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خليلــي
قلـبي
بسـلمى
عميـد
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ووجـدي
بهـا
كـل
يـوم
يزيـد
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يــذكرنيها
إذا
جــن
ليلــى
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شــمالٌ
تهــب
وغصــنٌ
يميــد
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وبــرقٌ
يلــوح
وطيــر
ينـوح
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وحـادٍ
لـه
فـي
المطايا
نشيد
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فأمـا
الشـمال
فتهـدي
شذاها
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وكالغصـن
ذاك
القوام
الميود
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ونـوح
الحمـام
نشـيد
الغرام
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يشــنف
ســمعي
منـه
القصـيد
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ومـا
البرق
إلا
وميض
الثنايا
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إذا
ابتســمت
فهـي
درٌّ
تضـيد
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وأبكى
إذا
ما
حدا
الركب
حادٍ
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لمـا
كـان
يوم
افترقنا
يعيد
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تناءى
بك
البين
عن
دار
سلمى
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وكــل
قريـب
المطايـا
بعيـد
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فهـل
لـك
فـي
صـفو
عيشٍ
رجاءٌ
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ومـن
دون
سـلمى
فيـافٍ
وبيـد
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رعـى
اللَـه
عهـدك
مـن
عالـج
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وحيــا
ربوعــاً
حوتهـا
زرود
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وعهــد
الهـوى
بيننـا
قـائمٌ
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أواخيــه
محكمــةٌ
والعقــود
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ليـالي
ألهـو
بها
لا
أخاف
ال
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قلــى
والحواسـد
عنـا
رقـود
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فمـا
أنس
لا
أنس
يوم
التقينا
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وأجفانهـــا
مســبلاتٌ
تجــود
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تقــول
بنـا
بصـر
الكاشـحون
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وأحســـب
أيامنــا
لا
تعــود
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حـذار
مـن
القـوم
لا
يبصـروك
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فكــلٌّ
عليــك
رقيــبٌ
حقــود
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ذرينــي
فــدونك
لسـت
الـذي
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إذا
رام
أمـراً
ثنـاه
الوعيد
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وهـل
ينثنـي
الليث
عما
يريد
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إذا
مـا
أراد
بـك
الفتك
سيد
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أنـا
ابن
الضراغم
يوم
المغا
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رو
كيـف
تخـاف
الذئاب
الأسود
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أنا
ابن
الذي
إذا
ما
انتموا
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فجــاهٌ
رفيــعٌ
ومجــد
تليـد
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بنو
المجد
والجود
في
كل
جيلٍ
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إذا
أعـوز
النـاس
مجدٌ
وجود
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لنـا
قصـب
السبق
يوم
الفخار
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كمـا
كـان
آباؤنـا
والجـدود
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تـراثٌ
لنـا
منـذ
عليـا
معـدٍّ
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يــدل
بــه
كهلنـا
والوليـد
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فنحـن
بنـو
الكـرم
الأكـثرون
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إذا
قـل
مـن
ذي
فخـارٍ
عديـد
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أولئك
أشـــياخنا
الأكرمــون
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ونحــن
علـى
نهجهـم
لا
نحيـد
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لهـم
منـزلٌ
فـي
العلا
لا
يرام
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مكيــن
الـدعائم
سـام
وطيـد
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ســلامٌ
أبــا
أحمــدٍ
يسـتطير
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إليــك
بـه
برقهـا
والبريـد
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إذ
ذكــر
النــاس
إخــوانهم
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فإنــك
أنـت
الـوفي
الـودود
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أحــن
إليـك
حنيـن
المطايـا
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إلـى
المـاء
إذ
عزهن
الورود
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وأذكـــر
أينــا
الماضــيات
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فقلــبٌ
يــذوب
وعيــن
تجـود
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زمـانٌ
تـولى
علـى
خيـر
حـالٍ
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فهــل
لأويقاتنــا
مـن
يعيـد
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لعـل
عهـود
الصـبا
أن
تعـود
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فللَــه
ذاك
الصـبا
والعهـود
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ونقضــي
لأسـوان
حـق
الجـوار
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وحــقٌّ
لوصــافها
أن
يجيـدوا
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فقـد
جمعـت
مـن
صروف
الجمال
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نهايـة
مـا
يقتضـيه
الوجـود
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