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سـل
الخطـب
إن
أصـغى
إلى
من
يخاطبه
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لمـــن
علقـــت
أنيــابه
ومخــالبه
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نشـــدتك
عـــاتبه
علــى
نائبــاته
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وإن
كـان
نـائي
السـمع
عمـن
يعاتبه
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لــي
اللـه
كـم
أرمـي
بطرفـي
ضـلاله
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إلـى
أفـقٍ
مَجْـدٍ
قـد
تهـاوت
كـواكبه
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فمـالي
أرى
الشـهباء
قـد
حال
صبحها
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علـــيَّ
دجـــىً
لا
تســتنير
غيــاهبه
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أحقـاً
حِمـى
الغـازي
الغياث
بن
يوسف
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أبيـــح
وعــادت
خائبــات
كتــائبه
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نعــم
كُـوِّرت
شـمس
المـدائح
وانطـوت
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ســماء
العلا
والنُّحـج
ضـاقت
مـذاهبه
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فمـن
مخـبري
عـن
ذلـك
الطود
هل
وهت
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قواعـــده
أو
لان
للخطـــب
جـــانبه
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أجــلْ
ضــعفت
بعـد
الثبـات
وزعزعـت
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بريــح
المنايـا
العاصـفات
منـاكبه
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وغُيِّـضَ
ذاك
البحـر
مـن
بعـد
مـا
طمت
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وَطَمَّـــتْ
لغشـــيان
البلاد
غـــواربه
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فشـــلت
يميـــن
الخطــب
أي
مهنــد
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برغــم
العلا
ســلت
فقلــت
مضــاربه
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لئن
حُبِــسَ
الغيــث
الغيــاثيُّ
قطـره
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فقــد
ســَحَبَتْ
فـي
كـل
قطـر
سـحائبه
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فـأين
يَكُـد
العيـس
بعـد
ابـن
يوسـف
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أخــو
أمــل
أكــدت
عليــه
مطـالبه
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فلا
أدركـــت
نيـــل
العلا
طلبـــاته
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ولا
بركــت
فــي
أرض
أمــن
ركــائبه
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ولا
انتجعــــت
إلا
معيــــس
حقبـــة
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مـن
الجـدب
لا
يُثْنَـى
عليهـا
حقـائبه
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مضـى
مـن
أقـام
العـدل
فـي
ظل
عدله
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وآمـــن
مــن
خطــب
يَــدِبُّ
عقــاربه
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فكــم
مـن
حمـى
صـعب
أبـاحت
سـيوفه
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ومــن
مســتباح
قــد
حمتـه
مـواكبه
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أرى
اليـوم
دسـت
الملـك
أصبح
خاوياً
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أمــا
فيكـم
مـن
مخـبر
أيـن
صـاحبه
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فمـن
سـائلي
عـن
سائل
الدمع
لِمْ
جرى
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لعـــل
فــؤادي
بــالوجيب
يجــاوبه
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فكــم
مــن
نـدوب
فـي
قلـوب
نضـيحة
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بنـــا
وكـــروب
أججتهــا
نــوادبه
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أيُســْلَم
لــم
تحطــم
صــدور
رمـاحه
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بــذبٍ
ولــم
تثلــم
بضــرب
قواضـبه
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ولا
اصــطدمت
عنــد
الحــروب
كمـاته
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ولا
ازدحمــت
بيــن
الصـفوف
جنـائبه
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ولا
ســيم
أخــذ
الثـأر
يـوم
كريهـة
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تشــق
مثــار
النقــع
فيهـا
سـلاهبه
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أيـا
ملبسـي
ثوبـاً
مـن
الحزن
مُسْبَلاً
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أيحســـن
بــي
أنَّ
التَّســَلِّي
ســالبه
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خــدمتك
روض
المجــد
تضــفو
ظلالــه
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علــيّ
وحــوض
الجـود
تصـفو
مشـاربه
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وقــد
كنــت
تـدنيني
وترفـع
مجلسـي
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لمقــروض
مــدح
مــا
تعـداك
واجبـه
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فمـا
بـال
إذنـي
قـد
تمادى
ولم
يكن
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إذا
جئت
يثنينـي
عـن
البـاب
حـاجبه
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أرى
الشـمس
أخفـت
يـوم
فقـدك
نورها
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فلا
كــان
يـوم
كاشـف
الـوجه
شـاحبه
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فكيــف
نبـا
سـيف
اعتزامـك
أو
كبـا
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جـواد
مـن
الحـزم
الـذي
أنـت
راكبه
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فمــن
لليتــامى
يـا
غيـاث
يغيثهـم
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إذا
الغيم
لم
ينقع
صدا
العام
ساكبه
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ومـــن
لملـــوك
كنـــت
ظلاً
عليهــم
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ظليلاً
إذا
مـا
الـدهر
نـابت
نـوائبه
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فيــا
تـاركي
ألقـى
العـدو
مسـالماً
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مــتى
ســاءني
بالجــد
قمـت
ألاعبـه
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ســقت
قـبرك
الغـر
الغـوادي
وجـاده
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مــن
الغيـث
سـاريه
الملـثُّ
وسـاربه
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فـإن
يـك
نـور
مـن
شـهابك
قـد
خبـا
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فيـا
طالمـا
جلـى
دجـى
الليل
ثاقبه
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فقــد
لاح
بالملــك
العزيــز
محمــد
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صــباح
هــدىً
كنَّــا
زمانـاً
نراقبـه
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فــتى
لــم
يفتــه
مـن
أبيـه
وجـده
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إبــاءٌ
وجــد
غالبــاً
مــن
يغـالبه
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ومـن
كـان
فـي
المسـعى
أبـوه
دليله
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تـدانى
لـه
الشـأو
الـذي
هـو
طالبه
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وبالصـــالح
اســتعلى
صــلاح
رعيــة
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لهــا
منـه
رَعْـيٌ
ليـس
يقلـع
راتبـه
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فحســب
الــورى
مــن
أحمــد
ومحمـد
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مليكــان
مــن
عاداهمــا
ذل
جـانبه
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همـا
أحـرزا
عليـاء
غـازي
بـن
يوسف
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ومـا
ضـيَّعَا
المجـد
الـذي
هـو
كاسبه
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فــأفق
العلـى
لولاهمـا
كـان
أظلمـت
|
مشـــارقه
مـــن
بعـــده
ومغــاربه
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سـتحمي
علـى
رغـم
الليـالي
حماهمـا
|
عــوالي
قنـاً
تـردي
الأسـود
ثعـالبه
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فكــم
مــن
ملــم
جــل
موقـع
خطبـه
|
فســـاءت
مبــاديه
وســرت
عــواقبه
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فيــا
قَمَــرَيْ
سـعد
أطلا
علـى
الـدجى
|
فـولَّى
ومـا
ألْـوَى
علـى
الأفـق
هاربه
|
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أيمكــث
بالشــهبا
عبيــد
أبيكمــا
|
ومــــادحه
أو
تســــتقل
نجـــائبه
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فــإن
شـئتما
بعـد
الغيـاث
أغثتمـا
|
مصـــاب
فـــؤاد
فوقتهــا
مصــائبه
|
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كـأنْ
لـم
أقـف
أجلـو
التهاني
أمامه
|
وتضــحك
فــي
وجـه
الأمـاني
مـواهبه
|
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فهُنِّئتمـــا
مــا
نلتمــا
وبقيتمــا
|
لإحـــراز
ملـــك
ســاميات
مراتبــه
|