|
راقــت
بهـا
دار
العلـوم
مـوارد
|
تـــروى
بهـــن
بصــائرٌ
وعقــول
|
|
أمٌّ
لنــا
فـي
المنجيـات
مهادهـا
|
دعـــم
لمجـــد
بلادهــا
وأصــول
|
|
أم
إذا
درج
الوليـــد
بحجرهـــا
|
فالــدين
يرعــى
والبيـان
يعـول
|
|
للَــــه
در
شــــبيبةٍ
كفلتهـــم
|
أم
لنـــا
فــي
الأمهــات
بتــول
|
|
أخـذت
علينـا
منـذ
أيـام
الصـبا
|
عهــد
الكريــم
وعهــدها
مسـئول
|
|
يـا
أم
عهـدك
فـي
القلـوب
موثـق
|
صــدق
الوفــاء
بحبلــه
موصــول
|
|
الــدين
عهـدك
والمكـارم
بيننـا
|
والعلــــم
والآداب
والتنزيــــل
|
|
علمتنـــا
أن
الحنيفـــة
ملـــة
|
لا
نهجهــــا
وعـــرٌ
ولا
مجهـــول
|
|
تهدى
إلى
سبل
الرشاد
إذا
هوى
ال
|
مفتـــون
بالإلحـــاد
والضـــليل
|
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رفعــت
منـار
الحـق
لا
يعيـا
بـه
|
عقـــل
ولا
ينجــاب
عنــه
دليــل
|
|
إلا
الــذين
تبـوءوا
وخـم
الهـوى
|
فالنهــج
أعمــى
والمنـاخ
ويبـل
|
|
نرعـو
إلـى
دنـس
الإباحـة
فانجلى
|
للنــاس
ذاك
المنــزل
المــرذول
|
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مازوا
الجديد
من
القديم
ومادروا
|
أن
الجديــد
مــن
القـديم
سـليل
|
|
جلبــات
إفــك
فـي
مهالـك
فتنـةٍ
|
هوجــاء
كيــد
غواتهــا
تضــليل
|
|
دعـوى
ومـا
ضـربوا
لنـا
مثلاً
بها
|
يجــري
عليـه
مـن
القيـاس
مثيـل
|
|
وغـذا
الـدعاوى
لـم
تقم
بدليلها
|
فـي
العقـل
فهي
على
السفاه
دليل
|
|
إن
كـان
مـا
زعمـوا
قديماً
ديننا
|
فليــأت
منهــم
بالجديــد
رسـول
|
|
أو
إن
يكـن
لغة
السماء
فإنها
ال
|
قـــرآن
والتـــوارة
والإنجيـــل
|
|
أو
ذلــك
الأدب
الــذي
شـهدت
بـه
|
فــي
كــل
شــعب
بالجمـال
عـدول
|
|
زخـرت
بـه
أم
اللغـات
ولـم
تـزل
|
بعلاه
تفـــترع
اللغـــى
وتطــول
|
|
وســيعلمون
إذا
الحقيقـة
أعرضـت
|
أن
الضـــلالة
جنـــدها
مخـــذول
|
|
وتـرى
الجديـد
يصـيح
في
حجراتهم
|
يـا
قـوم
عـن
تلك
المهالك
زولوا
|
|
مـا
فـي
القديم
معابة
إن
لم
يكن
|
فيــه
عــن
السـنن
السـوي
عـدول
|
|
وذر
الجديــد
إذا
رأيــت
سـبيله
|
عوجــاً
عـن
الحـق
المـبين
تميـل
|
|
واسـلك
سـبيلك
غيـر
ذي
عـوج
ترد
|
شــرع
الحيــاة
وصــفوها
مكفـول
|
|
يـا
أم
كـم
من
شرعة
لك
في
الهدى
|
لا
وردهــــا
رنـــقٌ
ولا
مملـــول
|
|
وهــديتنا
سـهل
العلـوم
قواصـداً
|
فــالغور
نجــد
والحــزون
سـهول
|
|
دان
القريــض
لنــا
فأمـا
روضـه
|
فجنـــىً
وأمـــا
صــعبه
فــذلول
|
|
ولنــا
إذا
شــئنا
جزالـة
جـزول
|
وإذا
نــــرق
فتوبـــة
وجميـــل
|
|
ولربمــا
ملــك
النــدي
خطيبنـا
|
والجمــع
بهــر
والمقــام
يهـول
|
|
وإذا
كتــاب
اللَــه
عــب
عبـابه
|
فســـمت
إليــه
قــرائحٌ
وعقــول
|
|
فهنـاك
منـا
مـن
إذا
شـاء
انبرى
|
فــدنا
المــدى
وتـبين
التأويـل
|
|
يـا
أم
كـم
لـك
مـن
يد
في
شكرها
|
يعيــا
المقـال
ويعجـز
التفصـيل
|
|
أحييـت
أحيـاء
الجزيـرة
مـن
نما
|
قحطـــان
مــن
ولــد
وإســماعيل
|
|
فبكــل
فصــل
منــك
مظهــر
أمـة
|
مــن
أهلهــا
وبكــل
يــومٍ
جيـل
|
|
ولـو
اسـتدار
بـك
الزمـان
لأصبحت
|
لـك
فـي
عكـاظ
مـن
البيـان
فصول
|
|
لـم
تقصـري
عـن
أهلهـا
في
خيرما
|
صــنعوا
ولـم
يـردد
عليـك
مقـول
|
|
لــو
عـاد
للـزوراء
عهـدٌ
بيننـا
|
هــارون
يســمع
والوفــود
تقـول
|
|
لشـأوت
فرسـان
القريض
إلى
المدى
|
لــم
يعــدك
الـترتيب
والترتيـل
|
|
هـذا
مجالـك
فـي
البلاغـة
فاسلكي
|
مـا
شـئت
نهجـك
فـي
البيان
ذلول
|
|
وارعـى
تلادك
أن
يحيـط
بـه
البلى
|
فيحـــول
أو
ينتــابه
التبــديل
|
|
لغـة
الكتـاب
وديعـة
الأحقـاب
مي
|
راثٌ
إلــى
الأعقــاب
عنــك
يـؤول
|
|
مـن
لـم
يحـط
بقـديمها
لم
يعتقد
|
علمــاً
بمجـد
الشـرق
وهـو
أثيـل
|
|
وخـذي
المعـاني
فـي
جمال
جديدها
|
مـــا
شــئت
لا
حــرجٌ
ولا
تخــذيل
|
|
وتبخــتري
فــي
الابتــداع
فـإنه
|
ديـــنٌ
أتـــى
بكتــابه
جبريــل
|
|
يــا
أم
إن
ملأ
القريــض
بحــاره
|
فجــرى
ســريعٌ
واســتطال
طويــل
|
|
وتســاجلت
فـي
المرسـلات
يراعهـا
|
فانهـــل
منــدفق
وفــاض
ســجيل
|
|
لــم
يبلغـوا
معاشـر
حقـك
مدحـةً
|
فليقصـــروا
إن
المــرام
جليــل
|
|
أو
مـا
جريت
إلى
العلى
لم
تقصري
|
عــن
غايــة
والســابقات
قليــل
|
|
خمســين
عامـاً
أو
تزيـد
قضـيتها
|
والعـــــزم
لا
واهٍ
ولا
مفلــــول
|
|
دأبــاً
علــى
الأخلاص
بيـن
حـوادث
|
للــدهر
تخــترم
القــوى
وتغـول
|
|
طــوراً
ينازعهــا
البقـاء
معـوق
|
هــو
للمعــارف
والعلــوم
خـذول
|
|
وتصــيبها
غــول
السياسـة
تـارةً
|
بيــد
الهــوان
وللسياســة
غـول
|
|
خصـمان
مختلفـا
الهوى
فإلىالهدى
|
هــذا
وذاك
إلــى
الضــلال
يميـل
|
|
لــولا
دفــاع
اللَـه
عـن
أنصـاره
|
راحــت
بهـا
فـي
الـذهبات
سـبيل
|
|
فمضـت
مضـاء
البحـر
ليـس
يعوقها
|
وعـــر
ولا
يعمــي
عليــه
مســيل
|
|
تــأبى
معاتبـة
الزمـان
شـعارها
|
صــبرٌ
يعــوذ
بـه
الكريـم
جميـل
|
|
لــم
يعنهـا
عـرض
الحيـاة
وإنـه
|
ظــل
وإن
طــال
المــدى
ســيزول
|
|
مــالي
وأيامــا
مضــين
غواشـما
|
والــدهر
ألــوى
والليـالي
حـول
|
|
دار
الزمــان
بمصــر
دورة
مقبـل
|
فالليــل
أقمــر
والريـاح
قبـول
|
|
وامتــد
بالدســتور
ظـل
سـريرها
|
يرعــاه
ظــل
اللَــه
وهـو
ظليـل
|
|
ملـكٌ
علـى
الشـورى
أقـام
بناءها
|
ملــكٌ
بمصـر
علـى
الملـوك
يطـول
|
|
فاهنـأ
أبـا
الفاروق
عهدك
بيننا
|
ملــكٌ
يــدوم
الـدهر
ليـس
يـزول
|
|
زيـن
الملـوك
الصـيد
يحمـل
عرشه
|
عـــدلٌ
أعـــم
ونـــائلٌ
مبــذول
|
|
ملأ
القلــوب
جلالــه
وكــذاك
مـن
|
يهــب
الجلائل
فـي
القلـوب
جليـل
|
|
البرلمـــان
وفيـــه
ســعد
بلاده
|
للنيــل
بــالعيش
السـعيد
كفيـل
|
|
يـا
سـعد
كـم
لك
عند
قومك
من
يد
|
رجعــت
إليـك
الشـكر
وهـو
جزيـل
|
|
دار
النيابــة
أنـت
روح
نظامهـا
|
بــل
أنــت
فـوق
جبينهـا
إكليـل
|
|
وبنــوك
أقمــار
البلاد
طوالعــاً
|
بالمجلســين
ومــا
لهــن
أفــول
|
|
كــل
لمصـر
إذا
الحـوادث
أجلبـت
|
ليــث
الشـرى
والصـارم
المصـقول
|
|
فاسـلك
بهـم
وضـح
المحجـة
معلما
|
بــــالحق
لا
وهـــنٌ
ولا
تهليـــل
|
|
وتهـــدوا
ثمـــر
البلاد
وإنمــا
|
ثمــر
البلاد
شــبابها
المــأمول
|
|
إن
لـم
نحطهـم
بـالعلوم
وبالتقى
|
فالجهـــل
داءً
للنفـــوس
قتــول
|
|
يـا
حـاملي
شـرف
النيابـة
إنهـا
|
عبــءٌ
علـى
الحـر
الكريـم
ثقيـل
|
|
النيــل
بيــن
يــديكم
وعليكــم
|
عهـــد
لنــا
ألّا
يضــام
النيــل
|