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مــا
حيـاتي
تعـب
فـي
ملـل
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وهيــام
فــي
قفــار
الامـلِ
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يطلـع
الصـبح
ويربـد
الدجى
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وانـا
مـن
حيرتـي
فـي
خبـل
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كلمــا
جــال
بفكـري
خـاطر
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بــددته
خشــيتي
مـن
فشـلي
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كلمــا
بــشّ
بــوجهي
حاضـر
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ضــاع
فـي
طيـاته
مسـتقبلي
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كلمـا
أملـت
فـي
شـيء
ثـوى
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املــي
فــي
ضـيقات
السـبل
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اجهـدتني
فكرتـي
فـي
طالعي
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يـا
لتعسـي
طـالعي
فـي
زحل
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أسـهر
الليـل
وقلـبي
خـافق
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فـي
حنايـا
قلبـه
المشـتعل
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أنـا
ان
قضـيت
ليلـي
ساهراً
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أقضــهِ
فــي
عبــث
او
عمـل
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وكلا
هـــذين
مـــوه
قــوتي
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منهــك
جســمي
مبيـد
اجلـي
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وطنــي
اعبــده
يــا
وطنـي
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فقد
نفسي
في
الهوى
يعذب
لي
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ولقــد
جاهــدت
فيـه
زمنـاً
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ونســيت
فــي
هــواه
جـذلي
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وبنـو
قـومي
إذا
جاهـدت
في
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وطنـي
كـانوا
هـم
فـي
شـغل
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انــا
لـولا
قـوة
فـي
جلـدي
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لسـرى
داء
الـونى
في
مفصلي
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وغرامــي
مــا
غرامـي
انـه
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فــي
لظـاهُ
شـعلة
مـن
شـعل
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انـا
عـذري
الهـوى
ان
نظرت
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مقلتــاي
فاتنــاً
لـم
أحـل
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ولقــد
أحببـت
يومـاً
غـادة
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ترتـدي
فـي
الحسن
ابهى
حلل
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وجههــا
يطفـح
بشـراً
وسـنىً
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فيــه
سـمت
مـن
جلال
الرسـل
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صـــوتها
ان
حــدثت
متّــزن
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رائع
النـبرات
عـذب
الجمـل
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ريقهــا
ان
ذاقــه
ملتهــب
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ذاق
طعمـاً
مـن
جنـي
العسـل
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وتجاذبنــا
احـاديث
الهـوى
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واحترقنـا
فـي
جحيـم
القبل
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وبــدت
ترمقنــي
فــي
خجـل
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وأنــا
ارمقهــا
فــي
وجـل
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وحيينــا
مــدة
فــي
طــرف
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مـن
أحـاديث
الهـوى
والغزل
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فرمــى
الـدهر
بسـهم
نافـذ
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خافقينـا
فـأتى
فـي
المقتل
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وتجنّــت
غــادتي
فـي
دلهـا
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ثـم
غـابت
فـي
زوايـا
الازل
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ذي
حيـاتي
فـي
أمـانيّ
وفـي
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نزعــــاتي
وغرامـــي
الاول
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ذي
حيــاتي
عــالم
مضــطرب
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كيفمـا
درت
اقـع
فـي
مشـكل
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