|
ظلـت
الهـو
بساحل
الحب
حينا
|
وفـؤادي
مـن
الهـوى
في
أمان
|
|
لا
أراعـي
لـذلك
اليـم
غـدرا
|
وهـو
فـي
رقـدة
كنوم
الحسان
|
|
كنـت
في
قاربي
من
الهم
خلوا
|
لســت
أدري
لواعــج
الأشـجان
|
|
كنت
في
قاربي
من
الوجد
أهذي
|
كلمـــا
أن
للصــبابة
عــان
|
|
كنـت
في
قاربي
مع
الحب
طفلا
|
وجميــع
الآمـال
فـي
أحضـاني
|
|
إن
يهـب
النسـيم
فهـو
عليـل
|
كمنـــام
يلـــذ
للوســـنان
|
|
أو
تمـر
الأمواج
فهي
سطور
ال
|
حــب
خطـت
بـأحرف
مـن
جمـان
|
|
ذاك
عهـدي
بـأول
العشـق
لكن
|
ما
شقائي
ما
لوعتي
ما
هواني
|
|
عاصـف
الحـب
لـم
يدع
لي
برا
|
أرتجيــه
وبــالهوي
أضـناني
|
|
بيـن
أمـواج
كالجبال
رما
بي
|
وريــاح
تشــتد
فــي
كـل
آن
|
|
قلت
عقلي
فلم
يعرني
التفاتا
|
صـحت
قلـبي
فلـج
فـي
عصياني
|
|
وإذا
مـا
بلـتي
بالحب
فاعلم
|
إنمـا
القلـب
والنهـى
خـذلان
|
|
أمــل
ضــاحك
ويــأس
عبــوس
|
أنـا
والـدمع
فيهمـا
حائران
|
|
يرفعـاني
إلـى
السماء
طروبا
|
ثـم
فـي
لجـة
الأسـى
يرمياني
|
|
أبصـر
العاشـقين
حـولي
جمعا
|
ووجــوه
الجميــع
كـالأقحوان
|
|
يسـكبون
الـدموع
مـن
كل
عين
|
ودمــوعي
أمــامهم
تبيــاني
|
|
تلـك
قيثـارة
الغـرام
وأنـي
|
أسـمع
القـوم
نغمـة
الوجدان
|
|
يرقـص
العاشـقون
للوجـد
حتى
|
تأخــذ
الكـل
موجـة
الأحـزان
|
|
فيـبيتون
فـي
ليـالي
البلايا
|
ويعـودون
فـي
نهـار
الأمـاني
|