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لــو
كنــت
وامقــةً
كمـا
زعمـوك
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يــا
عــز
كــذبت
ظنــوني
فيــك
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قــالوا
تملكهـا
الغـرام
وشـفها
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بـرح
الجـوى
والـبين
يـوم
لقـوك
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حسـبوك
صـادقةً
ولـو
علمـوا
بمـا
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حملتنــي
بالغــدر
مــا
حســبوك
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أحللتنــي
ربعــاً
بقلبــك
شـركةً
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وحللــت
فــي
قلـبي
بغيـر
شـريك
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أودعتــه
رهــن
الأســى
وتركتــه
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يــا
رحمتــا
للمــودع
المـتروك
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فقضـيت
منـي
بالـدلال
منـى
الهوى
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وقضــيت
منــك
لبانــة
المـأفوك
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وعصــيت
حلمــي
فـي
رضـاك
تعلـة
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وضــللت
نهــج
ســبيله
المسـلوك
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يـا
بيضـة
الخدر
المنيع
أما
كفى
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خــديك
قــاني
دمعــي
المســفوك
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مــالي
نجــي
هـوىً
أبثـك
شـاكياً
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فــأعود
منــك
بظنــتي
وشــكوكي
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إن
الـذين
عـدوا
علـى
مـا
بيننا
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بالإفــك
لمــا
أرجفــوا
خــدعوك
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لا
يزهـك
الـبيت
الطويل
على
امرئ
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طــال
الســماك
بـبيته
المسـموك
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أنا
من
عرفت
له
إذا
احتكم
الهوى
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عـــز
الأبـــي
وذلــة
المملــوك
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نجلتـــه
أمهــة
أبــر
نجارهــا
|
شـرقاً
علـى
النفـر
الألـى
نجلـوك
|
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وأبٌ
إذا
نــادى
العلا
ســفرت
لـه
|
عــن
وجـه
سـابغة
الجمـال
ضـحوك
|
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نســجت
لــه
أرواح
مصـر
شـمائلاً
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تـذكو
الصـبا
بعبيرهـا
الممسـوك
|
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وغـذاه
مـاء
النيـل
مـن
صـفواته
|
كــرم
الملــوك
ونجـدة
الصـعلوك
|
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يـا
مصـر
مـا
أوفـى
بعهـدك
معشرٌ
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يـــوم
الكريهــة
ضــلة
خــذلوك
|
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بــؤأتهم
نعمــاء
عيــش
أصـبحوا
|
بظلالهـــا
فـــي
رفــرف
وأريــك
|
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وعرفتهــم
بالبــأس
ثـم
رفعتهـم
|
فـي
العـالمين
فمـا
لهـم
نكـروك
|
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نبذوا
الحلوم
وأشرعوا
سفن
الهوى
|
نوكــاً
جريــن
علـى
زعـازع
نـوك
|
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ترمـي
بهـم
لجـج
الخطـوب
عواصفاً
|
فــي
جنــح
معتكــر
الظلام
حبيـك
|
|
حـتى
إذا
وقـف
النجـاء
بهـم
على
|
شــوط
العيــي
وغايــة
المنهـوك
|
|
بــاتوا
بمهتلـك
الخلاف
وأصـبحوا
|
ورداً
علــى
وخــم
هنــاك
تريــك
|
|
يتجــاذبون
مـن
العـداوة
بينهـم
|
أهــداب
ذي
حبــك
بهــا
محبــوك
|
|
كــلٌّ
يجــد
إلــى
أخيــه
بغـارة
|
شــعواء
مـن
زيـف
المقـال
سـهوك
|
|
ويهــز
بالعــدوان
صــفحة
صـارم
|
ماضـي
الغـرار
علـى
أخيـه
بتـوك
|
|
يـا
قـوم
مـا
هذا
العدء
وكم
هوى
|
قـــدماً
بعـــز
ممالــك
وملــوك
|
|
يرمــون
بـالخطب
الطـوال
وكلهـا
|
خطــرات
أرعــن
أو
ســباب
أفيـك
|
|
مــن
كـل
مرتبـك
المقالـة
رأيـه
|
زيفـــان
بيـــن
مســفه
وربيــك
|
|
تركـوا
البلاد
على
الهوان
تخب
في
|
أذيــال
أســود
بــالبلاء
محــوك
|
|
يـذكي
بهـا
لهـب
العـداوة
بينهم
|
خطــل
الســفيه
وإمـرة
المـأفوك
|
|
والليــث
منتشـر
المخـالب
فـاغرٌ
|
يختـــال
فـــي
جبريــة
وفتــوك
|
|
جــاثٍ
يخـاف
النيـل
مـن
غـدراته
|
بأســاء
يــومٍ
بــالخطوب
عتيــك
|
|
يـا
مصـر
مـا
لـك
غير
أهلك
فتنةٌ
|
فـي
اللَـه
مـا
لاقيـت
مـن
أهليـك
|
|
مـا
أنـت
بالبلـد
الشـقي
وإنمـا
|
جلــب
الشـقاء
علـى
بنيـك
بنـوك
|
|
فتنتهـم
الـدنيا
فلما
استياأسوا
|
منهــا
علــى
أهــوائهم
فتنــوك
|
|
واللَــه
مـا
عمـى
السـبي
عليهـم
|
لــو
أنهــم
فــي
نصـحهم
محضـوك
|
|
وإذا
الهـوى
ركـب
النفـوس
بمهمهٍ
|
ســلكت
ســبيل
القاسـط
المهلـوك
|
|
مــالي
أرى
أممـاً
تصـوغ
فخارهـا
|
بيــد
النهــى
مــن
فضـة
ونسـيك
|
|
وبنـو
أبـي
إن
قيـل
هاتوا
مجدكم
|
صــاغوه
مــن
إثــم
ومـن
تأفيـك
|
|
وكأنمــا
كتــب
الصــغار
عليهـم
|
يـا
رحمتـا
يـا
مصـر
مـا
لبنيـك
|
|
أفلا
يــرون
بلادهــم
أوفــت
علـى
|
يــوم
لهــا
بالمجلســين
وشــيك
|
|
هـل
أخلصـوا
اللَـه
فيـك
وهل
وفى
|
بالعهــد
فــي
نــوابهم
أهلــوك
|
|
فتخيـــروا
نجبـــاءهم
لمقاعــد
|
نصـــبت
لكـــل
مجـــرب
ودليــك
|
|
مـن
كـل
منسـوك
السـريرة
لم
يشن
|
بالغــدر
ذيــل
ردائه
المنوســك
|
|
مــاضٍ
علــى
العزمـات
أروع
آخـذٍ
|
بــالحزم
فييــوم
المقـال
سـفيك
|
|
يرمـي
إلـى
الغـرض
الذي
عقدت
به
|
آمـــال
شـــعب
نـــاهض
ومليــك
|
|
نهضــت
بلاد
النيــل
تطلـب
حقهـا
|
مــن
مالــك
فيهــا
ومـن
مملـوك
|
|
وإذا
الشــعوب
تـداركت
خطواتهـا
|
بتــــوثب
نحـــو
العلا
وبـــروك
|
|
هتكـل
حبـاب
الظلـم
وانكشفت
لها
|
غــرر
المنـى
مـن
سـره
المهتـوك
|
|
وتبــوأت
فـي
الملـك
ذروة
بـاذخ
|
يزهـــو
بأفنيـــة
لــه
وســموك
|
|
يـا
دولـة
الأطمـاع
ويلـك
أقصـرى
|
نهـض
الزمـان
عـن
الـورى
يجلـوك
|
|
لا
يزهينــك
فــي
المطيـر
قـوادم
|
برقـــت
بــألوان
لهــا
وحبيــك
|
|
إن
القشــاعم
إن
تثاقــل
نهضـها
|
هرمــاً
فقــد
صـارت
إلـى
تهلـوك
|
|
لا
يخــدعنك
فــي
حياتــك
معشــر
|
فــي
خدمــة
اســتعمارهم
خـدعوك
|
|
أو
أن
يصـيب
النيـل
فـي
أبنـائه
|
فتـــن
يرثهـــا
محـــال
بنيــك
|
|
أبنـاء
مصـر
إذا
الخطـوب
تحلكـت
|
أقمـــار
كـــل
دجنـــة
وحلــوك
|