|
صـــدامهم
كــأوار
النــار
محتــدم
|
وأنطلــوخ
بــه
قــد
خفــت
القــدم
|
|
ألفـى
أخيـل
لـدى
الأسـطول
يخبـط
في
|
بحرانــه
قلقــاً
ممــا
بــدا
لهــم
|
|
يئن
وهــو
ينــاجي
النفــس
مضـطرباً
|
ويلا
علام
أرى
الأرغوســـة
أنهزمـــوا
|
|
ولــوا
عباديـد
نحـن
الفلـك
شـاردةً
|
هـل
جـل
خطـبٌ
بـه
الأربـاب
قد
حكموا
|
|
خطــبٌ
بــه
أوعــزت
ثيــتيس
قائلـةً
|
بهـم
المرامـد
يلقـى
الحتـف
خيرهـم
|
|
يغيــب
عنــه
ضــياء
الشـمس
فاتكـةً
|
بــه
الأعــادي
وحــيٌّ
أنــت
عنــدهم
|
|
لا
شــك
فطرقــل
أودى
ويحــه
أفلــم
|
أقــل
لــه
دونــك
النيـران
تضـطرم
|
|
أخمــد
شــرارتها
وارتــد
مجتنبــاً
|
هكطـــور
لا
تنخــرط
إيــاك
وســطهم
|
|
تلــك
الهــواجس
هــاجت
بثـه
فـإذا
|
بـــانطلوخ
بــدا
والــدمع
ينســجم
|
|
قـال
ابـن
فيلا
مصـاب
قـد
دهمنـا
به
|
يـا
حبـذا
لو
بنو
العلياء
ما
دهموا
|
|
فطرقـــل
ملقـــىً
وهكطــورٌ
بشــكته
|
والجســم
عـارٍ
عليـه
النقـع
ملتحـم
|
|
فمــا
انتهــى
انطلـوخٌ
مـن
مقـالته
|
حــتى
محيّــاً
أخيــلٍ
غشــت
الغمــم
|
|
وفـــوق
طلعتـــه
الغــرا
وهــامته
|
بــــارحتيه
ســــناجاً
ذر
يلتطـــم
|
|
فاســود
منــه
محيــاه
وقــد
علقـت
|
بطيـــب
أثـــوابه
آثــاره
الســحم
|
|
أكـــب
يشـــغل
ميـــداناً
بقــامته
|
تمرغــاً
وهــو
زاهـي
الشـعر
يصـطلم
|
|
وحـــوله
انطلقــت
تبكــي
مولولــةً
|
تلـك
السـبايا
الـتي
غصت
بها
الخيم
|
|
غيـــدٌ
أخيـــل
وفطرقــلٌ
ببأســهما
|
قـد
أحـرزا
سـلماً
يـا
حبـذا
السـلم
|
|
لطمــن
بــض
صــدورٍ
والتــوين
أسـىً
|
فســح
مــن
أنطلـوخ
المـدمع
الـرذم
|
|
ذرعيــه
أمســك
حــتى
لا
يثـور
أسـىً
|
ونحـــره
يلــج
الصمصــامة
الخــذم
|
|
فــأن
عــن
ألــمٍ
مــن
ضـيمه
فمضـى
|
حــتى
لثيــتيس
ذاك
الضــيم
والألـم
|
|
فصــعدت
مــن
عبـاب
البحـر
زفرتهـا
|
حيــث
اســتقر
أبوهـا
نيـرس
الهـرم
|
|
وحولهــا
ثــم
فــي
الأعمـاق
قائمـةً
|
فــي
اليـم
كـلٌّ
بنـات
اليـم
تلـتئم
|
|
صـــفيةٌ
نيســـيا
أكنـــا
قموثــوةٌ
|
لمنــــورةٌ
ذورسٌ
فـــأنوب
أمفنـــم
|
|
أمفيثــوا
ذينمينــا
ذكسـمينا
ذتـو
|
غلا
طيـا
الحسـن
مـن
شاعت
لها
الشيم
|
|
وحولهـــا
ياريــا
ميليــت
آغبيــا
|
فيــروز
قليــانرا
إفــروط
تزدحــم
|
|
وأفســــذيس
نميريـــتيس
قلينســـا
|
أمـا
ثيـا
مـن
بشـعر
زانهـا
وسـموا
|
|
يـا
نـاس
يـا
نيـر
إقليميـن
أورثيا
|
مـا
ييـر
والكـل
ضـمن
الكهـف
ينتظم
|
|
كهـفٌ
لهـا
ابيـضَّ
حسـناً
فـارتكمن
به
|
وفيــه
كــل
بنــات
البحــر
ترتكـم
|
|
ولــولن
وأولــة
ثــم
التطمـن
معـاً
|
وولــوولت
عــن
فــؤادٍ
كيـد
ينفصـم
|
|
صــاحت
أخيــات
سـمعاً
وانتبهـن
إذا
|
لنقمــةٍ
قــد
عرتنـي
دونهـا
النقـم
|
|
ويلاه
ويلاه
مـــن
أم
لقـــرم
وغـــى
|
عــن
شــأوه
قصــر
الأبطــال
كلهــم
|
|
أنشــأته
مثــل
غصــن
طــاب
منبتـه
|
فـي
روضـةٍ
فـإذا
بالسـادة
اختصـموا
|
|
بالفلــك
أنفــذته
للحــرب
واحربـا
|
والآن
مــــوطن
فيلادونــــه
حــــرم
|
|
مــا
زال
حيـا
عليـه
الشـمس
سـاطعةٌ
|
وفـــي
حشاشــته
مــن
ضــيمه
ضــرم
|
|
لا
أســتطيع
لــه
عونــاً
وهـا
أنـذا
|
فــوراً
لرؤتيــه
ذا
الحيــن
أغتنـم
|
|
أرى
الحــبيب
فــأدري
مـا
ألـم
بـه
|
مـن
محنـةٍ
وهـو
عـن
قـرع
القنا
وجم
|
|
وغـــادرت
كهفهــا
يصــحبنا
وغــدا
|
أمــا
مهــن
عبــاب
البحــر
ينقسـم
|
|
حـتى
إذا
مـا
بلغـن
السـهل
سرن
إلى
|
حيـث
المرامـد
تلـك
الفلك
قد
نظموا
|
|
وحيــث
حــوليه
قــد
أرســوا
لهفـاً
|
وكلمتـــه
تجــاري
دمعهــا
الكلــم
|
|
بنـي
مـاذا
الأسـى
مـا
الـدمع
تذرفه
|
بــح
لــي
فبثــك
عنـي
ليـس
يكتتـم
|
|
ألا
تــرى
زفــس
ذاك
الوعــد
بربــه
|
لمـــا
بســـطت
لــه
كفيــك
تظلــم
|
|
ناشــدته
مــذعن
الإغريــق
بنـت
إذن
|
فــي
وجــه
فلكهــم
كيــداً
يكيـدهم
|
|
فــأن
عــن
كبــدٍ
حــرى
وقـال
أجـل
|
قــد
بــر
ويلاه
فيمــا
قـد
أذاقهـم
|
|
لكــن
إذا
اخــترمت
أبطــال
صـيدهم
|
مــا
نـالني
والفـتى
فطرقـل
مخـترم
|
|
فطرقــل
أرفعهــم
شــأناً
وأعلقهــم
|
بمهجــــتي
لا
تضــــاهيه
قرومهـــم
|
|
بهـــامتي
كنــت
أفــديه
فــوالهفي
|
عـــدمته
مثلمــا
كبــارهم
عــدموا
|
|
مــن
بعــد
مصــرعه
فـي
صـلد
شـكته
|
هكطــور
ذو
القـونس
الطيـار
محتكـم
|
|
ســلاح
خلــدٍ
مــن
الأربــاب
أهــديه
|
فيلا
فمــا
حصــرت
تقــويمه
القيــم
|
|
فيضــاً
أنــالوه
لمــا
كنـت
قسـمته
|
يــا
حبــذا
لــوله
إنســيةً
قسـموا
|
|
فلــو
بقيــت
ببطــن
البحـر
قاطنـةً
|
مـا
نلـت
مـن
إنـس
أهـل
الأرض
ضيمهم
|
|
ومــا
تــألمت
لابـنٍ
لـن
يـأوب
إلـى
|
أوطــانه
وهــو
بحـر
المـوت
يقتحـم
|
|
لا
عيــش
لـي
فسـناني
اليـوم
تنفـذه
|
كفــي
لهكطــور
عــن
فطرقـل
أنتقـم
|
|
صــاحت
وسـحت
علـى
الخـدين
عبرتهـا
|
إذاً
حياتــــك
كـــادت
آه
تنصـــرم
|
|
هلاك
هكطــــور
يتلـــوه
هلاكـــك
لا
|
مــرىً
فقــال
إذاً
يـا
حبـذا
الشـبم
|
|
يـا
حبـذا
المـوت
إذ
غلـت
يدي
سلفاً
|
عــن
صــون
إلفـي
لمـا
اشـتدت
الإزم
|
|
فطرقــل
أودى
ولــم
أبــرز
لجـانبه
|
أقيــه
مـن
صـدمات
تحتهـا
اصـطدموا
|
|
فلــم
أصــد
زؤام
المـوت
عنـه
ولـم
|
أرد
عـــن
فتيـــةٍ
هكطـــور
فلهــم
|
|
فــالموت
فــالموت
لا
عــودٌ
ولا
وطـنٌ
|
إذ
لــم
أهـب
إلـى
الهيجـا
أصـونهم
|
|
حملاً
علـــى
الأرض
لا
جــدوى
لثقلتــه
|
ظللــــت
دون
أســـاطيلي
تجـــاههم
|
|
لئن
يفــق
بســداد
الــرأي
بعضــهم
|
فـــإنني
بقـــراع
الصـــم
فقتهــم
|
|
فلتهلـك
الفتنـة
الـدهما
التي
عبثت
|
بــالجن
والإنــس
حـتى
افتـل
شـملهم
|
|
وليهلـك
الغيـظ
مـن
بيـن
الأنام
فكم
|
أغـــرى
وأوغــر
منقــاداً
حكميهــم
|
|
كالشـهد
فـي
الصـدر
يجري
وهو
منتفخٌ
|
مثـل
الـدخان
بـه
أهـل
العيون
عموا
|
|
أتريـــذ
حـــدمني
غيظــاً
وذاك
خلا
|
فلنغــض
ولنمــض
مهمــا
بـرح
الأضـم
|
|
نعــم
ســأطلب
هكطــور
الـذي
فتكـت
|
كفــاه
فـي
قمـةٍ
تعنـو
لهـا
القمـم
|
|
حــتى
إذا
شــاء
زفــسٌ
فـي
بطـانته
|
مــوتي
فــإن
حيــاتي
تلــك
دونهـم
|
|
هرقــل
لــم
يغـن
عنهـم
بأسـه
وولا
|
زفـــسٍ
فــأودى
وإن
أولــوه
ودهــم
|
|
أصــابه
كيــد
هيــرا
والقضـاء
إذاً
|
فلألـق
ميتـاً
إذا
كـانت
كـذا
القسـم
|
|
وليـس
مـن
شـاغلٍ
ذا
اليـوم
يشـغلني
|
إلا
ادخــار
علــى
تسـمو
بـه
الهمـم
|
|
والــدردنيات
بضــات
الصــدور
يـرى
|
لهـــن
دمـــعٌ
ســخينٌ
جريــه
ديــم
|
|
يمسـحن
مـا
سـح
عـن
غـص
الخدود
وقد
|
هـــاجت
تلهفهـــن
الأبــؤس
الــدهم
|
|
يعلمـن
أن
اعـتزالي
طـال
فاغتنم
ال
|
أعــداء
بــوني
وإنــي
الآن
بينهــم
|
|
ما
أنت
مهما
بذلت
النصح
ما
نعتي
قا
|
لــت
أجـل
أحكمـت
فـي
قولـك
الحكـم
|
|
وافخــر
مــن
عــن
سـراياه
وأسـرته
|
أزاح
بالبــأس
خطبــاً
جــل
هــالهم
|
|
لكــن
شــكتك
الغـراء
فـاز
بهـا
ال
|
عـــدى
وهكطــور
فيهــا
الآن
متســم
|
|
مــا
خلتــه
يتمــادى
تهــده
زمنـاً
|
علمــت
ســاعته
حــانت
ومـا
علمـوا
|
|
فلا
تلــج
لجــج
الهيجــاء
مقتحمــاً
|
حــتى
ترانــي
غـداً
والفجـر
يبتسـم
|
|
فــي
شــكةٍ
مـن
لـدى
هيفسـت
شـائقةً
|
أعــود
فأبــل
بهــا
وأقتـل
جمعهـم
|
|
وغـــادرته
وقــالت
للحســان
إلــى
|
م
الشــيخ
والــدنا
بالصـبر
معتصـم
|
|
لجــن
العبــاب
إذاً
بلغنــه
وأنــا
|
هيفســت
أطلــب
فهـو
العهـد
يحـترم
|
|
فغصــن
وهـي
اسـتطارت
تبتغـي
مـدداً
|
فـي
الخلـد
حيث
استقر
المجد
والعظم
|