|
ذكـرتُ
أسـىً
وبعـض
الأمـر
يُنسـِي
|
ومــا
فـي
الـدهر
داتمـةٌ
لأُنـسِ
|
|
يــروم
المــرء
آمــالاً
طِـوالاً
|
ودنيــــاهُ
تُقاضـــيه
بعكـــسِ
|
|
لكـــلٍّ
نيـــة
يبنــي
عليهــا
|
ولــم
يقــم
البنـاء
بغيـر
أُسِّ
|
|
ومـن
يغـرس
أصـول
الشـر
يجنـي
|
ثمــار
الحــزن
يانعــةً
بغـرسِ
|
|
وشــتان
الــذي
يبنــي
ديـاراً
|
ومـــن
يســـعى
لتخريــب
ودرسِ
|
|
ومـــن
طلـــب
العلاء
بلا
محــل
|
أعــــادته
مطـــالبه
لركـــسِ
|
|
وبعــض
النـاس
يخطـب
بنـت
عـز
|
فمــا
أعطتـه
منهـا
غيـر
رفـسِ
|
|
ومـن
لـم
يحفـظ
النعمـا
بشـكر
|
فمـــا
أولاه
أن
يرمــى
بتعــسِ
|
|
وبعـض
الـداء
يـبرأ
بالتـداوي
|
وبعـــض
منــه
مــردود
بنكــسِ
|
|
وفَلْــسُ
المـرء
جُنْـدٌ
وهـو
صـَرْفٌ
|
ولـم
تقـم
الجنـود
بغيـر
فلـسِ
|
|
وللتــدبير
فــوق
المـال
فضـل
|
فكيـف
إذا
همـا
اجتمعـا
بنفـسِ
|
|
ومـن
يُجِـع
الجنـود
وهـم
حمـاةُ
|
تفـــرَّق
أمــره
ودُهــي
بنحــسِ
|
|
ولــم
تقــم
الجنـود
بلا
أميـر
|
ولـم
تقـم
الفـروع
بغيـر
قنـسِ
|
|
ومنـي
ملـك
لـواء
الـرأي
يمضي
|
ولـــم
يحفــل
بعــامي
وعــرسِ
|
|
وللعقـــبى
عقـــول
عارفـــات
|
بمــا
يــأتي
بتخميــن
وحَــدْسِ
|
|
إذا
شـبَّت
لظـى
الهيجـاء
شـابت
|
رؤوس
غُـــذِّيت
بصـــباً
وأنـــسِ
|
|
هنــالكم
المحامــد
والمخـازي
|
ويُقْـــذَف
غِــشُّ
رِعديــد
ونِكــسِ
|
|
لقــد
طلّقــت
أحزانــي
بــبيت
|
وســيع
الأمـن
وهـو
بـدار
حبـسِ
|
|
لبثــت
بهـا
بصـلح
مـن
زمـاني
|
وأيَّـــامي
بهَــا
أيــام
عــرسِ
|
|
ومـا
دار
المضـيبي
فـي
قراهـا
|
علاً
إلا
كملـــك
فـــوق
كرســـي
|
|
كسـَاها
اللـه
بُـرْداً
مـن
أمـان
|
يمـــدُّ
بكـــف
تنقيــة
وقــدسِ
|
|
فــإن
تُشـرِْف
عليهـا
مـن
بعيـد
|
حســبت
غمامــة
حــدقت
بشــمسِ
|
|
إذا
مــا
زادهــا
ضــيف
بليـل
|
قرتــه
بطيــب
زاد
غيــر
ممـسِ
|
|
وليــسَ
بهــا
أذى
حــر
وبــرد
|
ولا
الحشــرات
تأويهــا
لضــرسِ
|
|
بصـــفحتها
مســـايل
طيبـــات
|
كمثــل
مســايل
كتبــت
بطــرس
|
|
إذا
نســـَماتها
هبـــت
بليــل
|
تضــوّع
عطرُهــا
فــي
كـل
جنـسِ
|
|
تراهــم
فــي
مسـايلها
نشـاوى
|
بأجفــان
مــن
النســماء
نُعْـسِ
|
|
وعادتهــا
بمــن
يبغـي
فسـَاداً
|
بهــا
ترديــه
داهيــةٌ
تنســّي
|
|
كــان
الســوق
وســط
محلّتَيْهـا
|
نجـــوم
مجـــرة
بســـماء
وَرْسِ
|
|
كـــأن
غلالــة
حمــراء
حيكــت
|
بأوســطها
طــرائف
مــن
دِمَقْـسِ
|
|
كــأنَّ
الفرســخي
كريــم
قــوم
|
بســيط
الراحــتين
بفيـض
رغـسِ
|
|
يبــاين
مــاءه
فصــلي
شــتاء
|
وصـــيف
كلمــا
وافــى
بجنــسِ
|
|
فــإن
قــرٌّ
فــذا
بـاللمس
حَـرٌّ
|
وإن
حَـــرٌّ
فــذا
بــردٌ
بلمــسِ
|
|
كــأنَّ
النــاس
طفـل
وهـو
ثـدي
|
لمرضــعة
غزيــر
فــي
المحبـسِ
|
|
ســمعتُ
مـع
الصـُّوار
لـه
خريـر
|
يحقّـــق
علمــهُ
بلســان
فُــرسِ
|
|
كــأنَّ
المسـجد
المعمـور
يَـروي
|
بمـا
يملـي
لـه
مـن
علـم
غـرسِ
|
|
توسـط
فـي
الحمـى
كنظيـره
فـي
|
الســما
والأرض
وامتـازا
بقـدسِ
|
|
وإنَّ
الخيـــر
موضـــوع
لــديه
|
ومحمــــول
بكليــــات
خمـــسِ
|
|
ســمت
بالفرســخي
ديــار
حبـس
|
كمــا
بالـذكر
يسـمو
كـل
طِـرسِ
|
|
إذا
مـــا
جئتَ
ليلاً
أو
نهــاراً
|
بهــا
تسـتغني
عـن
قمـر
وشـمسِ
|
|
قــد
انفــردت
بلـذة
كـل
عيـن
|
مــن
الـدنيا
وشـهوة
كـل
نفـسِ
|
|
تجنّــى
أهلهــا
شــرّاً
عليهــا
|
فأضــحت
وحشــة
مـن
بعـد
أنـسِ
|
|
وقـــد
لبســـت
غلائل
طــاهرات
|
فأمســت
بُــردة
غُمســت
بِنجــسِ
|
|
مسـاجدها
الزواهـر
قـد
خلت
من
|
جماعــــــات
لـــــورّاد
ودَرسِ
|
|
وأمســـى
ســـُوقُها
عطلاً
كخَــوْد
|
تســاقط
حَلْيُهـا
مـن
بعـد
لبـسِ
|
|
فيــا
للــه
كــم
عيــنٍ
ونفـسِ
|
بهــا
فاضـت
لعهـد
غيـر
مَنسـي
|
|
تقــدمتِ
الخســاس
لنَتْــج
شــرٍّ
|
لقـــد
نتجــت
مقدمــة
الأخــسِ
|
|
ولـم
نـألُ
اجتهـاداً
فـي
هداهم
|
وأوضــحنا
الرشـاد
بغيـر
لَبـسِ
|
|
مُـرُوا
بـالعُرْفِ
وانهَوا
عن
سِواه
|
وذا
ســكن
لكــم
يغـدو
ويمسـي
|
|
إذا
ظهـر
الزنـى
فـي
دار
قـوم
|
بهـم
كـثر
الفنـا
وقُضـِي
بفَـرْسِ
|
|
وراعُــوا
حفــظ
داركــم
بعـدل
|
فمــأرب
إذ
عَــدت
رُميَـت
بطمـسِ
|
|
بسـوقكم
انتهُـوا
عـن
بيـع
سُحْت
|
وبخــس
واقْتِنــا
مَكْــسٍ
ووَكــسٍ
|
|
وبيــع
الحُــرِّ
نـار
وهـو
عـارٌ
|
ومخربـــة
البنــاء
المُســْتَرسِّ
|
|
أقيموا
العدل
بالميزان
وارعَوا
|
حمــى
المــولى
بمكيـال
وسـدسِ
|
|
لكــم
فـي
أهـل
مَـدْيَنَ
أي
وعـظ
|
وبالأشــرار
قــد
قَبُـح
التأسـّي
|
|
وكــم
قـامت
بهـا
خطبـاء
عـدل
|
تــذكر
فــي
عُكــاظ
خِطـاب
قُـسِّ
|
|
فلــم
يرســب
بهـم
نصـح
ووعـظ
|
وتــاهوا
كالــذين
رمـوا
بمَـسِّ
|
|
وطــال
الأمــن
فيهــم
لا
عَــدُوّ
|
يصــــبّحهم
ولا
مـــرض
يُمســـّي
|
|
إذا
فتــح
العـدو
لهـم
عيونـاً
|
تَــــداركها
إلهُهُـــم
بطمـــسِ
|
|
ومَــسَّ
الرِّجــزُ
بُلـداناً
فـأقوَتْ
|
ولــم
ينظــر
لحــوزتهم
بمَــسِّ
|
|
ولــم
أر
للقبيلــةِ
كالأعــادي
|
ألــمَّ
لهــا
واذهــب
للتعســّي
|
|
محاربـة
العـدا
تلهـي
الأدانـي
|
عــن
البغضــاء
بينهـم
وتنسـي
|
|
وبـــالأمراض
وعـــظ
واتعـــاظ
|
وليـن
حشـا
مـن
الـذنب
المنسّي
|
|
وقــد
صــدعوا
بآيــات
تـوالت
|
وهــم
فـي
سـَكرة
تُضـحي
وتُمسـي
|
|
فأمضــى
حكمَــه
الجبَّـارُ
فيهـم
|
وألقــى
بينهــم
أســواط
رجـسِ
|
|
فمــاجُوا
بالتطـاول
والتعـادي
|
وساسـُوا
الضـُرَّ
فـي
مـال
ونفـسِ
|
|
فبعضــهم
يحــاول
نيــل
ملــك
|
وبعضــــهم
يمـــانعه
بـــروسِ
|
|
وأضــحوا
فرقــتين
وكـل
إحـدى
|
علــى
الأخــرى
تجاذبهــا
بخـسِّ
|
|
وصــاغوا
ذات
يــوم
لطـف
كيـد
|
وجمعهــــم
يســـُوقهم
مرســـّي
|
|
ودقّــوا
عِطـرَ
مَنْشـم
وقـتَ
عصـرٍ
|
ووجــهُ
الشــمس
مَطلــيٌّ
بــورسِ
|
|
فلـم
تسـمع
ولـم
تـر
غيـر
برق
|
ورعــد
مــن
ســنا
صــُمْعٍ
وحَـسِّ
|
|
وحــاك
النقــع
حلــة
طيلسـان
|
علــى
الأرجـاء
واكتحلـت
بنقـسِ
|
|
فقمنــا
بيــن
بارقــة
أضـاءت
|
وراعـــدةٍ
أصــاخت
كــل
هجــسِ
|
|
وطفنـــا
بيــن
مُســودٍّ
تجلــىّ
|
ومنهـــدّ
تعلـــىّ
كـــل
نفــسِ
|
|
كــأنَّ
الرمــي
والمرمــيُّ
شـهب
|
تخـــر
علــى
شــياطين
بلمــسِ
|
|
كــأنَّ
حسيســهَا
أصــوات
نحــل
|
أحطــن
بــبيتهنَّ
تجــاه
دبــسِ
|
|
دعونــا
بــس
واعلان
العــوافي
|
وصــــُمعهم
تلبينــــا
ببَـــسِّ
|
|
إذا
اشـتهت
القبـائل
طعـم
حرب
|
فلا
يشـفي
سـوى
الشـبع
المدسـّي
|
|
وقلعتهـــم
لمـــدفعها
غمــامَ
|
حـــداه
رعــد
همهمــة
وجــرسِ
|
|
كــأن
الــبيت
يخطبهــا
فـردت
|
بهـــدٍّ
لا
يؤلـــف
وجــه
عِــرسِ
|
|
وجمهــرة
الــبيوت
بهــنَّ
تَيْـهٌ
|
بألســـنةٍ
تَكَلَّــمُ
غيــرِ
خُــرسِ
|
|
فلـم
يرعـوا
لعيسـى
قـط
عهـداً
|
ولا
لِســَواه
مــن
صــلحاء
أنـسِ
|
|
وصــبّحهم
ويُحمــد
وجــهُ
صــبحِ
|
ومســــَّوه
بحربهــــم
بعبـــسِ
|
|
فبــان
الخطـب
عـن
قتـل
وجـرح
|
وكــــانت
أي
راهبـــة
بـــرسِّ
|
|
وكــان
بشـهر
شـعبان
التفـاني
|
بيــوم
السـبت
منـه
عصـرَ
خَمـسِ
|
|
وطــال
الأمــن
والتاريــخ
جـب
|
عرتنــا
وحشــة
مـن
بعـد
أنـسِ
|
|
فمــا
أدهــاه
مـن
شـهر
تقضـى
|
وحســبك
عــبرة
مـا
كـان
أمـسِ
|
|
وشــعبان
لحبــس
كــان
فــألاً
|
لهـــم
بتشــعُّبٍ
ولــزوم
حبــسِ
|
|
فلا
تعجــب
لحبــس
ان
تفــانوا
|
فهــم
أتبــاع
ذبَيــان
وعبــسِ
|
|
وابنـا
قيلـة
احتـدموا
قـديماً
|
وابنـــا
وائل
ومضــوا
كــأمسِ
|
|
وكيــف
اذمُّ
حبســاً
فـي
جنـابي
|
وهــم
سـيفي
إذا
أُبلـى
وترسـي
|
|
غطارفــــة
جحاجحـــة
أســـود
|
صــدور
جحافــل
وبــدور
غلــسِ
|
|
إذا
نزلــوا
مــدى
واسـتنزلوه
|
فهـم
فـي
الحـالتين
سـُخاة
نفسِ
|
|
إذا
ضـنَّت
يـد
الخضـراء
جـادوا
|
علـى
الغـبرا
ببسـط
يـدٍ
وأُنـسِ
|
|
وإن
قـامت
رحـى
الهيجاء
كانوا
|
لهــا
الأقطــاب
فـي
دور
وجـرسِ
|
|
لهــم
وَثَبــاتُ
صــدقٍ
للمنايـا
|
إذا
صــرخ
المنـادي
يـا
لحبـسِ
|
|
عصـائب
مهـدوا
لِسـَما
المعـالي
|
مراقــي
فـارتقوا
بنـدى
وبـأسِ
|
|
هـــم
جــزآن
والمجمــوع
كُــلٌّ
|
وأعــــراق
بأصــــل
مســـترسِّ
|
|
وبطنــا
يحمــد
فيهــم
أقامـا
|
بــأبراج
مــن
الجــوزاء
قُعـسِ
|
|
أثــارا
فتنــة
أخــرى
فهـاجت
|
نفوسـاً
مـن
جنـاة
الحـرب
حُمْـسِ
|
|
كُمـــاة
لا
يهــابون
المنايــا
|
بمخلبهـــا
رمتهــم
أو
بضــرسِ
|
|
مــتى
ضــربت
صياصـيهم
أفاضـت
|
بصــمعهم
الشــداد
سـحاب
تعـسِ
|
|
فكــان
المـرء
فـي
سـفك
وقتـل
|
وكــانت
تلــو
عمتهــا
بــأمسِ
|
|
ومــن
بلـدانها
الغربـي
طـابت
|
مشـــاربه
ومـــرَّت
بالتحســـَي
|
|
وكــان
الزاهــب
اسـماً
بـدَّلوه
|
بـــذال
نقطــت
بمــداد
رجــسِ
|
|
هــو
الســبب
المهيـج
للبلايـا
|
وللأشــــياء
أســـباب
تؤســـي
|
|
علــى
خضــرائه
اسـتولى
فريـق
|
لآخــر
فيــه
مــن
رطــب
ويبـسِ
|
|
وكــان
العهـد
ممـدوداً
عليهـم
|
وكلهــــم
يجــــاذبه
بخــــسِ
|
|
وقـــد
شــرقت
بلادهــم
بجــوع
|
وخــوف
بعــدما
شــرقت
بعكــسِ
|
|
وأضــمر
بطنهــا
شــراً
ولكــن
|
غــدا
شــبعان
مـن
عسـر
وحـرسِ
|
|
سـألت
اللـه
صـرف
الشـر
عنهـا
|
وعــود
الخيـر
فـي
مـال
ونفـسِ
|
|
وهـذي
الفتنـة
اسـتولت
على
من
|
ثــوى
فيهــا
وشــاركها
بــدسِّ
|
|
وأسـمى
العـارفون
بهـا
حيـارى
|
لمــا
نــالتهم
منهــا
بغمــسِ
|
|
وعـزل
النفـس
عنهـا
فـرض
عيـن
|
أيــدخل
مــؤمن
أعمــال
رجــسِ
|
|
وإن
الخيــر
كـل
الخيـر
فيمـن
|
يكــون
بــبيته
أمثــالَ
حِلْــسِ
|
|
وبــذل
النفـس
صـعب
وهـو
حلـو
|
علــى
الأعــدا
ومـرٌّ
فـي
الأخـسِّ
|
|
وإنـــي
مـــن
شلاشــلها
خَلــيُّ
|
ولــم
أكُ
مــن
صلاصــلها
بـوَجْسِ
|
|
وكــم
رؤيـا
لنـا
دلَّـت
عليهَـا
|
وعقـــلٍ
نــاظر
فيهــا
بحــدسِ
|
|
فجــاءت
بكــرة
شــوهاء
تخشـى
|
مطالعهــا
تُقــادُ
بــزي
عنــسِ
|
|
فلا
أهلاً
ولا
حلّـــــت
وولّـــــت
|
تُـــذَبُّ
بســائقي
طــرد
وعكــسِ
|
|
إلهــي
أنــت
أحفـى
بـي
فثبّـت
|
علـى
تقـواك
قلـبي
قبـل
خلسـي
|
|
بنفســي
حسـن
ظنـي
فيـك
فيمـا
|
أردتُ
وأنــت
أعلـم
مـا
بنفسـي
|
|
فمــنَّ
علــيَّ
بـالغفران
واختـم
|
علــى
عملــي
بتزكيــة
وقــدسِ
|