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يـا
رسـول
اللـه
عجل
بالفرج
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قد
توالى
الكرب
واشتد
الحرج
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يـا
رسـول
اللـه
في
جاهك
لي
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ســعة
إن
ضـاق
بـي
كـل
نهـج
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قســماً
بـالله
مـا
لاذ
امـرء
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بـك
فـي
خطـب
رجـا
إلا
انبلج
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أنت
شمس
الكون
والهادي
الذي
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ملئت
ملتــه
الــدنيا
بلــج
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أنــت
للرســل
طــراز
معلـم
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بسـنى
النـور
الآلهـي
انتسـج
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كـل
وصـف
فـي
معاليـك
انطوى
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كـل
لفـظ
فـي
معانيـك
اندرج
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بضـيا
السـودد
والفخر
انتهى
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عنــد
بيـت
فـاخر
منـه
خـرج
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طيــب
الاعـراق
مـا
فـاح
لـه
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عـــرق
إلا
هفــا
طيــب
الأرج
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حســن
الخلــق
جميــل
مشـرق
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مـن
رأى
حسـن
محيـاه
ابتهـج
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ابلـج
أن
لاح
فـي
جنـح
الدجى
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خلـت
مـن
لئلآئه
الصبح
انبلج
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وســعت
أخلاقــه
الخلـق
فلـم
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يـك
فحاشـا
غليـظ
القلـب
فج
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كرمـاً
يعفـو
عن
الجاني
الذي
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ســد
عنـه
ذنبـه
كـل
الفـرج
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ورمــاه
الغـي
والجهـل
علـى
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سـاحل
البحـر
وفي
البحر
ولج
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قــدمته
الرسـل
فـي
موقفهـا
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ليلــة
الاســرى
فصـلى
وعـرج
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وارتقـى
السـبع
السموات
إلى
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قـاب
قوسـين
وفـي
الأنوار
زج
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ولــه
شــفاعة
الفصــل
لـذا
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مقـامه
المحمود
في
أعلى
درج
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وجهــه
حجتنـا
البيضـاء
فـي
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يـوم
تأتي
الناس
فيه
بالحجج
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يـا
وجيـه
الوجه
طالت
غربتي
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كــل
يــوم
مـر
منهـا
كحجـج
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أن
يطـل
هـذا
المدى
يقصر
في
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أمـد
العمـر
واقفـو
مـن
درج
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كـم
جرعنـا
كـأس
هـم
مترعـاً
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خمـر
خـوف
بأذى
البرد
امتزج
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خطـوة
فـي
الـبر
والبحر
معاً
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وســرى
بيــن
ثلــوج
ولجــج
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فـــي
وحــول
وجبــال
شــمخ
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شــاهقات
مـا
إليهـا
منعـرج
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قطـن
الثلـج
بهـا
فهـو
الذي
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نــدف
القطــن
عليهـا
وحلـج
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ســفرة
قــد
بعــدت
شــقتها
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فتــت
منــا
قلوبــاً
ومهــج
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أيـن
أرض
الروم
من
أم
القرى
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جادهـا
صـوب
مـن
الوسـمي
ثج
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غربــاً
فـي
دار
قـوم
عنـدهم
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عربـي
الـدار
مـن
بعض
الهمج
|
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بينهــم
كــل
فصــيح
نــاطق
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بلســـان
عربـــي
ذي
عـــوج
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عظــم
الكــرب
ولكـن
نرتجـي
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برسـول
اللـه
يأتينـا
الفرج
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قـد
توسـلنا
إلـى
اللـه
بـه
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ولجـــا
كــل
لمــولاه
ولــج
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شـــرعة
آدم
قـــدماً
ســنها
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لبنيـه
فانتهجنـا
مـا
انتهج
|
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يـا
أعـز
العـرب
يا
من
بابه
|
قـط
مـن
سائل
رفده
ما
ارتتج
|
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نسـأل
اللـه
يجلـى
مـا
بنـا
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حــل
مــن
كـرب
شـديد
وحـرج
|
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يـا
إلهـي
بـالنبي
المصـطفى
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خيـر
مـن
حـج
ومـن
تـج
وعـج
|
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اطـو
بعـد
السـير
عنـا
سيدي
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واجعـل
العقـبى
سـروراً
وفرج
|
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وآنـل
كـل
امـرء
مـا
قد
نوى
|
واطـف
حـراً
بيـن
جنبي
اعتلج
|
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واجـبر
المكسـور
بالعود
إلى
|
بينـك
المحجـوج
كي
يحظى
بحج
|
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رب
قربنــا
إلــى
أوطاننــا
|
فلنـار
البعـد
في
الاحشا
وهج
|
|
رب
واجعلنـا
بجـاه
المصـطفى
|
فـي
حمـى
بيتـك
لا
نخشـى
هرج
|
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نحــن
جيرانــك
والجـار
لـه
|
جـانب
يرجـى
علـى
ألـف
عـوج
|
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أنـت
أوصـيت
علـى
الجار
فلا
|
تنـس
جـاراً
مسـه
الضـر
فهـج
|
|
لا
تعــذبنا
ببعــد
عـن
فنـا
|
حـرم
يـؤتى
لـه
مـن
كـل
فـج
|
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إن
ركبنا
الذنب
بجهل
ما
سوى
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عفـوك
اللهم
في
النفس
اختلج
|
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فـاعف
عنا
ما
مضى
واغفر
لنا
|
توبـة
شـد
التقى
منها
السرج
|
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واختـم
الأعمـار
بـالخير
فقد
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ذهبـت
فـي
اللهـو
منهـن
حجج
|
|
وصــــلاة
وســــلام
منهمـــا
|
ارج
المسـك
علـى
الهادي
نفج
|
|
وعلـــى
أصــحابه
والآل
مــا
|
أوب
الركــب
إليــه
أو
دلـج
|