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أيهــا
الغافــل
الغـبي
تنبـه
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إن
بـالنوم
يقظـة
النـاس
أشبه
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وتأمــل
فإنمــا
النــاس
سـفر
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دار
دنيــاهم
لهــم
دار
غربـه
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كـل
يـوم
تحـل
فـي
السرح
منها
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عصــبة
منهــم
وترحــل
عصــبه
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كيـف
يهنى
الفتى
بها
وهو
فيها
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يشــتكي
دائمــاً
فـراق
الأحبـه
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واحــد
أثــر
واحــد
يتـداعوا
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للفنــى
يالكربــة
أثـر
كربـه
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كــل
حلــو
بعــد
الأحبــة
مـر
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فحيـاتي
مـن
بعـدهم
غيـر
عذبه
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يـا
خليلـي
فرقـة
الخـل
والله
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علــى
الأنفــس
الكريمـة
صـعبه
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سـيما
خلـك
الخصـيص
الـذي
لـم
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يـزل
بـالجنب
منـك
يلصـق
جنبه
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الــوفي
الــذي
يســرك
فعلــه
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إن
يسـؤك
الزمـان
يومـاً
بنكبه
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الحــبيب
الـذي
حـوى
كـل
وصـف
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حيـن
يملـي
يملأ
القلـوب
محبـه
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ذاك
واللــه
حامــد
خيــر
خـل
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قـط
مـا
ذم
صـاحبه
منـه
صـحبه
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قـد
مضـى
حامـد
حميـداً
فمـالي
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بعـده
فـي
الحياة
والعيش
رغبه
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صـاحبي
مـن
قريـب
خمسـين
عاماً
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مـا
ترآءيـت
فـي
محيـاه
غضـبه
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مزجــت
روحــه
بروحــي
فاضـحى
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منطقــي
نطقــه
وقلــبي
قلبـه
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يبتــديني
بمــا
بــه
ابتـديه
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مـن
حـديث
لـم
تنتقـص
منه
حبه
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ذو
حفاظ
تلقيه
في
الهزل
والجد
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صــدوقاً
عليــه
مـا
عـد
كـذبه
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طــاهر
الـذيل
لـم
يـزن
بسـوء
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صــين
مــا
عليــه
تـؤثر
سـبه
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لـم
يكن
فاحشاً
لم
يسب
ولم
يلق
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مــن
النــاس
واحــد
قـد
سـبه
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حـازم
الـرأي
ثـابت
الجأش
شهم
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فيــه
مـع
غرمـه
انـاة
ودربـه
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أي
حفـــظ
وأي
ايـــراد
لفــظ
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مسـتلذ
ينسـى
أخاه
الكرب
كربه
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مـن
جميـع
العلـوم
حـاز
فنوناً
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فتســامى
بهــا
لأرفــع
رتبــه
|
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نــازعته
إلــى
ســمو
الراقـي
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همــة
انزلـت
فـي
الأفـق
شـببه
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بلغــت
غايــة
المطــالب
والأ
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غـراض
أحبـابه
الجميـع
وصـحبه
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لـم
يكـن
راهبـاً
سوى
الله
لكن
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كــان
فيـه
اللـه
أعظـم
رهبـه
|
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كـان
يحيي
إلى
الممات
الليالي
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آخـذاً
بالنصـيب
مـن
كـل
قربـه
|
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كــم
صــلاة
يطـول
وصـفي
فيهـا
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قــام
عــن
فرشـه
لهـا
وتنبـه
|
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وطــواف
مــا
عنــه
منــه
ورد
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شــكر
اللــه
سـعيه
فيـه
غبـه
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ومـــن
الــذكر
والتلاوة
أوراد
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بهــا
لــم
يــزل
يرتـب
حزبـه
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بكـت
الأرض
والسـماء
فقـد
عبـد
|
كـان
يعصـي
الهـوى
وبعبـد
ربه
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وســيبكيه
حيــن
يفقــد
منــه
|
رمضـــان
إذا
أتــى
أي
اهبــه
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طالمـــا
قـــام
وشــمر
فيــه
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مئزراً
واســتحث
قومــاً
وانبـه
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كيــف
لا
يــدخل
الجنــان
مــن
|
الريـــان
والمعـــاطف
رطبــه
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كيـف
يظمـأ
غـداً
وفـي
كـل
يوم
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كـان
واللـه
مـآء
زمـزم
شـربه
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يـا
رعـى
اللـه
اعصـراً
وبقاعاً
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جمعتنــا
فــي
عنفــوان
رشـبه
|
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حيـث
نـدعى
إلـى
الدروس
ونلقى
|
كــل
شـيخ
ربـى
المريـد
وربـه
|
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مــن
رضــاع
العلـوم
أي
اخـاء
|
بيننــا
بيننــا
بـه
أي
نسـبه
|
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يـا
أخـي
يا
أبا
محمد
عهدي
بك
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تهــدي
لقيــا
اخيــاك
وقربـه
|
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كيــف
فــارقتني
وكنـا
جميعـاً
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فرقــدي
الفــة
صــفت
ومحبــه
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كنـــديمي
جذيمـــة
نتعـــاطى
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مـن
كـؤوس
الـوداد
اعـذب
شربه
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كــل
يــوم
نــزداد
حبــاً
إذا
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مــل
سـوانا
مـن
الأحبـاء
حبـه
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فجعتنــي
فيـه
المنـون
فنفسـي
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للتفــاني
مــن
بعـده
مشـرئبه
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فـي
فنـي
الـترب
للـبيب
نـذير
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أنـه
لا
حـق
علـى
القـرب
تربـه
|
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أن
أعــش
بعــده
لعمــري
أنـي
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خنتـــه
فــي
وداده
والمحبــة
|
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إنــه
المـوت
ليـس
فيـه
وفـاء
|
فيـه
ضـاهى
إلى
الفنى
من
أحبه
|
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ويعيــد
إذا
انقضـى
نحـب
شـخص
|
إن
شخصــاً
يقضــي
لـذلك
نحبـه
|
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يـا
جلييسـي
الـذي
على
كل
خير
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فعلـــه
دل
والمقـــال
ونبــه
|
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يـا
صـديقي
الـذي
يكافـح
عنـي
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زمنــي
إن
عــدا
ويـدفع
خطبـه
|
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يــا
سـميري
لقـد
تقـرح
جفنـي
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سـهراً
مـذاتي
الـردى
أن
تنبـه
|
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نـم
هنيئاً
فطالمـا
في
الليالي
|
ســهرت
مقلتــاك
دينـاً
وحسـبه
|
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وســلام
عليـك
مـا
حنـت
الـورق
|
فـــابكت
علــى
حــبيب
محبــه
|
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روح
اللـه
منـك
في
الخلد
روحاً
|
ويسـقي
صـيب
الحيـا
منـك
تربه
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