|
أمـا
والهوى"مـا
كنت"
مـذ
بـان
عهـدُهُ
|
أهيـــم
بلقيـــا
مَـــنْ
تنـــاثرَ
ودُّهُ
|
|
رعى
الله
من
"لو
أنصف"
الصب
في
الهوى
|
لمـا
فـاض
منـه
الـدمع
مـذ
بـان
صـدُّهُ
|
|
و
لــو
جـاد
من"بعـد
المطـال"
بـزورة
|
لمـــا
شــبَّ
أشــواقي
وقلــبيَ
زنــدُهُ
|
|
كمــا
خـان
صـبري
يـوم
أصـبح
و"اصـطلى
|
لظى"
زاد
مـــاءً
مـــن
جفــوني
وقــدُهُ
|
|
لــذلك
أســال
الــدمع
كالــدر
مـدمعي
|
مـن
"الوجـد"
فاسـتولى
على
الجفن
سهدُهُ
|
|
حكــى
لؤلــؤاً
مــن
ســلكه
متنــاثرا
|
و
"إلاّ
ليمٍّ"
قــــد
تتــــابع
مــــدُّهُ
|
|
ذخــرت
الثميــن
القــدر
منـه
بمقلـتي
|
و
مــا
زلـت
مـن
خـوف
"النكـال"
أعـدُّه
|
|
و
لا
عجــب
مــذ
أعـوز
القـرب
أنْ
غـدا
|
و
"كــالقمر
الــزاهي"
ســناه
وبُعـدُه
|
|
أيلحــق
باللقيـا
أو
الوصـل
مـن
يغـو
|
ر
"فــي
نــوره"
بـدر
السـماء
وجنـدُهُ
|
|
و
صــــير
جســــمي
للصـــبابة
والتلا
|
قـــي
يتــم
قلــبي
إذ
تمكــن
وجــدُه
|
|
أقطــــع
أنفاســـي
"عليـــه
كآبـــة"
|
فللـــه
مـــن
بـــدر
لغيـــري
ســعدُهُ
|
|
فمِـنْ
شـَعْره
"الليـل
البهيم"
ومـن
سـنى
|
مُقَبَّلــــه
للحســــن
نــــورٌ
يمــــدُّه
|
|
بحكــم
"الــدلال"
الجــور
حُكِّــم
جـورُه
|
و
مــــن
شـــأنه
ألا
قريـــنَ
يـــردُّه
|
|
لــه
معطــف
"مستحســن
القــد"
نــاعم
|
بــه
علقــت
فـي
الحـب
بـالرغم
أُسـْدُه
|
|
رمــى
فــي
فـؤادي
جمـراً
"ذكى"
لهيبـه
|
بـــه
ظــبيُ
أنــس
قــد
تلهــب
خــدُه
|
|
فيعبـق
مـن
نـار
الحيـا
عـاطر
"الشـذا
|
كــأني"
بــذاك
الخــال
قــد
نـمَّ
نـدُّه
|
|
و
يبـــدو
بآفـــاق
الجمـــال
هلالـــه
|
لــه
"الليــل
فـرعٌ"
والكـواكب
عقـدُه
|
|
كـأنَّ
الظـبىَ
فـي
مرتـع
الطـرف
لحظـه
|
كـأنَّ
"القنـا
في"
الليـن
والفعـل
قـدُّه
|
|
يــروق
العيــون
العطــف
منـه
فشـبهت
|
بــه
قضــب
ألبــان
"اعتـدال"
ومُلـدُه
|
|
و
يــا
نعـم
ورد
الخـد
لـو
جـاز
قطفـه
|
و
طيــب
رحيــق
الثغــر
لـو
حـل
وِردُه
|
|
يجـــول
بــه
ريــقٌ
"شــهي"
يحيلنــي
|
إليـه
لظـىً
فـي
القلـب
قـد
شـب
وقـدُه
|
|
و
يحمــي
المحيــا
و"اللمى"
بلــواحظ
|
عـــن
الــدنف
المغــرى
بــه
فتصــدُّه
|
|
فللـــه
مـــن
ريـــم
ضــلوعي
كناســُه
|
و
روض
يُســـَقِّيه
مـــن
الــدمع
عهــدُه
|
|
و
يمنــع
منــه
المســتهام
فمـا
لـه
|
و
"فـي
لثمه"
لـو
جـاد
بـاللثم
قصـدُه
|
|
و
بالحســن
منـه
يسـتبيح
حمـى
النهـى
|
و
"كـان
المنـى
واليمـن
يحـويه
بُـردُه
|
|
و
يلـوي
بـدَيني
فـي
الهـوى
وهـو
موسـر
|
لــه
در
ثغــر
"لــو
ينــال"
وعقـدُه
|
|
أفــي
العـدل
أن
يحكـم
بتحريـم
ريقـه
|
لأن
"كــــان
للشــــهد
المعلـــل
وردُه
|
|
تخيلتـه
لـو
نيـل
بـالنهب
فـي
الكـرى
|
"و
مـا
ذقتـه
يشـفي
مـن
السـقم
شـهدُه
|
|
فــأجنى
كمــا
شـاء
الوصـال
"رضـابه"
|
و
يجنــي
علــى
قلــبي
هــواه
وصــدُه
|
|
و
يشـفي
بـذلك
المبسـم
"العـذب"
ريقه
|
فـــؤادي
إذ
يشـــفي
بلثمـــي
خــدُه
|
|
و
حلـو
"الجنى"
مـر
الجفـا
باهر
السنى
|
لــه
نهــب
هــذا
القلــب
قسـرا
وردُّه
|
|
بـدا
"فـي
المثـال"
كـالغزال
محاسـناً
|
و
تخشـــاه
أبطــال
العريــن
وأســدُه
|
|
و
للحــب
يــدعو
لحظــه
الأوطـف
الـورى
|
ألا
هكــــذا
قلـــب
المشـــوق
أقـــدُه
|
|
تملــك
رقــى
طرفــه
"مــع
ســقمه"
|
و
بالشــرع
فــي
حكــم
الغـرام
يـردُه
|
|
و
أظهـر
مكنـون
الهوى
منذ
جار
في
أل
|
معنّـى
الـذي
قـد
طـال
فـي
الحـب
جهدُه
|
|
و
قـد
كـان
تحـت
الكتـم
عـذريُّ
ووجـده
|
فأســهر
منــه
مــا
اختفـى
قبـلُ
صـدُّه
|
|
و
يحســبه
فـي
الحكـم
بـالجور
كـالورى
|
و
ل
بالســـليم
القلـــب
يحســب
ضــدُه
|
|
إذا
بـــالظنون
الكاذبـــات
ينـــاله
|
ينـــام
فكــم
عــم
الليــاليَ
ســهده
|
|
يلــــوح
ســـناه
للمشـــوق
وقربـــه
|
عليــــه
حــــرام
إذ
يحلـــل
بعـــدُه
|
|
و
فــي
مجتلاه
البـاهر
الحسـن
والـروا
|
حيــاتي،
وشــبه
القتـل
للنفـس
فقـدُه
|
|
و
أنعــش
بالإنصــاف
"مهمــا
بـدا"
وإنْ
|
أرى
منــه
ظلمــاً
عـاود
القلـب
وجـدُه
|
|
و
يبـديه
نـور
الحسـن
وهنـاً
"لمقلـتي"
|
و
يخفيــه
فــرعٌ
فــاحمُ
الوصـف
جَعْـدُه
|
|
يميــل
علــى
المشــتاق
بـالهجر
حكمُـه
|
فمنــه
اســتعار
الميــل
عنــيَ
قــدُه
|
|
فيــا
هــاجري
"والصــد"
للصـبِّ
قاتـل
|
و
روض
"نعيمي"
فـــي
رضـــاك
وخلــدُه
|
|
أمـــا
"والفتــون"
البــابلي
وســحره
|
ليقنعنـــي
هـــزل
"الوصـــال"
وجِــدُّه
|
|
و
يــا
مقــولي
"مــالي
ســواك"
مـؤزر
|
ف"خــل
الهـوى
وامـدح"
لمـن
حـق
حمـدُه
|
|
فصـغ
لؤلـؤءاً
مـن
"مـدحيَ
ابن"
ملوكنـا
|
"إمـام
الـورى"
الباهي
على
الخلق
رفدُه
|
|
مــن
أورثــه
الملــك
المؤصـل
"نصـر"ه
|
و
أكســـبه
المجـــد
المؤثّـــلَ
ســعدُه
|
|
لبـاب
العلـى
"قطـب
المعـالي"
وتاجهـا
|
و
بـدر
الهـدى
الوضـاح
فـي
الدهر
سعدُه
|
|
بـه
قـد
غـدا
ثغـر
"الهـدى"
وهو
باسم
|
منيـــر
ســـناه
مشــرق
الأفــق
ســعدُه
|
|
"و"
أضـحى
"الكمـال
طـود"ه
فـإنِ
اعتدى
|
علــى
البــدر
نقــص
فــالجبين
يمــدُّه
|
|
و
مهمـا
عفـا
عـاد
"الحجـا"
وهـو
قائل
|
ك"ذا
الحلــم
والصــفح"
الـذي
أسـتعدُّه
|
|
و
بالشــم
يــزرى
عقلـه
"الأرجح"
الـذي
|
لنحـــو
المعـــالي
والمجــادة
قصــدُه
|
|
فمعنــى
الحلــى
تهــديه
للقلـب
ذاتـه
|
و
"ســر
العلى"
يبــديه
للعيــن
مجـدُه
|
|
و
مــن
كفــه
"غيــث
النـدى"
وغمـامه
|
و
"معنــى
الســماح
"المسـتماح
ورغـدُه
|
|
إذا
انهـل
منـه
"الواكـف
ال"ثـر
للورى
|
فصــف"و
النـدى"
والجـود
قـد
لـذّ
وِردُه
|
|
تخــال
"هتــون"
البــذل
منهــن
زائلا
|
يكفيّـــــه
بــــرق"
الجلال"
ورعــــدُه
|
|
و
كــل
"نــوال
ه"امــل
مــن
بنــانه
|
فأقصـى
صـفات
الجـود
"قـد
جـاز"
جـودُه
|
|
و
فيــض
نــداه
"يشــرح"
الحــال
إنـه
|
يمــد
الحيــا
فـي
"السـمحُ
إذ
يسـتمدُّه
|
|
"و"
فـي
غيثـه
الثجاج
"للمعتفي"
الغنى
|
إذا
ب"الأيـــادي"
منــه
يبــدأ
رفــدُه
|
|
و
للفضــل
والإحســان
والبــأس
"سـبق"ه
|
و
للملـــك
والإســـلام
والعلــم
عضــدُه
|
|
و
أفعـاله
عنـد
اسـتباق
"المـدا"
شـأت
|
و
فعـــل
"ظُبـــاه
با"لكمــاة
وجُــردُه
|
|
لـــه
مشـــرفي
"دائم
ال"قطـــع
للطلا
|
فكـــل
كمـــي
ل"لعـــدا
في"ه
فقـــدُه
|
|
و
بيـن
"سـكون"
فـي
النـديِّ
مـن
الحجا
|
"و"
بيـــن
مضـــا
ب"القتــال"
يعــدُّه
|
|
و
زيّنـــه
مـــن
"قصــده
الجمع"
للعلا
|
كمــا
زيــن
ا"لســيف"
الصـقيل
فرنـدُه
|
|
و
حـــزم
وعــزم
"بيــن
بِكــر"
وثيّــبٍ
|
ب"ه
المـــرهف"
الماضــي
يُفلَّــلُ
حــدُّه
|
|
فيــومُ
النــدى
الإســلامُ
يســعد
دهـرُه
|
و
"يــوم
الــوغى"
الإشـراكُ
يَتعَـسُ
جـدُّه
|
|
و
مـن
بأسـمه
"أضـحى
الحمـا
م"تمنعـاً
|
و
"للفخـــر"
منـــه
صـــارم
يســتعدُّه
|
|
و
تمســي
عــداه
"كــالحميم"
شـرابهم
|
و
مــا
شــيدوا
"فــي
دهــره"
فيهــدُّه
|
|
و
يغـدو
"المـوال"ي
"في"
سـرور
وغبطـة
|
مــن
البشــر
أبكــار
"وعــون"
تــودُّه
|
|
قـد
اعتـاد
"تـرك
الكـافر"ين
وشـأنهم
|
لهيــب
"وشــأن
ه"امــل
الــدمع
وردُه
|
|
فأبطــالهم
"رهـن
الفنـا"ء
"و"مـالهم
|
إلــى
"البــذل"
عقبــاه
وبالسـيف
ردُّه
|
|
و
لـم
يبـق
إلاّ
مـن
حمى
الحسنَ
"للعطا"
|
و
شـــفع
فــي
أح"يــا"ئه
منــه
خــدُّه
|
|
و
أصــبح
فـي
العليـاء
"كـالبحر"
كفـه
|
كمــا
"قـد
غـدا
مثـل
ال"جـواهر
رفـدُه
|
|
فصـوب
الحيـا
"فـي
جـوده"
برقه
الظبَى
|
يريــك
"هشــيم"
الكفــر
ممــا
يقــدُّه
|
|
نـداه
"المَعين"
الـثرُّ
قـد
نعـم
الهـدى
|
و
يشــفي
بــه
حــزب
"الضــلال"
وجنـدُه
|
|
و
أحك"م
رفع"
الملــك
إذا
نصـب
العـدا
|
علــى
حــال
ذل
"نــال"
مـن
ضـل
جهـدُه
|
|
أيــا
سـامي
"القـدر"
الـذي
جـل
ذكـره
|
و
يـا
محـرز
"المجـد"
الـذي
عـز
نـدُّه
|
|
صــفاتك
فــي
العيـا
"عزيـز"
منالهـا
|
لهــا
"كــل
طبع"
أحــرز
الفضـل
فـردُه
|
|
فمــا
شـئته
مـن
عـزة
الجـار
و"الحمى"
|
"و
قــد"
رسـما
فـوق
السـماكين
مجـدُه
|
|
و
أبعـدت
فـي
"وصـف
العلى"
عـن
مسـابق
|
لهــا
و"تــدانى"
مــن
نوالــك
رغــدُه
|
|
و
جــودك
"فيـه
ذو"
الرجـا
مغـرم
فـإن
|
حمــــى
"جــــوده"
ذم
المهلـــبَ
أزدُه
|
|
و
كـم
مـن
"فنـون"
يسـتمد
بهـا
الضحى
|
إذا
مـــا
تنــاءى
"للمنــال"
ممــدُّه
|
|
و
كـم
بـات
يتل"و
سـورة
الفتح"
عزمـه
|
و
يحك"م
مثــل
الأمــر
و"النهـى
وجـدُه
|
|
و
أصـبح
باستحقاقه
"الحمد
من"
أولي
ال
|
عدالــة
فـي
"الأحكـام
قـد"
بـان
رشـدُه
|
|
بعـــدل
وإحســان
قــدَ
آخــت
كليهمــا
|
"حلاه"
كمـــا
آخـــى
المهنـــدَ
غمــدُه
|
|
و
بــأس
وبطـش
يحميـان
"حمـى
الهـدى"
|
فحـتى
"لقـد
ت"لفـى
مـع
السـرح
أسـْدُه
|
|
و
حلم"
وجودهـــــا"ت"ن"
ومكـــــارم
|
ع"لاهـــن
كل"
الوصـــف
عنهــا
وجهــدُه
|
|
و
كيــف
"ينــال"
المـدح
أوصـاف
ماجـد
|
يـــود
العلا
"حين"اً
وحينـــا
تـــودُّه
|
|
يعـــم
بعف"و
خـــص
بـــال"ذنب
مطقــه
|
و
"تهــدى
إلـى
الرشـد"
المـبين
ألـدُّه
|
|
و
للسـيف
نصـر
يا
بن
"نصر
على"
العدا
|
فســاعة
"إذ
يجلى"
جلــى
الكفــرَ
حـدُّه
|
|
و
للملــك
عـزٌّ
أكسـب
الـذل
"مـن
بغى"
|
فحــاقت
بــه
مــن
مـؤلم
القهـر
نُكْـدُه
|
|
ففـي
ذمـة
العليـاء
"تلك
الحلا"
العُلى
|
و
"لمّــا
بــدت"
للــدين
أنجــز
وعـدُه
|
|
أنـرت
بهـا
مـن
"فـاحم
ال"ظلـم
ما
دجا
|
فلجـــت
"ســـعودٌ
هُ"نَّ
للملـــك
عضــدُه
|
|
فزالـت
"دجـون"
الجـور
عن
مطلع
الهدى
|
فنــور
ســناه
"فــي
اقتبــال"
وسـعدُه
|
|
هــو
"الملك"
لــم
تغبطْــه
إلا
نــزاره
|
بمــا
ليــس
فــي
إم"كانهــا"
ومَعَــدُّه
|
|
و
فـي
منتهـاك
"الأشـرف"
الأصـل
للـورى
|
دليـل
يحـوز
"الشـفعَ"
فـي
المجـد
فردُه
|
|
و
يمنـاك
يوم
الجود
"ترب
الحيا"
أغتدت
|
ألا
"فهي"
أقســــام
الســـماح
وحـــدُّه
|
|
لــك
المرهـف
السـفاح
بالفتـح
"مُثَّنىً"
|
مــع
العلــم
الموعــود
بالنصـر
جنـدُه
|
|
و
جمعـت
شـتى
الجـود
"فـي
وتـر"
راحة
|
ف"غيـث
النـدى"
منهـا
قـد
انهـلَّ
عهـدُه
|
|
فكــم
كامــل
"الأوصـاف
وال"ذات
ماجـدٍ
|
إلــى
ذلــك
"الهــامي
العميم"
مــردُّه
|
|
علي"
يميـــن
قل"تهـــا
غيــر
حــانث
|
لجـــودك
تنظـــم
"النـــوال"
ونَضــْدُه
|
|
فقد
عز
في
الدنيا
"له
المثل"
في
العلى
|
فمــا
"يوســفٌ
إ"لاّ
الحيــا
طــاب
وردُه
|
|
و
أيــن
المسـامي
"والمضـاهي"
مَجـادة
|
"لناصــر
دين"
اللــه
والمجــد
مجـدُه
|
|
كريـم
المسـاعي
حـافظ
الـدين
و"الهـدى
|
ذو"
اِلانعــام
والفضــل
المبجــل
عقـدُه
|
|
ففـي
الفخر
أضحى
"الفضل
والمجد"
طبعه
|
و
"فـي
الـدهر"
أمسـى
ليـس
يوجـد
نـدُّه
|
|
و
محتــده
الســامي
"الكــريم"
نجـاره
|
يمــاثله
"فــي
رفعــة"
القــدر
بنـدُه
|
|
فشــتى
"الخلال"
الغــرّ
جُمِّعْــن
عنــده
|
بمــا
حــاز
مــن
علــم
"ودين"
يُمــدُّه
|
|
ودونـــك
يـــا
مــولاي
حســناء
غــادة
|
مهذبــــة
كالــــدر
نُظّــــم
عقـــدُه
|
|
مُرنّحـــة
الأعطـــاف
تلعــب
بــالنهى
|
فتســبى
الحجــا
طــوراً
وطــوراً
تـردُّه
|
|
هديـــة
عبـــد
مخلـــصٍ
لـــك
قلبُـــه
|
و
فـــي
تلكــمُ
الــذات
الكريمــة
ودُّه
|
|
فألفاظهـــا
تحكـــي
جمـــانَ
دمـــوعه
|
و
قرطاســُها
يحكيــه
فــي
اللـون
خـدُّه
|
|
و
أنقاســُها
مــن
كــل
لــون
غريبُهـا
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و
ترتيبهـــا
مـــن
ذاتـــه
يســـتعدُّه
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فأكحلُهـــا
مـــن
مقلـــتي
أســتميحه
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و
أحمرُهـــا
مـــن
أدمعـــي
أســـتمدُّه
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و
أخضــرُها
مـن
طيـب
عيشـي
الـذي
مضـى
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لـــديك
وأرجـــو
بالرضـــا
تســتردُّه
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و
أعجــب
شــيء
أنهــا
بكــر
فكرتــي
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و
مـــا
بلغـــت
معشــار
شــهر
نعــدُّه
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و
قــد
ولــدت
بنــتين
ثنــتين
مثلهـا
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يروقـــك
مـــن
معناهمــا
مــا
تــودّه
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و
كلتاهمــا
قــد
جَــرَّدتْ
مــن
نظامهـا
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موشـــــحةً
كالســـــيف
راق
فرنــــدُه
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فخـــذها
ففيهـــا
للتـــواظر
مســـْرحٌ
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و
مــن
مــدحِك
الحســنُ
الــذي
تسـتمدُّه
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بقيــت
كمــا
تهـواه
مـا
هبَّـتِ
الصـبا
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فمــالت
بهــا
بــانُ
العــذيب
ورنــدُه
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