|
يــا
صــاديا
لمدامــة
الخمـار
|
غرثـــان
ســار
طــالب
الآثــار
|
|
مســتخبراً
علمــا
بــرب
الـدار
|
رد
فــي
بحـار
العلـم
والاسـرار
|
|
بنجــــائب
الاوراد
والاذكــــار
|
|
ولـترع
خوفك
فوق
أن
ترعى
الرجا
|
وقـم
الليـالي
لا
تنم
وقت
الدجا
|
|
لا
تخـش
مـن
ضـرر
ولا
تشـك
الوجا
|
ودع
التكاسـل
عنـد
أوقـات
الإجا
|
|
بـه
فالمعـارف
فـي
دجـا
الاسحار
|
|
واعلــم
بأنـك
لا
تـزال
مطالبـا
|
وبكــل
عــاد
لا
تــزال
مغالبـا
|
|
فعلــى
حظـوظ
النفـس
لا
تتكـالب
|
واسـأل
مليكـك
بـالقليب
وقالبا
|
|
وصــلا
اليــه
وفيــض
علـم
جـار
|
|
وفـؤادك
احفـظ
مـن
خـواطر
حدسه
|
أيضـا
وفلكـك
فـي
المشارع
ارسه
|
|
ولتحـى
ليللـك
سـيما
فـي
سدسـه
|
فـالخير
يـأتى
مـن
حضـيرة
قدسه
|
|
لـذوى
العنـا
والجـد
في
الاسفار
|
|
والحـب
يأخـذ
صـفو
قلـب
نـديمه
|
كــالخمر
يلعـب
دائمـا
بمـديمه
|
|
فـالزم
فـداك
النفـس
بيت
عليمه
|
واشــرب
بـذكرك
خنـدريس
قـديمه
|
|
بصـــبابة
مــع
فتيــة
أبــرار
|
|
واكتـم
هـواك
اذا
بـدا
لك
شارق
|
حســن
لقلبــك
بالمحاسـن
سـارق
|
|
واعلــق
بـذاك
ولا
يعوقـك
عـائق
|
لــولا
المحبـة
مـا
تـروى
صـادق
|
|
فــي
أبحــر
التوحيـد
والأنهـار
|
|
وارقـب
رقيبـك
فـي
لويلات
الولا
|
ودع
الدنيـة
لا
تـرم
فيها
العلا
|
|
وافـرح
بفقـدك
جيفة
تكفى
البلا
|
وانـدب
علـى
نفسـى
ولا
تندب
علي
|
|
مـا
كـان
مـن
جـاه
ومـن
ازهـار
|
|
واتبـع
بصفو
القلب
ويحك
من
سرى
|
فـي
كـل
مفعـول
ولـو
بيعـا
شرا
|
|
واحـذر
بجهـد
أن
تميـل
إلى
مرا
|
واركـن
الى
خدام
ليلى
في
الورى
|
|
وخـذ
الطريـق
لهـم
يزهـد
الدار
|
|
بحلال
قوتـــك
للجـــوارح
أيــد
|
وعلــى
حزمــك
باهتمــاك
شـيدى
|
|
وعليــك
نفســك
بالشـريعة
قيـد
|
واجهـد
ولا
تخشـى
الملامـة
سـيدى
|
|
فـي
منهـج
القـوم
الآلـى
الأحرار
|
|
واغنـم
زمانـك
قبـل
أيام
الكبر
|
وعـظ
الفـؤاد
بـتى
وتياك
الكبر
|
|
ودع
الـردا
وكذا
الأزار
لمن
جبر
|
واخلـع
ثيـاب
العجب
عنك
ولا
تذر
|
|
تمزيــق
مـا
يـردى
مـن
الاسـتار
|
|
إيــاك
خلــى
أن
تقــوه
بوشـية
|
وكـذاك
فاحـذر
أن
تخـون
بمشـية
|
|
مـن
أيـن
تـأمن
ان
تصـاب
بغشية
|
طيــب
فــؤادك
بالصـفا
وبخشـية
|
|
كــى
معــك
يبـدو
طيـب
الاعطـار
|
|
واصـحب
فريقـا
بـالتقى
متـدرعا
|
لا
معشـرا
لـردى
الشـقا
متجرعـا
|
|
بــل
بارعــا
بجــوايز
منـدرعا
|
واركـب
علـى
سـفن
الرجا
متضرعا
|
|
مــن
غايـل
يغتـال
قلـب
السـار
|
|
وانعـم
بـذلك
ذلـك
العيش
الهنى
|
واعلــم
بأنـك
دون
مملـوك
دنـى
|
|
لا
تجــترى
لا
تفــترى
لا
تكتنــى
|
لا
تــدعى
اوصــاف
مـولاك
الغنـى
|
|
ترمـــى
بســـهم
بليــة
ضــرار
|
|
كـن
فـي
الطريق
على
اجتهاد
لائق
|
متباعــدا
عــن
كـل
امـر
عـائق
|
|
متولعــا
فرحــا
بـذكر
الخـالق
|
واكتــم
ولا
تفشــى
لامــر
خـارق
|
|
كالعـــارفين
ائمـــة
الأســرار
|
|
والشاذلى
من
في
المهيمن
قد
فنى
|
وســريهم
وجنيـدهم
عبـد
الغنـى
|
|
وابـن
الرفاعى
ومن
بعزة
قد
عنى
|
والخلـوتى
ومـن
له
النسب
السنى
|
|
بـدر
الـدجا
السمان
ذى
المقدار
|
|
كـن
أن
تكـن
بجمـال
سلمى
هائما
|
لا
لاهيــا
عنهــا
بنفسـك
نائمـا
|
|
فيهـا
الوجـود
ومـن
تراه
قائما
|
لاحــظ
بقلبــك
للحقيقـة
دائمـا
|
|
بتخشــــع
وتخضــــع
ووقــــار
|
|
خـل
الـتي
لزمـت
حماهـا
والبذى
|
وكـذاك
خـل
المبتـدى
والمحتـذى
|
|
واعمـل
إلـى
ذيالك
المسك
الشذى
|
وادخـل
بوجـدك
ذلـك
الحزم
الذي
|
|
واشـرب
مـن
الخمـار
كـأس
خمـار
|
|
وتجـردن
مـن
قبـل
تحريـم
الهوى
|
واغسـل
ثيابـك
من
مصاحبة
الدوا
|
|
وأذق
جنانــك
كلـه
ألـم
النـوى
|
جــرم
نفيــس
ليـس
يـدخله
سـوى
|
|
مـن
قـد
تطهـر
مـن
صـدا
الاوزار
|
|
كـن
ذاكـراً
متهجـداً
فعسـى
لعـل
|
وصـل
يكـون
ولا
يخيـب
مـن
اتصـل
|
|
والجـأ
إلـى
مـن
عز
في
ذات
وجل
|
وجميـع
مـا
ترعاه
قبل
دخولك
ال
|
|
حـرم
المنيـع
اتركـه
باستبصـار
|
|
ذلـك
الحجـاب
وذلـك
سـور
مـانع
|
وكـذلك
الـبردى
القشـيب
اليانع
|
|
ايضـا
ومـن
هـو
فـي
صحابك
قانع
|
ســيف
صــقيل
للقواطــع
قــاطع
|
|
عـن
حضـرة
المدد
الشهى
المدرار
|
|
واقصــد
تجاهـك
داخلا
فـي
شـرعة
|
متطهــرا
متنزهــا
عــن
بدعــة
|
|
واصـعد
إلـى
أوج
الكمـال
بسرعة
|
متقاعــداً
متباعــداً
عـن
رفعـة
|
|
بـــبراق
عــزم
عنايــة
طيــار
|
|
ان
شـمت
برقـا
في
الدياجر
لائحا
|
أو
عاشـقا
لـديار
علـوى
رائحـا
|
|
كـن
للحـبيب
بـدمع
عينـك
بائحا
|
مـن
يرتقـى
يبقـى
امامـا
صالحا
|
|
تســعى
اليــه
أكــابر
الأقطـار
|
|
واعمــل
بحــق
معــالم
مشـهورة
|
مســطورة
فــي
كتبهــم
مزبـورة
|
|
او
عنــد
ميقــات
هنـاك
بصـورة
|
احـــرم
بنيــة
حجــة
مــبرورة
|
|
واشـمم
شذا
الرند
الشذى
الزارى
|
|
وارمـــق
علاك
بـــأعين
مرميــة
|
مخفيـــة
فـــي
غيهــا
محميــة
|
|
وأجــب
الاهــك
للحمـا
مـع
نيـة
|
وطــف
القــدوم
بنيــة
قدســية
|
|
لتفـوز
بالعليـا
وقـرب
البـارى
|
|
وأتـى
المناسك
ما
استطعت
مهللا
|
متعللا
متــــــأولاً
متحـــــولا
|
|
متحققـــا
بـــالحق
لا
متقــولا
|
قـف
بالصـفا
بصفاك
واسع
مهرولا
|
|
متواجـــدا
بــالزهر
والازهــار
|
|
واذهب
لميقات
الرضى
وارم
الشقا
|
متقويــا
بـالزاد
راكـب
منتقـا
|
|
والبـس
حلا
الأحسان
من
بعد
النقا
|
ايضـا
علـى
عرفـات
عرفان
التقى
|
|
قــف
بالشــهود
وقـوف
صـب
دارى
|
|
واجمـع
بجمـع
بعـد
جمـع
واقصرا
|
ذكــرا
وذكــرا
طـولن
لا
تقصـرا
|
|
تجـد
المنـا
فيها
واحسان
القوى
|
واجمـع
بجمـع
ثـم
جىء
ام
القرى
|
|
متهيئا
نـــاو
قضـــا
الأوطــار
|
|
دع
عنـك
نومـا
ثـم
بيعا
والشرا
|
واحلـق
بهـا
وانحـر
ورميا
كررا
|
|
فيمـا
عـدا
معلـوم
ايـام
القرا
|
وطـف
الافاضة
كي
تفيض
على
الورا
|
|
بمعــارف
مزجــت
بكــاس
عقــار
|
|
واعمـد
الـى
حضـر
الـورى
بتعمد
|
لوصــاله
الأشــهى
وحسـم
الكمـد
|
|
وقــرور
عيــن
بالأمــاني
مغمـد
|
ثــم
الصـلاة
علـى
النـبي
محمـد
|
|
شــمس
الشــموس
وقــرة
الأبصـار
|