|
أَشــــواطِئَ
الإٍســـكَندَرِيَّةِ
طيـــبٌ
|
فيــكَ
المصــيف
لعاشــق
ولهــان
|
|
هجـر
الـبيوتَ
إليـك
محرقة
اللظى
|
إذ
شــُبَّ
فيهـا
القيـظُ
كـالنيران
|
|
وأتـــاكِ
يحمــل
حبــه
وغرامــه
|
متقيلاً
مــــن
ظلـــك
الفينـــان
|
|
يــا
مربعـي
دون
المرابـع
إننـي
|
دونَ
المرابــع
والــهٌ
بـك
عـاني
|
|
أَنســَيتَني
وَطنـي
البعيـدَ
وإِنمـا
|
هــو
أَوَّلٌ
عنــدي
وأَنــت
الثـاني
|
|
لكنمــا
فيــك
الحــبيبُ
وإِننــي
|
وطــنُ
الحـبيب
أحـب
مـن
أوطـاني
|
|
كـم
جلسـةٍ
لـي
فيـك
وحـدي
شاكياً
|
كشــــكاية
الإخـــوان
للإخـــوان
|
|
أبكـي
بكـاءَ
الطفـل
حـتى
ينتهـي
|
دمـــع
بـــه
يتقــرَّحُ
الجفنــان
|
|
جهـد
الحزيـن
عيـونه
الشكرى
فان
|
نضــبت
فتلــك
نهايــة
الأحــزان
|
|
والصبر
أجمل
ما
استفاد
القلبُ
أن
|
نشــط
القضـباءُ
إليـه
بالحـدثان
|
|
لكنـــه
مـــاذا
يفيــد
ودونــه
|
حقــدُ
القضــاءِ
وغضــبة
الأزمـان
|
|
البحــر
مبســوط
الأديــم
كــأَنه
|
صـــدرٌ
أليـــفُ
مســـرةٍ
وأمــان
|
|
والريــح
لينــة
المهــبِّ
لطيفـة
|
كتنهـــدات
الموجـــع
المرنــان
|
|
والشـمس
تضـرم
في
السماء
مجامراً
|
هــذي
الغيــوم
لهـن
مثـل
دخـان
|
|
بعثــت
إلـى
لجـج
البحـار
أشـعةً
|
صــيَّرنها
لججــاً
مــن
العقيــان
|
|
اللانهايــة
فــي
بعيــد
سـمائها
|
واللانهايـة
فـي
القريـب
الـداني
|
|
بحـران
مـن
جلـدٍ
ومـن
مـاءٍ
وفـي
|
الأفــق
القصــيِّ
تمـارج
البحـران
|
|
العيــن
يأخــذها
الجلالُ
كأنهــا
|
شــهدت
هبــوطَ
هـدىً
ووحـيَ
جنـان
|
|
يــا
بحـر
والأمـواج
فيـك
تـدفَّعت
|
قلـــبي
كهمِّـــك
دائم
الخفقــان
|
|
وأَســاك
مثــل
أَسـاي
لـجَّ
وإنمـا
|
صــدري
وصــدرك
بالأســى
رحبــان
|
|
هــذي
شــواطئك
الطويلــة
أنهـا
|
مســرى
الغــرام
ومسـرح
الغـزلان
|
|
نصـبوا
بهـا
خيـم
المصيف
صفوفها
|
متسلســـلات
مثـــل
عقــد
جمــان
|
|
نزعــت
بإحــداها
سـعادُ
ثيابهـا
|
فــرأَت
تجلّــي
حســنها
العينـان
|
|
وأتتــكَ
عاريــةَ
الأهــاب
وإنمـا
|
لبســت
بيــاض
جمالهــا
الفتـان
|
|
ورمــت
إليــك
بنفســها
وتلاعبـت
|
فــي
المـاءِ
بيـن
الصـحب
والخلان
|
|
مـــا
آن
ثَـــمَّ
ملاحــةً
وملوحــةً
|
جُمِعــا
ولــم
يتمــازج
المـا
آن
|
|
أنـتَ
السـماء
قريبـة
قـد
أطلعـت
|
نجـم
الوجـوه
علـى
مياهـك
رانـي
|
|
أنــتَ
الريـاض
جنيَّـة
قـد
أبـدعت
|
زهــراً
مغيــراً
زهــر
كـل
جنـان
|
|
هـــذي
طيــورك
أنهــا
ثرثــارة
|
ضــحكاً
ولعبــاً
فيــك
باطمئنـان
|
|
الواقفـــات
جســـومهنَّ
هياكـــل
|
صـــحت
بهـــنَّ
عبــادة
الأوثــان
|
|
والماشـــــيات
بطيئة
مياســــة
|
أعطــــافهنَّ
نـــواعم
الأبـــدان
|
|
والجالسـات
علـى
الصـخور
زواهراً
|
مثــل
الريــاض
قطــوفهنَّ
دوانـي
|
|
شـجر
الحيـاة
على
الرمال
ثمارهن
|
نَ
أطـــايب
التفـــاح
والرمــان
|
|
والســـابحات
رشــيقة
حركــاتهن
|
نَ
بديعـــة
التصــريف
والإتقــان
|
|
أنـت
الغنـيُّ
وقـد
حـويت
جـواهراً
|
فــاقت
كنــوز
الــدر
والمرجـان
|
|
هــذي
عرائســك
الجميلــة
أنهـا
|
مشـــمولة
بالحســـن
والإحســـان
|
|
متلاعبــات
فــي
مياهــك
مثلمــا
|
لعبــت
حميّــا
الكـاس
بالسـكران
|
|
يخرجـــن
منـــك
مكللاتٍ
لؤلـــؤاً
|
كــالزهر
غــبَّ
العــارض
الهتـان
|
|
لكنهــنَّ
عواطــل
مــن
كــل
مــا
|
زان
الجمـــال
لأنهـــنَّ
غـــواني
|
|
وتضـيء
فيـك
سـعاد
شمسـاً
برجهـا
|
قلـــبي
وقلبــك
أننــا
إخــوان
|
|
الشـــعر
فيـــضُ
أشــعةٍ
ذهبيــةٍ
|
والجســم
فيـض
النـور
واللمعـان
|
|
نزلـت
ذكـاء
إلـى
المغيب
فواجهت
|
ســعدى
وقــد
يتــواجه
القمـران
|
|
فــإذا
همــا
يتنــاظران
وهــذه
|
شــمس
المسـاءِ
تميـل
ف
الميـزان
|
|
ذابـت
حيـاءً
فـاختفت
مـن
بعـدها
|
أرخــت
سـتار
الأفـق
أحمـر
قـاني
|
|
ومضــت
ســعاد
كأنهـا
مَلَـكٌ
مشـى
|
فـي
الخلـد
بيـن
الحور
والولدان
|
|
يـا
مُنتيَـتي
ومَنِيَّـتي
مـا
ضـرَّ
لو
|
ســرنا
كمــا
يتســاير
الإِلفــان
|
|
متشـــابكَين
أنـــاملاً
بأنامـــل
|
متهــــاديين
كأننـــا
ملكـــان
|
|
متســـاقيين
غرامنــا
بلحاظنــا
|
متخاصــــرين
كأننـــا
غصـــنان
|
|
متناســيين
العـالمين
ومـا
بهـا
|
والعـــالمون
أحـــق
بالنســيان
|
|
يـا
بحـر
قـد
جـاءَ
المساءُ
مجرراً
|
أذيـــاله
ينبــثُّ
فــي
الأكــوان
|
|
والنـاس
يمشـون
الهوينـا
مثلمـا
|
يـــتريَّثُ
المتفـــرج
المتــواني
|
|
شـــيب
وشـــبان
وولـــد
كلهــم
|
متبـــاين
الأزيـــاء
والألـــوان
|
|
والبشــر
ترسـمه
الحيـاة
سـعادةً
|
فــي
أوجــه
الفتيـات
والفتيـان
|
|
ويهــزم
مــرحُ
الشــبيبة
مثلمـا
|
هــز
النســيم
نــواعم
الأغصــان
|
|
يتنــافر
الصــبيان
بينهـمُ
كمـا
|
تتنــافر
الأطيــار
فــي
الأفنـان
|
|
وُلــدٌ
كنـثر
الـدر
ملـء
قلـوبهم
|
أَمــنُ
الســعيد
وخفَّــةُ
الجــذلان
|
|
لا
رغبــــة
لهــــم
ولا
أمنيـــةٌ
|
أن
الشـــقاءَ
رغـــائب
وأمــاني
|
|
لا
هـون
عمـا
فـي
الحيـاة
وإنمـا
|
فـي
اللهـوى
كـل
سـعادة
الصبيان
|
|
حـتى
إذا
مـا
النجـم
أشرق
باسماً
|
فـي
الأفـق
ينظـر
نظـرة
الحيـران
|
|
قفـل
الجميـع
إلـى
منـازلهم
ومن
|
بعــد
اللقــاءِ
رمـوك
بـالهجران
|
|
يــا
بحــر
إن
العمــر
هـمٌّ
دائم
|
بتعــــارف
وتباعـــد
وتـــداني
|
|
أنــت
الزمــان
وكـل
عمـرٍ
قطـرةٌ
|
هيهـــات
تنقــع
غلَّــةَ
الظمــآن
|
|
والنفــس
مثــل
شــواطئ
ممتــدةٍ
|
روّادُهــــن
عواطــــف
الإنســـان
|
|
والقلــب
لجتــك
السـحيقة
أنهـا
|
مرســى
القـرار
ومنبـع
الطغيـان
|
|
أمـا
الحيـاة
وأنـت
رمـز
وجودها
|
فلهــا
إليــك
جــواذب
ومعــاني
|
|
يـا
بحـر
زد
وانقـص
فإنـك
مثلها
|
فــانٍ
ومثلــك
كــل
شــيءٍ
فـاني
|