مـن
وَردِهـا
الشـبم
|
|
فــازَ
الَّــذي
قـد
رآهـا
خلـو
مشـربه
|
إن
بــاتَ
محمــومَ
قَلــبٍ
مــن
تلهبـه
|
|
فَكَــم
جلــت
عَــن
فــؤاد
هـمّ
غَيهبـهِ
|
كَأَنَّهــا
الحــوض
تَــبيض
الوجـوهُ
بـه
|
|
مــن
العصــاة
وَقَــد
جـاؤوه
كـالحُمَمِ
|
|
وَكَيـــفَ
لا
نفضـــُلُ
الأقــوال
منزلــة
|
وَقَـــد
أَتَتنـــا
بمقـــدار
مُنزَّلـــة
|
|
كَفيصــلٍ
فــي
القضـا
كـم
فـض
مشـكلة
|
وَكالصــــراط
وَكـــالميزان
معدلـــة
|
|
فالقسـط
مـن
غيرهـا
في
الناس
لَم
يقم
|
|
لا
بَــل
هــي
الــراح
للأرواح
تسـكرُها
|
إن
قـــامَ
صـــيتُ
قـــراء
يكررُهـــا
|
|
وَكُلمـــا
تليـــت
يَحلـــو
مكرّرُهـــا
|
لا
تعجبـــن
لحســـود
قــامَ
ينكرُهــا
|
|
تجــاهلاً
وَهــوَ
عَيــنُ
الحـاذق
الفهـم
|
|
تبــت
يَــدا
حاســِد
للنــاس
ذي
كَمـد
|
يَبغــي
عَلــى
رافـع
الزّرقـا
بِلا
عَمَـد
|
|
أَيَجهَـــلُ
الغـــرّ
أَنَّ
الأمــر
للصــّمدِ
|
قـد
تنكـرُ
العَيـنُ
ضـوء
الشمس
من
رَمد
|
|
وَينكــر
الفـم
طعـم
المـاء
مـن
سـقَم
|
|
بُشـــرى
لمــادحه
المبــدي
فَصــاحته
|
بمـــا
يُناســب
فــي
قــدر
رَجــاحَته
|
|
كَـــذاك
مـــن
لنــداه
مــدّ
راحتــه
|
يــا
خيـر
مـن
يمَّـم
العـافون
سـاحته
|
|
ســعيا
وَفــوق
مُتــون
الأينـق
الرسـم
|
|
مَــولاي
مــن
جــاء
للأكــوان
بـالعبر
|
فتــم
مبتــدأ
منهــا
بــذا
الخــبر
|
|
منــوّر
الخلــق
حَتّــى
ســاكن
الـوبر
|
ومــن
هــو
الآيــة
الكــبرى
لمعتـبر
|
|
وَمــن
هُــوَ
النعمـة
العظمـى
لمغتنـم
|
|
وَحيـنَ
أَنشـاكَ
بـاري
الخلـق
مـن
عـدم
|
أســمى
البَريَّــة
فـي
مجـد
وَفـي
كـرم
|
|
حَتّــى
الكَليــم
وَمــا
أَولاه
مـن
كلـم
|
ســـَريت
مــن
حــرم
لَيلا
إلــى
حــرم
|
|
كَمـا
سـَرى
البـدر
فـي
داج
مـن
الظلَم
|
|
مــا
جــزتَ
فـي
ذلـك
الإسـراء
مرحلـة
|
إلا
تســـــابقت
الأنحــــا
مؤهِلــــة
|
|
كـــذا
مَعالمهـــا
اهتَـــزَّت
مُهلّلــة
|
وَبِــتَّ
تَرقــى
إلــى
أَن
نِلــتَ
منزِلَـة
|
|
مـن
قـاب
قَوسـين
لَـم
تـدرك
وَلَـم
تُرَم
|
|
مكانَـــة
جـــدّ
كـــل
فــي
تطلّبهــا
|
مــن
النَــبيين
حبــا
فــي
تقربهــا
|
|
فخصـــك
اللَـــه
تَفضـــيلا
بمنصــبها
|
وَقـــدمتك
جَميـــع
الأنبيـــاء
بهــا
|
|
وَالرســل
تقــديم
مخــدوم
عَلـى
خَـدم
|
|
زيــدوا
ســموّ
مقــام
فــي
مراتِبهـم
|
وَبُلغــوا
فيــك
أســمى
مـن
مراتبهـم
|
|
مــذ
ســرت
سـير
أَميـر
فـي
كتـائبهم
|
وَأَنــتَ
تخــترق
السـبع
الطِبـاق
بِهِـم
|
|
فــي
مــوكب
كنـت
فيـه
صـاحب
العلـم
|
|
وَلا
اخــتراق
ســراج
الكـون
فـي
أُفـق
|
يَجتــاز
مــن
طبــق
عــال
إلـى
طبـق
|
|
وَالشــهب
فـي
إِثـره
تسـري
عَلـى
نسـق
|
حَتّــى
إذا
لــم
تَــدَع
شـأواً
لِمُسـتَبِق
|
|
مـــن
الـــدنو
وَلا
مرقـــى
لمســتنِم
|
|
وَفــي
حظيــرة
قـدس
اللَـه
حَيـثُ
نُبِـذ
|
عَنهـا
الحِجـاب
كَمـا
بالصـدق
عنك
أُخِذ
|
|
ومنــذ
أوحـى
بمـا
أُوحـي
إليـك
وَمُـذ
|
خفّضـــت
كـــل
مقـــام
بالإضــافة
إِذ
|
|
نـوديت
بـالرفع
مثـل
المفـرد
العَلـم
|
|
أولاكَ
مَـــولاك
فيهـــا
عــزم
مقتــدر
|
وَروح
تَقويــة
فــي
الســمع
وَالبصــر
|
|
وَبــتَّ
ضــَيفا
قِــراه
حُظــوة
النظــر
|
كيمـــا
تَفـــوز
بوصـــل
أَيّ
مُســتَترِ
|
|
عَـــن
العيـــون
وَســـر
أَيَّ
مُكتتـــم
|
|
ما
البدر
ما
الشمس
بل
ما
دارة
الفلك
|
فــي
جنــب
مقصـورة
حَتّـى
عَـن
الملـك
|
|
فيهــا
تقــدمت
عَــن
جبريــل
للملـك
|
فخـــرت
كـــل
فخــار
غيــر
مشــترك
|
|
وَجـــزت
كـــل
مقــام
غيــر
مزدحــم
|
|
أنعـم
بمـا
نلـت
مـن
مجـد
ومـن
حسـب
|
وَقَــد
رأَيــت
إلــه
العـرش
عَـن
كَثَـب
|
|
وَصــين
قَلبُــك
مــن
مَيــن
ومـن
رهـب
|
وَجــل
مقــدار
مــا
وُليــت
مـن
رُتَـب
|
|
وَعــزَّ
إِدراك
مــا
أوليــت
مــن
نعـم
|
|
مَــن
ذا
يسـامي
حَـبيب
اللَـه
مأملنـا
|
مِــنَ
النــبيين
ســرّا
كـانَ
أَو
عَلَنـا
|
|
روحَ
الوجــود
ومـولى
الخلـق
موئلنـا
|
بشــرى
لَنــا
معشــر
الإسـلام
إنّ
لنـا
|
|
مــن
العنايــة
ركنــا
غيــر
منهـدم
|
|
أَو
مَــن
يُضــاهيه
قَلبـاً
فـي
ضـَراعَته
|
وَمــن
يحــاكيه
قَــولا
فــي
بَراعتــه
|
|
لا
فخـــر
إلا
بأنـــا
مـــن
جمــاعته
|
لمــا
دَعــا
اللَــه
داعينـا
لطـاعته
|
|
بــأكرم
الرســل
كنّــا
أَكــرم
الأمـم
|
|
بقــدر
مــا
شــرفت
أَعضــاء
أســرَته
|
وَعطــر
الكــون
طيبــاً
نفــحُ
سـيرته
|
|
وَتَــــمَّ
أَمـــنٌ
بإيمـــان
لشـــيعته
|
راعَــت
قُلــوبَ
العـدا
أَنبـاءُ
بعثتـه
|
|
كَنبـــأة
أَجفلـــت
غُفلا
مــن
الغنــم
|
|
كَــم
مِــن
حَبــائل
مـدوها
ومـن
شـَبك
|
كَيــداً
لإيقــاعه
فــي
هُــوَّة
الشــرَك
|
|
وَهَــل
يُصــادُ
كمــيّ
فــي
ذُرى
الحُبـك
|
مــا
زالَ
يَلقــاهُم
فــي
كــل
معـترَك
|
|
حَتّـى
حَكَـوا
بالقَنـا
لَحمـاً
عَلـى
وَضـَم
|
|
وَعنـــدَما
ضـــلَّ
كــلّ
وجــه
مــذهبه
|
وفُـــلّ
جيـــش
تَنــاهى
فــي
تــألّبه
|
|
وَجــاءَه
النصــر
ينــبي
عَــن
تغلبـه
|
ودّوا
الفــرار
فَكــادوا
يَغبطـون
بـه
|
|
أَشــلاء
شــالَت
مَـع
العِقبـان
وَالرخـم
|
|
شـــدت
مَلائكـــة
الرَحمَـــن
عُـــدتَّها
|
تَرمـــي
العــدو
بحــرب
ذاق
شــدتها
|
|
لِــذا
وَقَــد
ســَئِموا
حَربــاً
وَمُـدتها
|
تَمضــي
الليــالي
وَلا
يــدرون
عـدَّتها
|
|
مـا
لَـم
تَكُـن
مِـن
لَيالي
الأشهر
الحُرُم
|
|
مــا
ضــَرَّ
لَـو
بسـطوا
للحـق
راحتهـم
|
معاهـــدين
الَّــذي
يَرجــو
هــدايتهم
|
|
لا
غــرو
أن
فقــدوا
بالجهـل
راحتهـم
|
كأنمــا
الــدين
ضــيف
حــلَّ
سـاحتهم
|
|
بكــل
قَــرم
إِلــى
لحـم
العـدا
قـرم
|
|
ســــَليل
غـــرّ
ميـــامين
جحاجحـــة
|
يرجــى
لـدى
السـلم
فـي
لأواء
جائحـة
|
|
وَذي
شـــكائِم
عنــد
الحــرب
حامحــة
|
يجـــر
بحـــر
خَميــس
فــوق
ســابحة
|
|
يرمــى
بمــوج
مــن
الأبطــال
ملتَطِـم
|
|
عَــفَّ
الــرداء
غنــيّ
النَفــس
مكتَسـِب
|
حمـــد
الــوَرى
ولآل
النُبــل
منتســِب
|
|
ماضـــي
العَزيمَـــة
طلاع
رُبــى
حســب
|
مـــن
كـــل
منتـــدِب
لِلَّــه
محتســِب
|
|
يَســـطو
بمستأصـــل
للكفــر
مصــطلِم
|
|
قَضــى
تَــوافقهم
فــي
حلــو
مشـربهم
|
عليهـــمُ
باتحـــاد
فـــي
تحزّبهـــم
|
|
مُستَمســـكين
بحبـــل
مـــن
تغلّبهــم
|
حَتّــى
غَــدَت
ملــة
الإسـلام
وهـي
بهـم
|
|
مــن
بعــد
غربتهــا
موصـولة
الرّحـم
|
|
تَـــتيه
مثــل
فَتــاة
بــاِعتلا
نَســَبٍ
|
لكــــل
ذي
أَدَب
ســــام
وَذي
نَشــــب
|
|
لا
تَخــشَ
مــن
مــس
عـرض
قـط
أَو
ذهـب
|
مَكفولـــة
أَبَـــداً
منهــم
بخيــر
أَب
|
|
وَخيــر
بَعــل
فَلَــم
تَيتــم
وَلَـم
تَئم
|
|
أبـــاة
ضـــَيم
فَلا
يَخشــون
ظــالمهم
|
وَالوَيــل
يَومـاً
لمـن
يرمـي
محـارمهم
|
|
وإن
جهلـــت
فخـــذ
عنــي
مَعــالِمهم
|
هــم
الجبــال
فســل
عنهـم
مصـادمهم
|
|
مــاذا
رأى
منهــم
فــي
كــل
مُصـطدم
|
|
لا
تُلـف
فـي
النـاس
مـن
أَمثالهم
أَحدا
|
مـن
الألـى
سـبقوا
أَو
مـن
يكـون
غَـدا
|
|
فَســـل
بحــار
عطــاء
إن
أَردتَ
جَــدا
|
وَســل
حنينـاً
وَسـل
بـدراً
وسـل
أحـدا
|
|
فصــول
حَتــف
لهـم
أَدهـى
مـن
الـوَخم
|
|
قَواعــد
البــأس
فيهــم
طـرّاً
اطـردت
|
خلـف
الصـناديد
فـي
البَيداء
لو
شردت
|
|
فاحـذر
ليوث
الشرى
في
الحرب
إذ
مردت
|
المصــدري
الـبيض
حمـراً
بعـدما
وردت
|
|
مــن
العــدا
كــل
مسـود
مـن
اللمَـم
|
|
العارضــين
رماحـاً
فـي
الصـفوف
حَكَـت
|
أَغصــان
بــان
ببســتان
قـد
اِشـتبكت
|
|
المهرقيــن
دمــاء
فـي
الجهـاد
زَكَـت
|
وَالكــاتبين
بســمر
الخـط
مـا
تركـت
|
|
أَقلامهــم
حــرف
جســم
غيــر
منعجــم
|
|
مـا
كـانَ
عنـد
اِشـتداد
الخطب
يُعجزهم
|
أَمــر
الوصــول
إِلــى
فــوز
يعززهـم
|
|
وَاللَـــه
واعِـــدُهم
عــزاً
وَمنجزهــم
|
شــاكي
الســلاح
لهــم
سـيما
تميزهـم
|
|
وَالـوَرد
يَمتـاز
بالسـيما
عَـن
السـلم
|
|
رِد
إن
أَردت
الشــفا
يـا
صـاح
بحرهـم
|
واِستنشــق
العَـرف
تعـرف
بعـد
عطرهـم
|
|
فـــإن
ســـيرتهم
طـــابَت
وَســـيرهم
|
تهــدي
إليــك
ريــاحُ
النصـر
نشـرهم
|
|
فتحسـب
الزهـر
فـي
الأكمـام
كـل
كمـي
|
|
كَــم
مزقـوا
جيـش
أَعـداء
لهـم
إِربـاً
|
لَــم
يَســتَطيعوا
بفــر
منهــمُ
هرَبـا
|
|
وَكرهــم
حــوت
موســى
دونــه
ســرباً
|
كــأنهم
فـي
ظهـور
الخيـل
نَبـت
رُبـاً
|
|
مــن
شـِدة
الحَـزم
لا
مـن
شـدة
الحُـزمِ
|
|
وَعنــد
مــا
اِصــطف
كـل
منهـم
فرَقـا
|
ودق
قِـــرن
بســـيف
للـــوغى
دَرَقــا
|
|
وَقَــد
تصــبب
كــل
فـي
اللقـا
عرَقـا
|
حـارت
قلـوب
العـدا
مـن
بأسـهم
فَرقا
|
|
فَمــا
تُفــرق
بيــن
البهــم
وَالبُهـم
|
|
فَكَيـــفَ
يهــزم
جمــع
فيــه
نُعرَتــه
|
والأمــر
فيــه
إِلـى
الهـادي
وإِمرتـه
|
|
وَكَيـــفَ
تطفـــأ
بـــالأفواه
جمرتُــه
|
ومــن
تكــن
برســول
اللَــه
نصــرته
|
|
إِن
تلفــهُ
الأســد
فــي
آجامهـا
تَجِـم
|
|
أَنعــم
بمــن
عضــدوهُ
ســاعة
العُسـَر
|
وَأَفصــحوا
بينمــا
الأعـداء
فـي
حَصـَر
|
|
فقــد
أَعــزوه
فــوق
السـمع
وَالبصـر
|
ولــن
تــرى
مــن
ولــيّ
غيـر
مُنتصـر
|
|
بـــه
وَلا
مـــن
عــدو
غيــر
منفصــم
|
|
بجمـــع
كـــثرَتِهِ
مــن
بعــد
قلتــه
|
مـــن
غـــرّ
عـــترته
أَو
آل
خُلتـــه
|
|
وكـــل
مــن
أمَّهــم
هَــديا
لِقبلَتــه
|
أَحـــلَّ
أمتـــه
فـــي
حـــرز
ملتــه
|
|
كــالليث
حــل
مـع
الأشـبال
فـي
أجَـم
|
|
تَســنّموا
ذروة
العليــا
عَلــى
عجــل
|
بكــل
مــا
صــرَّف
القــرآن
مـن
مثـل
|
|
فظـــل
كــل
أَلــدّ
منــه
فــي
خَجَــل
|
كَــم
جــدَّلت
كلِمــات
اللَـه
مِـن
جَـدل
|
|
فيــه
وَكَــم
خصـم
البرهـان
مـن
خصـم
|
|
بقــدر
مــا
جــاءَت
الآيــات
مــوجَزة
|
كـــانَت
لشـــرّاح
مَعناهـــا
معجــزة
|
|
كَـــذا
الأَحـــاديث
قَفَّتهـــا
معــززة
|
كَفــاكَ
بــالعلم
فــي
الأمــيّ
معجـزة
|
|
فـي
الجاهليـة
وَالتـأديب
فـي
اليتـم
|
|
فَبَينَمــا
هــام
غيــري
فــي
تشــببه
|
بعـــزة
الحســن
وَصــفا
أَو
بزَينبــه
|
|
مــا
شــاقَني
النظـم
إلا
فـي
مَنـاقبِهِ
|
خــــدمته
بمديـــح
أســـتقيل
بـــه
|
|
ذنـوب
عمـر
مَضـى
فـي
الشـعر
وَالخَـدَم
|
|
وَكَيـــفَ
تــؤمن
مِــن
قــول
معــايبه
|
وَالفعــل
كَــم
عـاد
بـالأوزار
صـاحبه
|
|
كلاهمـــا
فـــي
ســـجل
جــلَّ
حاســبه
|
إِذ
قلـــداني
مـــا
تُخشــى
عــواقبه
|
|
كـــأَنَّني
بهمــا
هــديٌ
مــن
النعــم
|
|
مـا
لـي
وَقَـد
كُفيـت
عَينـاي
شـر
عمـي
|
وكــفَّ
مَــولاي
عَــن
آذانــيَ
الصــمما
|
|
وَقَـد
هَـداني
إِلـى
النجـدَين
مـن
حَكما
|
أَطعـت
غـي
الصـبا
فـي
الحـالَتين
وَما
|
|
حصـــلت
إلا
عَلـــى
الآثــام
وَالنــدَم
|
|
أمّــارتي
قَــد
أَســاءَت
فـي
إِمارتهـا
|
وَسـار
جنـد
القـوى
فـي
إِثـر
شـارتها
|
|
ووافقتهـــا
عَلــى
مــردي
إِرادتهــا
|
فَيــا
خســارَة
نفــس
فــي
تجارتهــا
|
|
لَـم
تشـتر
الـدين
بالـدنيا
وَلَـم
تسمِ
|
|
بحــر
الحَيــاة
مديــد
فــي
سـواحله
|
وَالنــاس
طــوعَ
هَــواهم
فـي
مجـاهِله
|
|
وَمُعظَـــم
الخلـــق
مَخــدوع
بِبــاطله
|
ومـــن
يَبـــع
آجلا
منـــه
بعـــاجله
|
|
يَبـن
لـه
الغبـن
فـي
بيـع
وَفـي
سـَلم
|
|
لَـم
يَبـقَ
لـي
فـي
محيط
العيش
من
غرض
|
فــي
جـوهر
مـن
لآلـي
البحـر
أَو
عـرض
|
|
ســوى
الوصـول
كَمـا
أَرجـو
إِلـى
فُـرض
|
إن
آت
ذَنبــا
فَمــا
عَهــدي
بمنتَقِــض
|
|
مـــن
النَـــبي
وَلا
حَبلـــي
بمنصــرمِ
|
|
وَلســت
أَخشــى
وَلَــو
أَهملـت
تَزكيَـتي
|
لِلنَفــس
فـي
مَذبـح
الحرمـان
تَضـحيَتي
|
|
وَلا
أَخـــاف
حِســـاباً
يَــومَ
تَســويَتي
|
فـــإن
لـــي
ذمــة
منــه
بتَســميَتي
|
|
محمــداً
وَهــوَ
أَوفـى
الخلـق
بالـذمم
|
|
وَمـــدحتي
هـــذه
صـــكي
وَمُســـتَنَدي
|
لَــدى
كَريــم
الأيــادي
ســَيدي
سـندي
|
|
فــإنه
بعــد
عفــو
اللَــه
معتَمــدي
|
إن
لَـم
يكـن
فـي
مَعـادي
آخِـذاً
بيـدي
|
|
فَضــلا
وإلا
فقــل
يــا
زلــة
القَــدم
|
|
يَــوم
بــه
يَشــتَكي
المَظلـوم
ظـالمَه
|
وَســيد
القَــوم
ســاوى
فيــه
خـادمه
|
|
وَهــوَ
الشــفيع
الَّـذي
نَرجـو
مَراحمـه
|
حاشــاه
أَن
يحــرَمَ
الراجــي
مكـارمَه
|
|
أَو
يَرجــع
الجــار
منـه
غيـر
محتَـرمِ
|
|
مــا
خفــت
فـي
زَمَنـي
يَومـاً
طـوائحه
|
وَلا
اضـــطَربتُ
وَلَــو
أَبــدى
جــوائحه
|
|
مـن
حيـن
مـا
اِستنشـَقت
روحـي
روائحه
|
وَمنـــذ
ألزمـــتُ
أَفكــاري
مــدائحه
|
|
وجــــدته
لخلاصـــي
خَيـــرَ
مُلتَـــزم
|
|
عَلـــى
مَكــارِم
طــه
حملــتي
حُســبت
|
ســيّان
إن
كســبت
نَفســي
أَو
اِكتسـبت
|
|
إذ
طالَمـا
الفُلـك
عـامت
بعد
ما
رَسبت
|
وَلَــن
يَفـوت
الغنـى
منـه
يـداً
ترِبـت
|
|
إن
الحَيــا
يُنبـت
الأزهـارَ
فـي
الأكـم
|
|
وَكَــم
ريــاح
بــأَرواح
الـوَرى
عصـفت
|
وَبعــد
تَكــديرها
بالقاصــِفات
صــَفت
|
|
وَذات
مَظلمــة
مــن
خصــمها
اِنتصــَفَت
|
وَلَـم
أرد
زَهـرة
الـدنيا
الَّتي
اِقتطفت
|
|
بَــدا
زهيــر
بِمــا
أَثنـى
عَلـى
هِـرَم
|
|
الــدهر
فــي
النــاس
مَوصـوف
بِقُلَّبـه
|
وَالنـــاس
أَبنـــاؤُه
أَســرى
تقلبــه
|
|
كـــالبَرق
يخـــدع
آمـــالا
بخلبـــه
|
يـا
أَكـرَم
الخلـق
مـا
لي
من
أَلوذ
به
|
|
ســواك
عنــد
حلــول
الحـادِث
العمـم
|
|
أَنــا
الَّــذي
رأس
مــالي
كلـه
أَرَبـي
|
فـي
مـدح
ذاكَ
النَـبي
الهاشمي
العَرَبي
|
|
فـــإنه
ملجئي
إن
ضــقتُ
مــن
كُربــي
|
وَلَــن
يَضــيق
رَسـول
اللَـه
جاهُـك
بـي
|
|
إِذا
الكَريــم
تحلــى
باســم
منتقــم
|
|
هنــاك
تبــدي
نفـوس
النـاس
غيرتهـا
|
لكـل
مـن
أَكـثرت
فـي
الخلـق
مِيرتهـا
|
|
فـامنن
عَلـى
نفـس
عـافٍ
عـافَ
سـيرتها
|
فــإن
مــن
جــودك
الــدنيا
وضـرَّتها
|
|
ومــن
علومــك
علــمَ
اللـوح
وَالقَلَـم
|
|
أَقــول
للنفــس
تطميعــاً
وَقَـد
ظلمـت
|
مَطيَــتي
بارتكــاب
بعــد
مــا
هرمَـت
|
|
وَهالَهــا
مــا
عليــه
حســرة
كظمــت
|
يــا
نفــس
لا
تَقنَطـي
مـن
زلـة
عظُمـت
|
|
إنَّ
الكَبــائِر
فــي
الغفـران
كـاللمَم
|
|
كـــادَ
التـــذكر
للآثـــام
يعــدمُها
|
لَــولا
الرَجـاء
إذا
مـا
هـاجَ
مؤلمهـا
|
|
وَهـيَ
الَّـتي
بعـد
علـم
اللَـه
تعلمُهـا
|
لعـــلَّ
رحمــة
ربــي
حيــن
يقســمها
|
|
تـأتي
عَلـى
حسـب
العصـيان
فـي
القسم
|
|
فَيــا
حَكيــم
اكفنــي
بحـران
منتكـس
|
وَنجنــي
مــن
هـوى
قَـد
لَـجَّ
بـي
شـَكِس
|
|
وَلا
تــــردن
صـــِفراً
كـــفَّ
ملتمـــس
|
يــا
رب
واجعــل
رَجـائي
غيـر
منعكـس
|
|
لــدَيكَ
واجعــل
حِســابي
غيـر
منخـرم
|
|
محمـــد
فرغَلـــي
الأنصــاري
أَذهلــه
|
مـا
قَـد
جَنـاه
عليـه
البَغـي
وَالبَلـه
|
|
فاكشـــف
مضـــرته
إذ
مســّه
الــوَلَه
|
وَالطــف
بعبـدك
فـي
الـدارَين
إن
لـه
|
|
صــَبراً
مَــتى
تَــدعُه
الأهـوال
ينهـزم
|
|
واِمنـــن
عَلَيـــه
بإحســان
وَخاتمــة
|
حســنى
وســوق
بخيــر
الكسـب
قائمـة
|
|
وصــنه
مــن
فتـن
فـي
النـاس
نائمـةٍ
|
وأذن
لســـحب
صـــلاة
منـــك
دائمــةٍ
|
|
عَلـــى
النَـــبي
بمنهـــلّ
وَمنســـجم
|
|
إنَّ
الصــَلاةَ
بِهــا
قَلـب
النَقـي
طَربـا
|
يَميــل
ميــل
فَــتى
إِبـان
عهـد
صـبا
|
|
عَلَيــهِ
أَزكــى
صــَلاة
مثـل
زهـر
رُبـى
|
مــا
رنحـت
عَـذباتِ
البـان
ريـح
صـَبا
|
|
وَأَطـرَب
العيـس
حـادي
العيـس
بـالنغَمِ
|