|
أنـت
الملـوم
فمـن
يكـون
الألوما
|
فلـك
الظمـى
هيهـات
معسول
اللمى
|
|
مـا
طـال
ليلـك
بعـد
ليلـي
حيرة
|
إلا
وكنــت
بهــا
كمثلــي
مغرمـا
|
|
لـك
فـي
الضعائن
سلوة
لو
امهلوا
|
أنــي
وقـد
سـاق
الركـاب
وهومـا
|
|
أنــي
وقـد
سـاق
الركـاب
واعجـل
|
الحـادي
وانجـد
بـالفريق
وأتهما
|
|
أفــانت
طـالب
سـلوة
مـن
بعـدهم
|
وتكــون
أنـت
كمـا
زعمـت
متيمـا
|
|
يـا
سـعد
قف
بي
في
المنازل
ساعة
|
نبكــي
فربـة
عبريـة
تـزوي
ظمـى
|
|
نبكـي
نفـوس
تقى
تراق
على
الظبا
|
ظلمــاً
واجسـاداً
تغسـلها
الـدما
|
|
نبكـي
لصـرعى
فـي
التراب
تخالها
|
فـي
الليل
من
فوق
البسيطة
أنجما
|
|
نبكــي
حــرائر
هتكــت
اسـتارها
|
بعـد
الحجـاب
فاصـبحت
مثـل
الاما
|
|
نبكـي
علـى
النفر
الذين
تتابعوا
|
نحــو
المنــون
معظمــاً
فمعظمـا
|
|
نبكـي
البـدور
الكاشـفات
بنورها
|
ليــل
الضــلال
إذا
ضــلال
ابهمـا
|
|
نفسـت
بهـم
أرض
الطفـوف
فلم
تزل
|
تجنـي
العظيـم
وتسـتفيد
الاعظمـا
|
|
ولعــت
بكســب
النيـرات
فاكسـبت
|
شـرفاً
مـدى
الأيـام
تحسدها
السما
|
|
قـد
كنـت
احسـب
ان
غايـة
كربهـا
|
يـوم
قضـى
ابـن
محمـد
فيهـا
ظما
|
|
فـإذا
الرزايـا
لا
تـزال
بربعهـا
|
فــذا
تطــرق
بــالخطوب
وتؤمــا
|
|
بـــأبي
حــبيب
محمــد
وحــبيبه
|
بـأبي
وقـل
أبـي
وجملـة
مـن
وما
|
|
لــم
تفــت
قــارعو
تحـل
بربعـه
|
حيــاً
وتزعجــه
رميمــاً
أعظمــا
|
|
كتـــب
البلاء
علــى
علاه
كأنمــا
|
فـــرض
البلاء
علــى
علاه
وحتمــا
|
|
حيـاً
كذبـح
الشـاة
يذبـح
بالعرى
|
بــل
رب
شـاة
منـه
كـانت
أكرمـا
|
|
ذبحـاً
علـى
ظمأ
الفؤاد
من
القفا
|
أرأيـت
شـاتاً
ويـك
تذبـح
بالظما
|
|
ويــروح
يومــاً
صــدره
متحطمــاً
|
فيهــم
ويومــاً
قــبره
متهــدما
|
|
أو
مـا
سـمعت
مصابها
الثاني
فقد
|
جــاءت
بواحـدة
المصـائب
صـيلما
|
|
تركــت
رجــال
اللَــه
قتلا
جثمـاً
|
وحريـــم
آل
اللَـــه
ثكلاً
أيمــا
|
|
لعبـت
بهـم
أيدي
الخطوب
فأصبحوا
|
نهبــاً
بأيـدي
الظـالمين
مقسـما
|
|
فــتراهم
فيهمكمــا
شـاء
العـدى
|
للســمر
ريــا
وللصـوارم
مطعمـا
|
|
يــا
للرجــال
ولا
رجــال
لهــذه
|
الأرض
الـتي
أقوت
من
الدين
الحمى
|
|
لمغســلين
بمــا
تفيــض
نحـورهم
|
لمكفنيـــن
مــدارعا
ان
تلحمــا
|
|
لمطرحيــن
بغيــر
دفــن
بـالعرى
|
تغـدوا
السـيوف
لحـومهم
والاعظما
|
|
لموحــدين
الههــم
لــم
يجعلـوا
|
معــه
سـواه
ولا
أتـوا
مـا
حرمـا
|
|
للصــائمين
نهـارهم
لـم
يـبرحوا
|
للقــائمين
بليلهــم
ان
اعتمــا
|
|
للواصــلين
هنــاك
رحــم
نـبيهم
|
تركـوا
تنعمهـم
وعـافوا
الانعمـا
|
|
لمهــاجرين
إلـى
المهيمـن
حسـبة
|
جعلـوا
الشـهادة
للسـعادة
سـلما
|
|
صـرعى
تنـوش
جسـومهم
وحـش
الفلا
|
والطيـر
تغـدوا
مـن
عليهـا
حوما
|
|
تــرد
السـباع
لحومهـا
وجسـومها
|
فننـازع
السـرحان
فيهـا
القشعما
|
|
للراكعيــن
السـاجدين
العابـدين
|
الحامـــدين
لربهــم
رب
الســما
|
|
يـا
ليـت
شـعري
مـن
انوح
له
ومن
|
أبكــي
وعــن
اغـدو
لـه
متألمـا
|
|
لــدعائم
الإســلام
ســاعة
ضعضـعت
|
أركــانه
للــدين
ســاعة
هــدما
|
|
لشـعار
أهـل
الحـق
يمحـق
نورهـا
|
بغضـاً
لقـبر
ابـن
النـبي
مهـدما
|
|
لرجـال
ديـن
اللَـه
والقـوم
الذي
|
بضـياء
نـور
بيـانهم
يجلي
العما
|
|
لمحمــد
علــم
العلــوم
باسـرها
|
لأخ
التقـى
الفيـاض
غيـث
ان
همـا
|
|
لأخ
النهــى
والفضـل
غيـر
مـدافع
|
علـم
الكمـال
العـارف
المتوسـما
|
|
أم
للفــتى
العلـوي
صـادق
قـوله
|
بالســيف
جسـده
النجيـع
وعنـدها
|
|
أم
للفـتى
السـامي
علـي
إذ
غـدا
|
ينحـو
الردى
بادي
الشجاعة
معلما
|
|
مـا
زال
يخطـر
بالحسـام
مجاهـداً
|
حــتى
غــدا
بالمشــرفي
معممــا
|
|
بـأبي
وامـي
عـافرين
علـى
الثرى
|
يقضــي
ويحســبهم
هنالــك
نومـا
|
|
ظفـــروا
بقصـــدهم
وبــت
معللا
|
مــا
بيــن
ربتمـا
وبيـن
لعلمـا
|
|
سـبقوا
إلـى
الجنـات
في
غاياتهم
|
سـبق
الوفـود
لمنعـم
لـن
يسـأما
|
|
غنمـوا
الجنـان
وظلت
بعد
فراقهم
|
حلــف
المذلـة
مرغمـاً
أو
مغرمـا
|
|
ربحـوا
بـبيعهم
الـذي
قد
بايعوا
|
فـاعرف
مقامـك
أين
انت
من
النما
|
|
أفـردت
نفسـك
عـن
سـلوك
طريقهـم
|
ورجـوت
بعـد
لهـم
تكـون
التؤمـا
|
|
هيهـــات
منتــك
الأمــاني
ضــلة
|
وأراك
فيمـــا
خلتـــه
متوهمــا
|
|
فــارجع
فلســت
أراك
غلا
غابطــاً
|
فيمــا
تركــت
تاليــاً
ومقــدما
|
|
شـأن
الغـواني
صـار
شأنك
لم
تكن
|
إلا
تقيــم
عــزاً
وتنصــب
مأتمـا
|
|
إن
كــان
همــك
ليـس
إلا
بالبكـا
|
فتكــون
نائحــة
وتســمع
مغرمـا
|
|
فلـم
ادخـرت
مـن
السـيوف
مصـمماً
|
لكريهــة
ومــن
الرمــاح
مقومـا
|
|
ضـعفاً
لرأيـك
حيث
رأيك
في
البكا
|
لا
مقـــدما
تلقــى
ولا
مســتقدما
|
|
ظلـــت
أدلـــة
معشـــر
ســوتهم
|
إن
كنــت
متخــذاً
حياتـك
مغنمـا
|
|
يـــا
للرجــال
ألا
تقــي
عــاطف
|
يحنـوا
علـى
ديـن
الآلـه
ويرحمـا
|
|
يـا
للرجـال
ألا
ابـن
منجبـة
يرى
|
أم
كلكـم
يـا
قـوم
أبنـاء
الأمـا
|
|
يـا
للرجـال
ألا
ابـن
منجبـة
يرى
|
دينــاً
فيغضــب
للآلــه
فيقــدما
|
|
يــا
للرجــال
ألا
معــود
شــيمة
|
إن
صــح
قــول
سـعود
إن
لا
سـلما
|
|
إن
صــح
مــا
منكــم
لـرب
مسـلم
|
أفلـم
يكـن
فيكـم
فـتى
يحمي
حما
|
|
أفلــم
يكـن
فيكـم
مراعـي
حرمـة
|
إن
كنتـم
مـن
ليـس
يخشـى
محرمـا
|
|
إن
صـــــح
ان
ولاء
آل
محمـــــد
|
وهـواهم
فـي
اللَـه
شـركاً
أعظمـا
|
|
إن
صـــح
أَن
الواصــلين
نــبيهم
|
فـــي
آلــه
يســتوجبون
جهنمــا
|
|
إن
صــح
لا
خلفــاء
بعــد
نـبيهم
|
أولا
أئمــة
حرمــوا
مــا
حرمــا
|
|
بــل
كلهــم
بــاغ
مضــل
مبــدع
|
الا
ســعود
فنـوره
يجلـوا
الغمـا
|
|
وزمـان
الفـي
عـام
لـم
يـك
فيهم
|
أحــد
لــوجه
آلهــه
قـد
أسـلما
|
|
ويقــول
طـه
لـم
تـزل
فـي
امـتي
|
بــالحق
طائفــة
تقــول
وتحكمـا
|
|
فمــن
المصـدق
منهمـا
ان
نبينـا
|
الهادي
الرشاد
أم
الجهول
الاعظما
|
|
يـا
ناصـر
الاسـلام
يـا
بـن
محمـد
|
أكــرم
بـه
نسـباً
واعظـم
منتمـا
|
|
يـا
بـن
الكـرام
ألا
تمـن
بلفتـة
|
غـب
البلا
وتجـاوز
المـاء
الفمـا
|
|
وتـرى
حسـام
البغي
كيف
قد
اغتدى
|
برقابنـــا
متمكنـــا
متحكمـــا
|
|
لا
شـــيبة
تركــوا
ولا
مستضــعفاً
|
كلا
ولا
متضـــــرعاً
مستســـــلما
|
|
كـــم
حـــرة
مســحوبة
مضــروبة
|
سـلب
اللئيـم
قناعهـا
سـلب
الاما
|
|
مسـلوبة
الاطمـار
لـم
تـر
سـاتراً
|
فــي
النـاس
إلا
كفهـا
والمعصـبا
|
|
تخشـى
النهار
من
العيون
إذا
بدت
|
إذ
كـان
يسـترها
الدجى
إن
اظلما
|
|
كــم
ذات
خــدر
أخرجوهــا
عنـوة
|
مـن
خـدرها
فغـدا
حريقـاً
مضـرما
|
|
كـم
ذات
طفـل
طفلهـا
فـي
حجرهـا
|
ذبحـوه
حـتى
خـالط
اللبـن
الدما
|
|
قتـل
الرجـال
لشـركهم
فـي
زعمـه
|
فالطفــل
أيـة
جرمـة
قـد
أجرمـا
|
|
فبمسـمع
منـك
الـذي
قـد
عـاينوا
|
وكفــاهم
يــا
ســيدي
ان
تعلمـا
|
|
قــرت
عيــون
الحاســدين
شـماتة
|
وافــتر
ثغــر
الشـامتين
تبسـما
|
|
وانصــاع
ديـن
اللَـه
لعبـة
لاعـب
|
فيمــا
يشــاء
تهجمــاً
وتهكمــا
|
|
فـإلى
مـتى
يا
بن
النبي
إلى
متى
|
صــلى
الآلـه
علـى
النـبي
وسـلما
|