|
إذا
خــــدعت
ســـمعي
ملامـــةُ
لائم
|
فــأين
إشــارات
الهـوى
المتقـادم
|
|
أبــى
القلـب
إلا
لوعـة
كلمـا
شـدت
|
علــى
عــذبات
الــدوح
ورق
حمـائم
|
|
ولــي
مقلــة
تهمـي
شـآبيب
دمعهـا
|
إذا
هــي
شــامت
بارقـات
المباسـم
|
|
غـدا
الشـوق
يستسـقي
لقلبي
سحابها
|
فلــم
يــك
فـي
هـام
شـفاء
لهـائم
|
|
فيـا
بعـد
مـا
بيـن
الجفون
ونومها
|
ويـا
قـرب
مـا
بين
الجوى
والحيازم
|
|
ويــالي
مــن
ســرب
عــواطٍ
عواطـلٍ
|
ســوالٍ
مـن
الـداء
الـدفين
سـوالم
|
|
ســنحن
فكــم
دمــع
ســفحن
ومهجـة
|
جرحــن
وكــم
ســرٍّ
أبحــن
لكــاتم
|
|
دُمــىً
طالمـا
أجـرت
لواحظهـا
دمـاً
|
فيالســـواج
مـــا
رثــت
لســواجم
|
|
مهـىً
لـم
تـزل
تهمـي
نـوافث
سحرها
|
مـن
الفـاترات
السـود
بيض
الصوارم
|
|
هــززن
قــدوداً
كالغصــون
نواضـراً
|
ولحــن
بـدوراً
فـي
دجـى
كـل
فـاحم
|
|
وأومضــن
إيمــاض
الـبروق
بواسـماً
|
فحلـت
فريـد
الـدر
فـي
سـلك
نـاظم
|
|
وريــان
مــن
مـاء
الشـباب
كأنمـا
|
حــرام
عليــه
نقــع
غلــة
حــائم
|
|
إذا
فــوّقت
نحــوي
ســهام
لحــاظه
|
أغـار
علـى
قتلـي
بهـا
مـن
مسـاهم
|
|
حمــى
طرفــه
مــن
مقلـتي
بجفـونه
|
فللَّــه
غمــد
ذبَّ
عــن
حــدِّ
صــارم
|
|
ورد
علــى
الثغــر
اللثـام
فحبـذا
|
جنـى
الأقحـوان
الغـض
تحـت
الكمائم
|
|
غــدا
آمنــاً
كيــد
العيـون
لأنهـا
|
علــى
خصــره
قـد
علقـت
كالتمـائم
|
|
عقـــارب
صــدغيه
حمــت
ورد
خــده
|
ولـو
أرسـلت
كـان
احتمـى
بـالأراقم
|
|
أظــن
ظُبَــا
أَلْحَــاظِه
ســفكت
دَمِـي
|
وأغلــب
ظنــي
أننــي
غيــر
واهـم
|
|
أمــا
وكمــون
السـحر
فـي
لحظـاته
|
لقـد
سـار
فـي
العشـاق
سـيرة
ظالم
|
|
وليــل
طــويت
البيـد
فيـه
وبـدره
|
مـع
الشـهب
كالـدينار
بين
الدراهم
|
|
تـــدرعته
حيـــث
المطــيُّ
ســفائن
|
تشــقُّ
بنــا
فــي
بحــره
المتلاطـم
|
|
وقــدَّتْ
أديــم
الأرض
أخفــافُ
ضــُمَّر
|
ترامــت
بأمثــال
الســهام
سـواهم
|
|
إلى
الظاهر
الغازي
الذي
عزَّ
أن
يُرَى
|
لـه
مـن
مقـاوٍ
فـي
الورى
أو
مقاوم
|
|
ولــم
تعتصـم
دون
الملـوك
مطـالبي
|
بغيـر
غيـاث
الـدين
حـامي
العواصم
|
|
مليـــك
إذا
حــدثت
عــن
ســطواته
|
يقـول
النـدى
أذكـر
حـديث
المكارم
|
|
سـطا
أقـدع
العمريـن
بأسـاً
ونجـدةً
|
وجــاد
فخـذ
فـي
غيـر
كعـب
وحـاتم
|
|
لقيــت
بــه
صـرف
الزمـان
محاربـاً
|
فعــاد
كمــا
آثــرتُ
وهـو
مسـالمي
|
|
خــبير
بتـدبير
الممالـك
مـا
دنـا
|
إلـــى
رعيهــا
إلا
بمقلــة
حــازم
|
|
إذا
ركبــت
يمنــاه
قــائم
ســيفه
|
تَرَجَّــلُ
هامــات
الملــوك
القمـاقم
|
|
وإن
شـيم
بـرق
الجـود
فـي
قسـماته
|
أتــت
كفــه
بالعــارض
المــتراكم
|
|
جــرى
المجــد
فـي
أعطـافه
فكـأنه
|
زلالٌ
جــرى
فــي
عطــف
ريّـان
نـاعم
|
|
رصـين
حصـاة
الحلـم
مُسْتَحْصـِد
القوى
|
بعيـد
مرامـي
الفكـر
ماضي
العزائم
|
|
يســدّ
مهــب
العاصــفات
إذا
ســرى
|
نســيم
الصـبا
بالمُقْرِبـات
الصـلادم
|
|
ولا
ينتضـــي
يـــوم
الجلاد
ســيوفه
|
فتغمــد
إلا
فــي
الطُّلـى
والجمـاجم
|
|
وقـــائعه
صــيد
الملــوك
تــذمها
|
وتثنــي
عليهــا
كاسـرات
القشـاعم
|
|
إذا
اسـودَّ
ليـل
النقـع
جلَّـى
ظلامـه
|
بـــبيض
ســيوف
أو
بــروق
لهــاذم
|
|
وإن
هيجتـــه
نحــو
ملــك
حفيظــة
|
رأى
فرصـــة
الإقـــدام
ضــربة
لازم
|
|
جفــا
جفنــه
طيـبُ
الرقـاد
لعلمـه
|
ببعـد
مـرام
الحـزم
عـن
كـل
نـائم
|
|
وكيـف
ينـام
الليـل
مـن
بـات
همـه
|
طلاب
المعــالي
مــن
شـدوق
الأراقـم
|
|
أحامـــل
أثقــال
العلا
دون
معشــر
|
يـرون
احتمـال
المجد
إحدى
المغارم
|
|
نهضـت
بمـا
أعيـا
الملـوك
ولم
يفز
|
بمــا
نلــت
إلا
نــاهض
بالعظــائم
|
|
فللَّــــه
طــــود
منــــك
يغـــدو
|
وعيـد
العـدا
مثـل
الرياح
النواسم
|
|
قــدير
علــى
نفـع
الأعـادي
وضـرّها
|
بجــزّ
النواصــي
أو
بحــزّ
الغلاصـم
|
|
لـك
اللـه
مـن
كـافٍ
لراجيـك
كافـلٍ
|
لنيــل
المنـى
غـاشٍ
لشـانيك
غاشـم
|
|
تقــوم
بمـا
يرضـى
الهـدى
متجشـماً
|
بنفســك
ضــنك
المــأزق
المتلاحــم
|
|
تهـاب
أسـود
الغـاب
بأسك
في
الوغى
|
وتخجــل
مـن
جـدواك
صـوب
الغمـائم
|
|
وكـم
حسـاد
لـي
كـان
قبـل
إقـامتي
|
ببابــك
يبــدي
لــي
توجــع
راحـم
|
|
بســطت
لــه
عــذراً
وأيقنــت
أنـه
|
ســَيَقْرع
فيمــا
ســرني
ســنَّ
نـادم
|
|
لأنــي
أرى
الأغصــان
تسـقى
إذا
ذوت
|
فـإن
أثمـرت
لـم
تخـل
عن
رجم
راجم
|
|
فيـا
خيـر
مـن
سـاس
الملـوك
بعدله
|
فأمسـى
بـه
الإسـلام
سـامي
الـدعائم
|
|
تلــقَّ
القــوافي
الشـاردات
كأنهـا
|
فــرائد
أبكــار
النجـوم
العـواتم
|
|
تولــد
فــي
صــرف
المدامـة
نشـوة
|
وتحــدث
شـجواً
فـي
هـديل
الحمـائم
|
|
فلا
زلــت
يـا
أزكـى
الملـوك
سـجية
|
وأعــدل
مـن
يجـري
لكشـف
المظـالم
|
|
شــهاباً
لمســتهد
وأمنــاً
لخــائف
|
وكنـــزاً
لمســتجد
وريّــاً
لحــائم
|