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مـا
أرانـا
الزمـانُ
يوماً
سعيداً
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بـل
مصـاباً
فـي
كـل
يـوم
جديدا
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راع
شـــرق
البلادِ
مــوتُ
خليــلٍ
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كــان
بالنبـل
والـذكاء
فريـدا
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عــاجلته
رُســلُ
المنيــة
لمــا
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طـار
صـيتاً
ونـال
ذكـراً
حميـداً
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فأصـــاب
المصــابُ
كــل
فــؤادٍ
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فغـــدا
مــن
عــذابه
مفــؤودا
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يــا
خليلاً
أرثيـهِ
والـدمعُ
جـارٍ
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وأرى
الصـــبر
بعــده
مفقــودا
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طالمــا
كنــت
للمــرؤةِ
ذخــراً
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ولمــــن
لاذ
بالوفــــاء
ودودا
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فــالفتَ
الــوداد
حــتى
علمنـا
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كيـف
ربُّ
الـوداد
يرعـى
العهودا
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ولقــد
رمــتَ
كــل
فــنٍّ
مفيــدٍ
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وطلبــتَ
العلــى
فمــتَّ
شــهيداً
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لــكَ
بيــن
الأنـامِ
ديـوانُ
شـعرٍ
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بمعـــانيه
حـــرّك
الجلمـــودا
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تلــك
بــانت
للعصــر
مبتكـرات
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ومــن
المجــد
ألبســتك
بـرودا
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لـــو
درى
المــوتُ
ان
ذلــك
درّ
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للمعــالي
نظمــتَ
منــه
عقـودا
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مــا
أصــابت
سـهامهُ
لـك
قلبـاً
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كـان
قبـل
اللسان
ينشي
القصيدا
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يـا
مجيـداً
بالشـعرِ
مثـل
ابيـه
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هــل
نــر
بعـدُ
ربّ
شـعرٍ
مجيـدا
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نحــو
مصــرٍ
ذهبــتَ
تحمــل
داءً
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مــا
وجــدنا
لــه
دواءً
مفيـدا
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فرجونــا
لــك
الشــفاء
ولكــن
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جئتنــا
تشـتكي
العـذاب
شـديدا
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وفقــدنا
بفقــدك
اليـومَ
فـرداً
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بـات
فـي
ظلمـة
الضـريح
وحيـدا
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كيـف
نرجـو
العـزاء
بعدك
يا
من
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بــذكاهُ
صــرحُ
المعــارف
شـيدا
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أوحـش
اللَـه
منـك
ربـعَ
الأمـاني
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حيـن
أمسـى
داعـي
السرور
فقيدا
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مــا
لبيروتنـا
الحزينـة
سـلوى
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وعــزاء
مـا
دمـت
عنهـا
بعيـدا
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عــدت
مــن
غربـةٍ
إليهـا
عليلاً
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وإليهــا
واحســرتا
لـن
تعـودا
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ليــت
ذاك
الفـراق
كـان
طـويلاً
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فرجـــاءُ
البلاد
كـــان
وطيــدا
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يــا
شــقيق
الخليـل
انـك
شـهم
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مـن
أُولـي
الحزم
لم
يزل
معدودا
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في
الرزايا
علمتنا
الصبر
فاصبر
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فــي
بلاء
أذاب
منــا
الكبــودا
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سـوف
يحيـي
الحـبيبُ
ذكـر
أبيـه
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وتــرى
منــه
يازجيــاً
مفيــدا
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