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لمــن
الأسـود
عرينهـا
أَشـِبُ
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تحـت
البنـود
تظلهـا
العُذُب
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ولمــن
خيــام
لا
تشـد
لهـا
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بسـوى
أنـابيب
القنـا
طُنُـب
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حيـث
الصـقور
تقـل
أسد
شرى
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غلـب
الطُّلـى
عاداتها
الغَلب
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لا
غـرو
تسـتخفي
البدور
إذا
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رفعـت
لنـا
مـن
دونه
الحُجُب
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للظـاهر
الغـازي
الذي
شرفت
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بزمــانه
الأزمــان
والحقـب
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يبــدو
فتطـرق
مـن
مهـابته
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فكأنمــا
هــو
عنـك
محتجـب
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فــإذا
تَجَلَّــى
نـور
طلعتـه
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فاســجد
لعلـك
منـه
تقـترب
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فَلَثَــمَّ
ســِرِّ
اللــه
طـاعته
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نزلـت
بهـا
الآيـات
والكتـب
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وثــم
ظــل
اللــه
مفزعنـا
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فـي
النائبـات
إليه
والهرب
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جَبَــل
القلـوب
علـى
محبتـه
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فبطبعهـــن
إليــه
تنجــذب
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فلزومهــا
أســباب
طــاعته
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بيــن
الإلَــه
وبينــه
سـبب
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فــالفوز
والزلفـى
لقاصـده
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ولحاســديه
الويـل
والحَـرَب
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عجــبي
لــذُبَّله
وقـد
سـقيت
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مـاء
الطُّلـى
ومتونهـا
سـُلُب
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ولبيضـه
وهـي
الـذكور
ومـا
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برحــت
تحيـض
دمـاً
وتختضـب
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عشــقت
رقـاب
عـداته
فوشـى
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بجســومها
سـقم
هـو
السـطب
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فـإذا
جـرى
ذكر
الوصال
لها
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كــادت
مـن
الأغمـاد
تنسـكب
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تبكــي
وتشـكو
حـر
لوعتهـا
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فيجـول
فيهـا
الماء
واللهب
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مــا
زال
كــل
مـن
مخـافته
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يمشـي
وحشـو
فـؤاده
الرعُـب
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حــتى
حسـبت
الريـح
خافقـة
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فـي
الجـو
خـوف
سطاه
تضطرب
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ملــك
ثنــا
أفضــاله
حـرم
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حجـت
إليـه
العُجـم
والعـرب
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يســتمطرون
ســناء
نــائله
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فيجــودهم
منهـا
حيـا
سـكب
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وفـدوا
ولـو
وجدوا
لفاقتهم
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شـوك
القتـاد
جنوه
واحتطوا
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ورجـوا
وأقصـى
سـؤلهم
دَعَـة
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مــا
بعــدها
نــص
ولا
نصـب
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ومضـوا
وأدنـى
ما
أفيض
لهم
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مـن
راحـتيه
فـوق
ما
حسبوا
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بخلــت
وقـد
سـمحت
أنـامله
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منهـا
البحـار
وغارت
السحب
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فوشـى
بِتِلْـكَ
الهيـج
حاسـده
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لمـا
اسـتمر
بجهـده
الصـخب
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ولكــم
رحــى
حـرب
بعزمتـه
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دارت
وصــارمه
لهــا
قُطــب
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إِن
قوتلوا
قَتَلوا
وإن
سئلوا
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بذلوا
وإن
هم
غولبوا
غَلَبوا
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أُســْدٌ
ولكـن
مـا
لهـم
أَجَـم
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إلا
الصـوارم
والقنـا
الأَشـِب
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تتفجــر
الأرزاق
إن
نزلــوا
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وتزلــزل
الآفـاق
إن
ركبـوا
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فــي
جحفــل
لجــب
لخشـيته
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فــي
كــل
أرض
جحفــل
لجـب
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يختــال
فــي
غابـاته
أسـدٌ
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سـَلَبَ
الأسـود
ومـاله
سـلبوا
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ذا
الملــك
واضــحة
أدلتـه
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لا
مـا
روى
قـوم
ومـا
كتبوا
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أعلــى
مبــانيه
أخـو
همـم
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مـا
فـوق
رتبـة
مجـدها
رتب
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تكبـو
الـدوائر
دون
مركـزه
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وتحــط
عـن
شـهبائه
الشـهب
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ولقــد
أقــول
لآمــل
وخـدت
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برجــائه
المهريــة
النجـب
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قطعتـــه
ظهــر
الفلا
همــم
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جـد
السـرى
فـي
جنبهـا
لعب
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لا
يســـتقر
قـــراره
ثقــة
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إن
الغنــى
بالسـعي
يكتسـب
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ضــيعت
نفسـك
والمطـي
ومـا
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أغنـــاك
نشــدانٌ
ولا
طلــب
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أبْعــدْت
مُنْتجِعـاً
سـراب
فلاً
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والبحــر
دونــك
ورده
كثـب
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أسـوى
ابن
يوسف
تبتغي
ملكاً
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يؤويـك
حيـن
تنوبـك
النـوب
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شـِمْ
بالخيـام
بـروق
أنعمـه
|
لا
أَوحشــت
مـن
نوئهـا
حلـب
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ملـك
بشـد
الملـك
قـام
وما
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حلــت
تمــائمه
ولا
الســخب
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برواقــه
الممــدود
مشـتمل
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بتــاجه
المعقــود
معتصــب
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يـا
أيهـا
الملك
الذي
عجزت
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عـن
وصـفه
الأشـعار
والخطـب
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خـذ
في
الذي
تهوي
ودع
نفراً
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صــدق
الأمـاني
عنـدهم
كـذب
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فلقـد
أَرَحْـتَ
ولـم
تعـد
يدا
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قومـاً
بهـم
يستحسـن
التعـب
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فيقيــن
فكــرك
لا
يخــالطه
|
فكـــر
ولا
تعتـــاده
ريــب
|
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فالنصـر
مُرْتقِـبٌ
بحيـث
مـتى
|
نـــاديته
والأمــر
مرتقــب
|
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للــه
حلمــك
أيمــا
جبــل
|
مـا
قيـل
يومـاً
هـزه
الغضب
|
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أحييـت
ميـت
مقاصـدي
بنـدىً
|
لــولاه
ضــم
عظـامي
التُّـرَب
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وأجرتنــي
والحادثـات
لهـا
|
مـن
خَلْفِـيَ
التقريـب
والجنب
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فعلام
لا
أثنــي
عليــك
كمـا
|
أثنـى
على
صوب
الحيا
العشب
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فاسـلم
لنصـرة
دولـة
أبـداً
|
تضـفو
عليـك
برودهـا
القشب
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