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جـرى
فـي
البريـة
حكـم
القدرْ
|
فهــذي
التجـارب
أيـن
العِـبرْ
|
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كفـى
بـالحوادث
فـي
كـلّ
يـوم
|
دليلاً
علــى
نقلــك
المنتظــر
|
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إذا
مـا
اعتبرتَ
الأمور
استقمتَ
|
فالاســـتقامة
فــي
المعتــبر
|
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رأيــتُ
الفنــاءَ
لنــا
منهلاً
|
وكـــلٌّ
إلــى
شــربه
محتضــر
|
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عشــقنا
البقــاء
وممـا
مضـى
|
مــن
العمـر
أكـثر
ممـا
غـبر
|
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ولـو
لـم
تحبّـب
إلينا
الحياة
|
لمتنــا
أسـىً
قبـل
أن
نحتضـر
|
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وبيـــن
الليــالي
وآجالنــا
|
مجــال
تُغيــر
عليــه
الغِيَـر
|
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ومــن
جعــل
العمــر
خيلاً
لـهُ
|
وســَابقَ
دُهــمَ
الليـالي
عـثر
|
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أرى
لــذة
العيــش
فــي
طيّـب
|
يُعجّــــل
أو
صـــالح
يُـــدّخَر
|
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وإلاَّ
فمـــا
ســـاغها
جاهـــل
|
ولا
عاقــل
لــم
تُشـبْ
بالكـدر
|
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ومـا
لـذة
العيـش
عنـد
امـرئٍ
|
توقّــع
مصــرعه
فــي
الحُفَــرْ
|
|
ومـا
لـذة
العيـش
عنـد
امـرئٍ
|
ترامـى
اختيـاراً
ببحـر
الخطر
|
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فمـا
أعظـم
الخطـب
عبـد
ذليل
|
يقــاد
إلــى
غـائب
قـد
بهـر
|
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وليــسَ
علـى
اللـه
فـي
ملكـه
|
اعـتراض
مـن
العبـد
فيما
قدر
|
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علــى
العبــد
أن
يُســلّم
الأم
|
ر
للآلــه
ويفعــل
مـا
يـؤتمر
|
|
ألــم
تــر
ربــك
أبـدى
لنـا
|
معَــالم
نجــدين
خيــراً
وشـر
|
|
وأنشــأ
لنــا
فيهمــا
قــوة
|
وعرّفنــا
مــا
نهــى
أو
أمـر
|
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فمـا
سـطَّر
اللـه
في
اللوح
ما
|
أراد
يكــون
علــى
مــا
سـطر
|
|
فـإنْ
يُـرِد
اللـه
أمـراً
بعبـد
|
يُيَســّرٍ
لــه
ســبباً
حيـث
مـر
|
|
فمـا
الفضـل
والعـدل
إلا
جـزا
|
ء
حكمـــة
بعـــد
أن
يختــبر
|
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فلا
تأســفنَّ
علــى
مــا
مضــى
|
فمـن
ذا
يـردّ
القضـا
والقـدر
|
|
ولا
تعتـب
الحـق
فيمـا
اقترفتَ
|
فمنــك
الريـاح
ومنـك
المطـر
|
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أيــا
عـالم
العقـل
إنـي
أرى
|
ظهـورك
فـي
الكـون
أمـراً
أمر
|
|
ولـو
لـم
يكـن
لـك
شـأن
عظيم
|
لمــا
خُلِقَــت
جنــة
أو
ســقر
|
|
فلا
تجعــل
النجـم
تاجـاً
فعـن
|
قليــل
يهــالُ
عليــك
المـدر
|
|
إذا
أنـتَ
لـم
تدر
أين
المصير
|
فمــا
عيشــك
النـزر
إلاَّ
كـدر
|
|
أأحبابنـــا
مضــت
الأكرمــون
|
وغــودر
منهــم
طريـف
الخـبر
|
|
فحتـــام
لــم
نــتزود
تقــى
|
ونعلــم
إنــا
لنقفــو
الأثـر
|
|
أنطمــع
بعــدهم
فــي
البقـا
|
وأرواحنـا
زادهـم
فـي
السـفر
|
|
وكـانوا
فريـداً
بجيـد
الزمان
|
برتــه
الحـوادث
حـتى
انتـثر
|
|
إذا
لاح
بــــارق
تــــذكارهم
|
تحـدّر
مـن
سـحب
عينـي
المطـر
|
|
بحـور
النـوال
نمـور
النـزال
|
صــدور
الرجـال
بـدور
السـمر
|
|
سـماة
الثغـور
حمـاة
الثغـور
|
غلاة
القــــدور
علاة
القـــدر
|
|
أجــابوا
المنايـا
كأمثـالهم
|
وأبقـوا
رمـاداً
علـى
المستعر
|
|
فــأين
الشـآم
وأيـن
العـراق
|
ومــن
فيهمـا
مـن
ملـوك
غـرر
|
|
وأيـــن
قريـــش
ذوو
الألســن
|
الفصــيحة
والمجـد
والمفتخـر
|
|
وأيـنَ
الأولـى
نصـروا
المصطفى
|
وحازوا
المعالي
ونالوا
الظفر
|
|
ومــا
ملـك
الأمويـون
والعبـا
|
بســـة
الشـــم
بحــراً
وبــر
|
|
وأيـن
الأكاسـرة
العجم
والقيا
|
صــرة
الشــهم
أضــحوا
عــبر
|
|
وأيــن
الـذين
أشـادوا
البلاد
|
وقـادوا
الجياد
وسَادوا
البشر
|
|
وأيـن
الـذين
أضـافوا
الصيِّام
|
وعـافوا
المنام
ووافوا
السَّهر
|
|
وأيـن
الـذين
أناشـوا
السماح
|
وراشـوا
الجنـاح
ببـذل
البدر
|
|
وأيـن
الـذين
أقـاموا
الجهاد
|
ورامـوا
الرشاد
وسَاموا
الضرر
|
|
تقضـــوا
وأســـلمهم
ســـايق
|
المنايـا
إلـى
ظلمـات
الحفـر
|
|
فأضـحوا
لمـن
بعـدهم
فـي
الب
|
لاد
أحـاديث
تتلـى
كمثل
السور
|
|
كفــــى
بتقضــــيهم
ســـَلوة
|
بمـا
نالنـا
مـن
صـروف
القدر
|
|
أرى
المـــوت
عـــدلاً
ولكنــه
|
تُبكــي
المكـارم
ليـس
الصـُّور
|
|
فلا
تبــكِ
غيــرك
لكــن
عليـك
|
فــأنت
أحــق
بـه
فـي
النظـر
|
|
تمــر
الليــالي
وشـارفت
مـا
|
وعــدت
وقلبــك
مثــل
الحجـر
|
|
محـل
الـدموع
إذا
مـا
اعتبرتَ
|
هـو
فـي
البصـيرة
لا
في
البصر
|
|
أأخواننــا
هــذه
الحادثــات
|
مخالبهــا
فـي
الـورى
تنتشـر
|
|
وهـــذي
الحبـــائل
منصــوبة
|
لكـــم
لتقيـــدكم
بـــالغرر
|
|
فلا
تخــــدعنكم
بأشــــراكها
|
فيصـــبح
طـــائركم
مقتهـــر
|
|
وهـــاتيكم
زهـــرات
الــدُّنَى
|
لغرتكـــم
زخرفـــت
بــالحِبَر
|
|
الا
فاحـــذروها
فمـــا
هــذه
|
المناجــل
إلا
لقطــف
الثمــر
|
|
الا
واعـــبروا
ببلاغ
التقـــى
|
فتلــك
ســبيل
إلـى
مـن
عـبر
|
|
الا
فانظروهــا
بعيــن
احتــق
|
ار
فكــل
ســنا
آفــل
محتقـر
|
|
رِدوا
مـا
صفا
من
حياض
الحياة
|
فلا
بــد
فــي
وارد
مــن
صـدر
|
|
فلا
تتعبـوا
النفس
في
جمع
مال
|
وذاك
لغيركــــــم
مـــــدخر
|
|
كفــى
بغنــى
النفــس
مــالاً
|
وبالكفـاف
كفـاء
لنيـل
الوطر
|
|
وخـــافوا
الهكـــم
تــأمنوا
|
وقــوف
القيامــة
والمحتشــر
|
|
وصـبراً
لهـذي
الليالي
القصار
|
فطـوبى
لمـن
كـان
فيهـا
صـبر
|
|
وكـــل
لـــه
أمـــد
ينتهــي
|
ويجــري
وشــيكاً
إلـى
مسـتقر
|
|
وهـذا
هـو
الشـعر
سـحر
الحلال
|
ويـــا
حســبه
لكــم
مزدجــر
|
|
صــدعتُ
بــوعظي
صـخر
القلـوب
|
منكــم
وليَّنــتُ
صــُمّ
الحجــر
|
|
جلـوت
الصـَّدى
من
مرائي
النهى
|
وقلـــبي
ممتلـــئ
بالكـــدر
|
|
فهـــل
أنــا
متعــظ
مثلكــم
|
أم
الصـَّلد
لـم
يبق
فيه
المطر
|
|
أعــوذ
بربــي
مــن
أن
أكـون
|
وعظــاً
ومــالي
بــه
معتــبر
|
|
إلهـــي
عبــد
ضــعيف
أتــاك
|
يخطــر
بيــن
الخَطَـا
والخطـر
|
|
أتــى
وهــو
يعـثر
فـي
ذنبـه
|
ورجـــواكَ
تنهضـــه
إن
عــثر
|
|
لقــد
لعبــت
بحشـاه
الهمـوم
|
وســـاعدهن
اغــتراب
الســَّفر
|
|
مـآرب
فـي
النفـس
لـم
يقضـها
|
سـوى
فضـلك
البحـر
يا
خير
بر
|
|
لقــد
عــودتني
أياديـك
طـول
|
مَـــنّ
وحاشـــاك
أن
يقتصـــر
|
|
أغثنــي
بفيـاض
جـود
بـن
الأم
|
انــي
غرقــى
لهــا
قـد
غمـر
|
|
وأسـدل
علـى
زلـتي
مـن
عظيـم
|
عفـــوك
مــا
لــذنوبي
ســتر
|
|
فـــإِن
تمــام
الــذي
رمتــه
|
نهايــة
سـؤلي
وأقصـى
الـوطر
|