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لــو
ســرت
فــي
أجـم
يـا
ضـيغم
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أبــت
الحميّــة
أن
يفوتـك
مغنـم
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وتقهقــرت
عنـك
العـدا
وتقاصـرت
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دون
المــدى
تشـكو
الكلاَل
وتسـأم
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لكــن
وثقــت
وقـد
علقـت
بمعشـر
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يـا
ليتهـم
لم
ينقضوا
ما
أبرموا
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يـا
ليـت
شـعري
لِمْ
ثنوك
عن
التي
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لـو
قلتـمُ
هـي
إرثنـا
لم
تظلموا
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أيْهُــم
أقـر
المصـطفى
فـي
يـثرب
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وأبــوك
فــرج
كُـرب
مكـة
أم
هـمُ
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مـن
ذب
عـن
قـبر
النـبيّ
وقد
سرت
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أمــم
الضــلالة
نحـوه
واسـتلأموا
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لـو
لـم
يَغَـرْ
للـه
كـانت
أُزعِجَـت
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فـي
حفـرة
المختـار
تلـك
الأعظـم
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أســواه
أجـرى
خيلـه
فجـرى
إلـى
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نصـر
الهـدى
حِصـْناً
بهـا
يَسْتَعْصـِمُ
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فيهـا
الكمـاة
المُعْلَمـون
وقلَّ
من
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تلقــاه
مـن
خـوف
المنيـة
مُعلَـم
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فتخــاذلت
عصـب
الصـليب
وأدبـرت
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جــبراً
ونهــج
نجاتهــا
مسـتبهم
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بعــض
تَعَـضُّ
بـه
القيـود
وبعضـهم
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ملقــى
تمزقــه
النســور
الحُـوَّمُ
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ســير
نمــت
آثارهــا
فحــديثها
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يُـروى
إذا
جَمَـعَ
الحجيـجَ
الموسـمُ
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وعُلاً
أراد
اللــه
أن
تبقــى
علـى
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أبنـــائه
حــتى
يــزول
يلملــم
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فاحمـد
إلهـك
إذ
قـدمت
ولـم
يُرَق
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فــي
بيتــه
دم
مســلم
يستســلم
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إن
يحــرم
الحرمـان
منـك
غمامـةً
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فغــدير
فضــلك
بالمدينـة
منعـم
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أجبنــت
لا
واللــه
ليســت
شـيمة
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لـك
يـا
ابـن
يوسف
والقنا
يتحطم
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أم
حــدت
عـن
حـرب
وصـيتك
وحـده
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جيــش
يــردُّ
الجيـش
وهـو
عرمـرم
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حاشــا
وكلا
بــل
أراد
اللــه
أن
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يفضــي
إليــك
بسـر
مـا
لا
تعلـم
|
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لـك
فـي
رسـول
اللـه
أعظـم
أسوة
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عنهــا
أحــاديث
الـرواة
تـترجم
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قــد
صـدَّ
عـن
حـرم
الإلـه
وقلبـه
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فيـــه
كقلبـــك
جمــرةٌ
تَتَضــرَّمُ
|
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فــأراه
عـام
الفتـح
موعـد
ربـه
|
حقّـاً
كمـا
نطـق
الكتـاب
المحكـم
|
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وكــذاك
أنـت
وتلـك
بشـرى
واثـق
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بالنصـر
يعضـدها
القضـاء
المبرم
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فســطاك
تكفـل
عنـك
يومـاً
بعـده
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لا
أعتـــب
الـــدنيا
ولا
أتظلــم
|
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واللــه
لا
ضــاعت
صـنائعك
الـتي
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جُبِـرَ
الكسـير
بهـا
وأثرى
المعدم
|
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وعصــابة
خفــت
إليــك
خيــولهم
|
فتقـدموا
وعلـى
المهيمـن
أقدموا
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جــــاؤوك
بــــالبيض
تقلهــــم
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جــرد
الجيـاد
وأنـت
عـار
محـرم
|
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حـــتى
كــأنهم
ببــدر
حــاولوا
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إخفــاء
بـدر
منـك
لكـن
أحجمـوا
|
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قسـماً
بمـا
لـك
مـن
جسـام
مواهب
|
ومنـــاقب
لا
تـــدعيها
الأنجـــم
|
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لـو
لـم
تعـذ
برصين
حلمك
والتقى
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كـــانت
أنـــوفٌ
دون
ردك
ترغــم
|
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أعْــداك
ديــن
مـن
أبيـك
ورثتـه
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أن
يســتباح
بحــدِّ
ســيفك
محـرم
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فرجعــت
لـم
يهتـك
لحرمـة
بيتـه
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ســَتْرٌ
ولــم
يســفك
بكعبتــه
دم
|
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فاستشــعرت
تلـك
المشـاعر
وحشـة
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وبكــى
لعودتــك
الحطيـم
وزمـزم
|
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ولـو
أن
عنـدك
بعض
ما
قد
دار
في
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تلــك
الخــواطر
منهـم
وتوهمـوا
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لرحلــت
عــن
حلـب
بشـهب
كتـائب
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وجــه
الســماء
بنقعهــا
متلثـم
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ولمــدك
الغـازي
الغيـاث
بجحفـل
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يمضــي
بمـا
تقضـي
عليـه
وتحكـم
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ولأذعنــت
عــدن
لبأســك
واغتـدت
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صـنعاء
أقصـى
سـؤلها
أن
تُقْـدِموا
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أمظفــر
الــدين
الــذي
أوصـافه
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مـا
زال
ينشـرها
الثنـاء
فَيُفْعِـم
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خــذها
مجــوهرة
كــأن
بيوتهــا
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درّ
علــى
أجيــاد
مجــدك
ينظــم
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واسـلم
لمـا
تهـوى
فأقصـى
منيـة
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يعتـــدها
الإســلام
أنــك
تســلم
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والأرض
مرجعهــــــا
إليكــــــم
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والذي
يتلوه
فيكم
بالسعادة
يختم
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فبقيتــم
مــا
لاح
بــرق
واغتـدت
|
ورق
علـــى
أوراقهـــا
تـــترنم
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وســــلمتم
للآمليــــن
فـــأنتم
|
أمنــاً
إلــى
كـل
الممالـك
سـلم
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