|
أغـرى
بـك
الشـوق
بعد
الشيب
والهرم
|
سـارٍ
طـوى
البيـد
من
نجد
إلى
الهرم
|
|
يـا
سـاري
الطيـف
يجتـاب
الظلام
إلى
|
جفـن
مـع
النجـم
لـم
يهـدأ
ولم
ينم
|
|
يغريــه
بالـدمع
حـادٍ
بـات
مرتجـزاً
|
يحــدو
المطــي
لأجــراع
بــذي
سـلم
|
|
إذا
خفـا
الـبرق
أذكـى
فـي
جـوانبه
|
نــاراً
تؤججهــا
الــذكرى
بلا
ضــرم
|
|
يـا
بـرق
مالـك
لا
تحكـي
جـوى
كبـدي
|
إذا
تــــألقت
ليلاً
فــــي
نـــديهم
|
|
ويــا
صـبا
روحـي
روحـي
فقـد
ذهبـت
|
بهـا
النـوى
بعـد
عهد
البان
والعلم
|
|
يـا
ساكاني
البان
طال
البين
في
غير
|
أربـت
على
الصبر
فاستعصي
على
الهمم
|
|
واستأســدت
نــوب
الأيــام
فـاجترأت
|
بنـات
أوى
علـى
الأشـبيال
فـي
الأجـم
|
|
للَــه
أيــام
كنــا
والوجــود
لنـا
|
يجـري
القضـاء
بمـا
شـئنا
على
الأمم
|
|
إذ
يرفـع
اللَـه
بالـدين
الحنيف
لنا
|
علــى
الــذرى
دولـة
خفاقـة
العلـم
|
|
فـي
سـورة
العـز
والمجـد
الذي
سلفت
|
بشـراً
بـه
غـرر
الأجيـال
فـي
القـدم
|
|
مجـد
بنـاه
الـذي
فـاض
الوجـود
بـه
|
نـوراً
لـه
قـامت
الـدينا
مـن
العدم
|
|
طـه
أبـو
القاسـم
المبعـوث
مـن
مضر
|
إلــى
البريــة
مـن
عـرب
ومـن
عجـم
|
|
ولـو
تـرى
قبلـه
الـدنيا
ومـا
لقيت
|
مــن
البلاء
ومــا
ذاقـت
مـن
النقـم
|
|
والنســا
ضــلّال
قفــر
فـي
مسـارحها
|
هيـمٌ
مـن
السـرح
أو
غفـل
مـن
الغنم
|
|
ضـلوا
سـواء
النهـى
فاستمسكوا
عمهاً
|
بكــل
حبــل
مــن
الأهــواء
منجــذم
|
|
هــاموا
بكــل
ســبيل
فـي
غياهبهـا
|
مـن
يخطـئ
القصـد
في
ليل
الهوى
يهم
|
|
فـــأوردتهم
ظمـــاءً
كـــل
مهتلــك
|
يشــوبه
الكفــر
بالأقــذاء
والـوخم
|
|
تفرقـوا
شـيعاً
فـي
الكفـر
وانقسموا
|
شـتّى
فبـاءوا
بمـا
يخـزي
مـن
القسم
|
|
هــذا
عــن
الحـق
بـالأفلاك
فـي
عمـهٍ
|
وذاك
بالنــار
عـن
نـور
الجلال
عمـي
|
|
وذا
يـــؤله
مـــن
لا
يســتجيب
لــه
|
مــن
نــاطقٍ
بشــر
أو
صــامت
صــنم
|
|
قبـــــائل
وشــــعوب
لا
يعطفهــــا
|
إخــاء
صــدق
ولا
قربــي
مـن
الرحـم
|
|
وســـوقة
وملـــوك
حـــال
بينهمــا
|
مـا
حـال
بيـن
سـباع
الجـو
والنعـم
|
|
هــذا
علــى
العــرش
محمـود
بعزتـه
|
يزجــي
أولئك
فــي
الأجنـاد
والخـدم
|
|
إن
عبـد
الـروم
فـي
بصـرى
قياصـرها
|
ففــي
مــدائن
كســرى
تهلـك
العجـم
|
|
مـن
قـال
بالعقـل
غـال
السيف
هامته
|
ومــن
يسـم
يـوم
عـدل
بـالردى
يسـم
|
|
والجــاهليون
بالأحقــاد
فــي
لهــب
|
مــن
العــداوة
والبغضــاء
محتــدم
|
|
فـــي
يعـــرب
ومعــدٍّ
كــل
بائقــة
|
تسـقيهم
المـوت
فـي
الغـارات
والإزم
|
|
إن
أتهمــوا
فركــاب
المـوت
متهمـة
|
أو
أنجـدوا
فـالردى
مـوف
على
القمم
|
|
جهــل
مبيــد
وفوضــى
عــب
زاخرهـا
|
والعيـش
بيـن
الضـنى
والفتنة
العمم
|
|
لـولا
قريـش
سـقى
اللَـه
الوجـود
بها
|
غوثـاً
مـن
الأمـن
فـي
غيـث
من
الديم
|
|
قـوم
إذا
ابتـدر
النـاس
العلا
نهضوا
|
فـي
زاخـر
مـن
تليـد
المجـد
ملتطـم
|
|
هـم
خيـرة
اللَـه
مـذ
كـانوا
وصفوته
|
وجيــرة
اللَـه
فـازوا
منـه
بالـذمم
|
|
أبنـاء
فهـر
بنيتـم
فـي
البطاح
لنا
|
مجــداً
تأثــل
بيــن
الحـل
والحـرم
|
|
كنتــم
نظامــاً
لأقـوام
مضـوا
حقبـا
|
مـــن
الزمـــان
بلا
شــمل
ولا
نظــم
|
|
يــا
مــوئل
النـاس
والأيـام
راجفـة
|
بأهلهــا
وســعير
البــأس
فـي
حـدم
|
|
وعصـمة
النـاس
عـن
ضـاق
الفضاء
بهم
|
فــاءوا
إلــى
مـوئلٍ
منكـم
ومعتصـم
|
|
يا
مطعمي
الناس
إن
أكدى
الغمام
ويا
|
ري
الحجيــج
إذا
يـوم
الهجيـر
حمـى
|
|
تصــوب
المجــد
مـن
أعلـى
ذوائبكـم
|
نــوراً
أطــل
علـى
الآفـاق
مـن
شـمم
|
|
مســراه
فــي
شــرف
الإســلام
منتقلا
|
بيـن
القـبيلين
مـن
طـود
إلـى
علـم
|
|
حــتى
أقلتــه
فــي
عليــا
مشـارقه
|
زهــراء
زهــرة
ذات
الطهـر
والعصـم
|
|
مـن
ذا
الـذي
حملـت
تلك
البتول
ومن
|
قــامت
المقـدمه
الـدنيا
علـى
قـدم
|
|
نـــور
مــن
اللَــه
ســواه
وصــوره
|
خلقـــاً
وزكــاه
بــالآداب
والحكــم
|
|
فـي
الشـرق
والغـرب
آيـات
تطوف
بها
|
رســل
البشــائر
مــن
شـادٍ
ومرتسـم
|
|
فـي
ليلـة
لـم
تـر
الدنيا
لها
مثلا
|
فيمــا
تقضــي
مــن
الأجيـال
والأمـم
|
|
تنفسـت
عـن
سـنا
شـمس
الوجـود
بـدا
|
فــي
مــوكب
مــن
جلال
اللَـه
منتظـم
|
|
روح
الحيـاتين
نـور
القريـتين
إمـا
|
م
القبلـتين
صـفيِّ
اللَـه
فـي
القـدم
|
|
لاحـــت
مخـــايله
تنبيـــك
أن
لــه
|
قـدراً
تفـرد
فـي
السـاداتن
بـالعظم
|
|
المجـــد
محتــده
واليمــن
مولــده
|
والحمـد
مـورده
معنـى
اسـمه
العلـم
|
|
يرمــي
النجــوم
بعيـن
فـي
تقلبهـا
|
معنــى
يفــوت
مــدى
الأفلاك
والنجـم
|
|
يـا
أحمـد
الرسـل
مـا
هذا
الجلال
به
|
جمــال
هــذا
المحيـا
بـاهر
الشـيم
|
|
مــا
هـان
بـاليتم
لكـن
زاده
خطـراً
|
وقــد
يهـون
بنـو
السـادات
بـاليتم
|
|
لمـا
دعـوا
أحمـد
اهـتز
الحمى
وبدا
|
عبــــد
منــــاف
صــــدق
جــــدهم
|
|
واسـتقبل
الـدهر
بـالنعمى
بما
صنعت
|
فتــاتهم
وانشــر
البشــرى
بحيهــم
|
|
خيـر
المراضـع
مـن
أم
القـرى
رجعـت
|
أمّـــاً
لأكـــرم
مكفـــول
وملـــتزم
|
|
فمــا
اسـتقرت
بـه
حـتى
أنـاخ
بهـم
|
مــن
جــوده
كــل
جـود
بالنـدى
رزم
|
|
مــا
زال
ينمـي
ويسـمو
فـي
منـاقبه
|
نمــاء
نجــد
بمـا
شـاء
الجلال
سـمى
|
|
فيــه
شــمائل
عبــد
اللَـه
نعرفهـا
|
عـن
شـيبة
الحمـد
عن
عمرو
عن
الحكم
|
|
ســـمع
وقــور
أميــن
صــادق
فطــن
|
عــف
قــدير
وصــول
مــانع
الحــرم
|
|
شـــمائل
قصــرت
عــن
درك
أيســرها
|
أهـل
النهـى
مـن
قريـش
أو
بنـى
جشم
|
|
وهمــة
أصــغرت
مــا
أكــبرت
سـفها
|
تلــك
النفـوس
وكـانت
مـوطن
الهمـم
|
|
لمــا
أظــل
الــورى
إبّــان
دعـوته
|
وثـار
نـور
الهـدى
يسـطو
على
الغمم
|
|
أوفــى
علــى
قلبــه
داع
أهـاب
بـه
|
مـن
جـانب
القـدس
هـذا
نورنـا
فشـم
|
|
نــور
أضــاء
بقلــب
صــاغ
جــوهره
|
مـن
النـدى
والمعـالي
بـارئ
النسـم
|
|
قلــب
جــرى
فيــه
أن
اللضـه
حملـه
|
عبــء
البريــة
مـن
عـرب
ومـن
عجـم
|
|
وحـــوله
مــن
قريــش
كــل
معتقــم
|
مـن
حمـأة
الكفـر
يهـوى
حـول
معتقم
|
|
فاستوحشــت
بينهــم
نفـسٌ
لـه
أنسـت
|
بوحشـة
البيـد
وارتـاحت
إلـى
الوجم
|
|
مستأنســــاً
بجلال
اللَـــه
يشـــهده
|
فـي
الغـار
بيـن
خشـوع
البيد
والأكم
|
|
حـــتى
تـــبين
أعلام
النبــوة
فــي
|
مـا
قـد
رأى
ثـم
لـم
يرتـب
ولم
يهم
|
|
أوحــى
إليـه
كمـا
أوحـى
إلـى
رسـل
|
مــن
قبلـه
بالهـدى
والملـة
القيـم
|
|
بـالنور
بـالحق
بالعرفان
أرسله
اللَ
|
ه
الـــذي
علــم
الإنســان
بــالقلم
|
|
هنــاك
زلــزل
قــوم
حيـن
قـال
لـه
|
قــم
منــذراً
وبحبـل
اللَـه
فاعتصـم
|
|
فــالكفر
يرجــف
والأصــنام
واجمــة
|
ووالحــق
يبسـم
والطـاغوت
فـي
سـدم
|
|
فــاعجب
لأحلامهــم
طاشـت
وكـم
رجحـت
|
علــى
شــماريخ
رضـوى
أو
علـى
إضـم
|
|
وأعجـب
لـه
كيـف
يـدعو
وحـده
أممـاً
|
عـن
دعـوة
الحق
حنايا
الوالد
الرخم
|
|
إن
قــام
بـاللين
يسـترعي
ضـمائرهم
|
رأيـــت
كــل
حمــى
بــالخني
عــرم
|
|
أو
جــاء
بـالآي
مـدوا
بالخصـام
لـه
|
حبـال
ألـوى
علـى
حكـم
الهـوى
خصـم
|
|
يحنــو
عليهــم
وإن
صــدوا
يعلمهـم
|
رفــق
الــولي
وبــر
السـيد
الخـذم
|
|
وكـم
طغـوا
لـم
يقـابلهم
بما
صنعوا
|
قلــب
تخلــى
عــن
العـدوان
والأضـم
|
|
ومــن
يقــد
مثلــه
قومــاً
أحلهــم
|
منـــه
بمنزلــة
الأبنــاء
والحشــم
|
|
يـــدعوهم
وكتـــاب
اللَـــه
آيتــه
|
يهـدي
إلـى
الرشـد
بالبرهان
والحكم
|
|
يتلـوه
فـي
أحـرف
جـاء
الأميـن
بهـا
|
وحيـاً
مـن
اللَـه
فـي
نظـم
من
الكلم
|
|
لــم
يبــق
حيــن
تحـداهم
بـه
لسـن
|
إلا
تـــردى
شــعار
العــي
واللســم
|
|
وإذ
قضـى
العجـز
فيهـم
حكمـه
فزعوا
|
فاسـتنجدوا
بالقنـا
والصـارم
القضم
|
|
إلا
فريقــاً
جلا
نــور
اليقيــن
لهـم
|
عـن
ظلمـة
الشـك
بالعرفـان
والفهـم
|
|
لـم
يكـذب
الـرأي
أم
المـؤمنين
بما
|
تخيلــت
فيــه
مــن
نبـل
ومـن
عظـم
|
|
ولــم
يفـت
نظـر
الصـديق
مـا
جمعـت
|
فيــه
النبــوة
مــن
آي
ومــن
علـم
|
|
ولا
أضـــل
علـــيٌّ
والصـــبا
غـــرر
|
فـي
صـدق
أحمـد
رأى
الحـاذق
الفهـم
|
|
ثلاثــة
فــي
ميـادين
الهـدى
سـبقوا
|
فــأحرزوا
قصــب
الحســنى
بســبقهم
|
|
جلــوا
وصــلى
علــى
آثــارهم
نفـر
|
سـنوا
الهـدى
لبنـي
الـدنيا
بهديهم
|
|
مــن
كــل
أبلــج
سـامٍ
فـي
أرومتـه
|
مــن
آل
فهـر
كـبير
القلـب
ذي
شـمم
|
|
وكـــل
أروع
نجـــد
فـــي
حفيظتــه
|
مــن
أهــل
يــثرب
لا
نكــس
ولا
بـرم
|
|
صـيدٌ
صـناديد
فـي
يـوم
الـوغى
صـبر
|
غـــرٌّ
أماجيـــد
كشـــافون
للغمــم
|
|
لمــا
تمــادت
قريــش
فــي
عـداوته
|
وبيتـــوا
قتلـــه
تــدبير
معــتزم
|
|
قــامت
يـد
اللضـه
تخزيهـم
وتنصـره
|
مــن
ينصــر
اللَــه
يعصـمه
فيعتصـم
|
|
رد
القضـاء
عليهـم
سـواء
مـا
مكروا
|
فلـم
يبـوءوا
بغيـر
الخـزي
والنـدم
|
|
يـــا
طيــب
للغــار
آواه
وصــاحبه
|
وللحمــام
بمــا
أســدت
مـن
الخـدم
|
|
والعنكبــوت
لهــا
نــي
نصـره
عمـل
|
عــن
درك
آيــاته
جفـن
الضـلال
عمـى
|
|
مـن
يحمـه
اللَـه
سـاوى
فـي
حمـايته
|
فعـل
الجمـادات
فعـل
النـاس
والبهم
|
|
لمـا
نحـا
يـثرب
اهـتز
الحمـى
وبكت
|
ورق
الربــى
لبكـاء
الـبيت
والحـرم
|
|
مــا
حــل
طيبــة
حــتى
حـل
حبـوته
|
للسـيف
يـدعو
بـأمر
اللضـه
والقلـم
|
|
تـــأذن
اللَــه
أن
تغشــى
كتــائبه
|
منــازل
الشـرك
فـي
نجـد
وفـي
تهـم
|
|
وقــام
أهـل
المصـلى
والعقيـق
إلـى
|
نصــر
النــبي
بعهــد
غيــر
منفصـم
|
|
وشـيمت
الـبيض
فـاهتز
الحجـاز
لهـا
|
واسـتنت
الخيـل
فـي
شـوق
إلى
اللجم
|
|
والنـاس
إن
ظلموا
البرهان
واعتسفوا
|
فـالحرب
أجـدى
على
الدنيا
من
السلم
|
|
ومعشـــر
أســـلموا
للَــه
أنفســهم
|
تـبينوا
الربـح
فـي
بيـع
وفـي
سـلم
|
|
للَــه
مـا
أرخصـوا
مـن
أنفـس
ذهبـت
|
فــي
اللَـه
غالبـة
الأقـدار
والقيـم
|
|
ألقـوا
علـى
الـدهر
من
آياتهم
عبرا
|
وســاوروا
المـوت
فاسـتخذى
لبأسـهم
|
|
ســل
نسـج
داود
إذ
هـم
يخطـرون
بـه
|
فـــي
كـــل
مصــطرخ
عــال
ومصــطم
|
|
وسـل
شـبا
الـبيض
كم
شبوا
لها
لهباً
|
علـى
الطـواغيت
فـي
أيامهـا
الـدهم
|
|
فـي
اللضه
ما
جردوا
منها
وما
غمدوا
|
فـي
اللَـه
مـا
سـفكوا
مـن
أنفس
ودم
|
|
لـم
يحملوهـا
لـدنيا
قـل
مـا
جمعوا
|
منهـا
ولا
عـن
هـوى
فـي
النفس
محتكم
|
|
والخيــل
تعلــم
كـم
دكـت
سـنابكها
|
ممـا
بنـى
الكفـر
منـدار
ومـن
أجـم
|
|
فــي
كــل
يــوم
كبــدر
جـر
أيـومه
|
علـى
العـدا
كـل
مـاض
بـالردى
خـذم
|
|
يـوم
قضـى
الحـق
لا
يـوم
جـرى
سـفها
|
بـــالأنعمين
ولا
يـــوم
بــذي
حســم
|
|
يـوم
بنـى
اللَـه
أركـان
الحنيـف
به
|
علـــى
دعــائم
عــز
غيــر
منهــدم
|
|
صــفت
ســماء
الليـالي
منـذ
ليلتـه
|
علــى
الأنـام
فلـم
تظلـم
ولـم
تغـم
|
|
يـا
قـائد
الجيـش
يسـعى
تحـت
رايته
|
مــن
عسـكر
اللَـه
جنـد
غيـر
منهـزم
|
|
إن
كـان
جبريـل
مـن
أركـان
حربك
في
|
بــدر
فحمــزة
والكـرار
فـي
الحشـم
|
|
فـي
آلـك
الغـر
مـذ
كـانوا
وهم
بشر
|
مـا
فـي
الملائك
مـن
أيـد
ومـن
كـرم
|
|
ويــا
نبيّــاً
ســقى
الـدنيا
بملتـه
|
روق
الحضــارة
مـن
سلسـالها
الشـبم
|